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#ModiJobDo जैसा ‘हड़कंपी’ टि्वटर ट्रेंड कैसे और कहां से चल जाता है? समझिए- इसके पीछे की कहानी

जेअएनयू के अविनाश कुमार का कहना है कि युवाओं में हताशा के लिए सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं। नोटबंदी से हालात बदतर हुए तो अपनी गलत नीतियों की वजह से सरकार उस वादे को पूरा नहीं कर सकी, जिसमें दो करोड़ रोजगार हर साल दिए जाने थे।

PM MODIपीएम नरेंद्र मोदी (फोटो सोर्सः ट्विटर@bjp4india)

#ModiJobDo जैसे ‘हड़कंपी’ टि्वटर ट्रेंड के लिए सरकार खुद ही जिम्मेदार है। जब करोड़ों की तादाद में युवा नौकरी के लिए सड़क पर घूम रहे हैं, तब सरकार नई नौकरियों का सृजन नहीं कर पा रही। इसके उलट जो भर्तियां निकाली जा रही हैं उन्हें भरने का तरीका इतना ज्यादा लंबा और पेंचीदा है, जिससे युवा वर्ग में हताशा फैल रही है और वह सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालने को विवश हो रहा है।

सरकार की लचर कार्यप्रणाली को इलाहाबाद के एक युवा की कहानी से बखूबी समझा जा सकता है। अजीत सोनकर उन लाखों युवाओं में से एक है जो #ModiJobDo के पीछे हैं। सोनकर ने तीन बार नाकाम होने के बाद CGL (कंबाइंड ग्रेजुएट लेवल) एक्जाम 2019 में पास तो कर लिया था, लेकिन उसके बाद भी मैरिट लिस्ट में उसका नाम नहीं आ सका। जबकि उसके नंबर कट ऑफ से ज्यादा थे। ध्यान रहे कि CGL के जरिए ही स्टाफ सिलेक्शन कमीशन केंद्र के तहत आने वाले खाली पदों के लिए भर्तियां करता है।

सोनकर की परेशानी यहीं पर खत्म नहीं होतीं। सरकार नियुक्तियों को पूरा करने में डेढ़ से दो साल का वक्त लेती है। दुश्वारियां और भी हैं। CGL की परीक्षा में कोई गलत सवाल आ जाए तो उसे चुनौती देने की फीस 100 रुपए प्रति सवाल है। स्टाफ सिलेक्शन कमीशन के लिए यह फायदे का सौदा है। लेकिन लाखों की तादाद में बेरोजगार युवा सरकार की लेतलतीफी और पैसा उगाहने की नई कार्यप्रणाली से हताश हैं। सोनकर का कहना है कि परीक्षा के परिणाम को लेकर जब वह कमीशन के इलाहाबाद दफ्तर गया तो उसे दिल्ली जाकर संपर्क करने को कहा गया।

सोनकर का कहना है कि वह इलाहाबाद में किराए का कमरा लेकर रह रहा है। सरकार जिस तरह का रवैया दिखा रही है, उसके बाद उनके पास सोशल मीडिया के अलावा कोई चारा नहीं है। इसी वजह से वह और उनके जैसे लाखों युवा #ModiJobDo से जुड़ रहे हैं। ध्यान रहे कि CGL के जरिए हर साल निकलने वाली 10 हजार नौकरियों के लिए 35 लाख युवा आवेदन करते हैं। जाहिर है कि सोनकर जैसे लाखों युवा सरकार की लालफीताशाही जैसी कार्यप्रणाली से परेशान हैं।

नौकरियों को भरने के मामले में लेटलतीफी केवल केंद्र तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राज्य सरकारें भी इसी तरह से काम कर रही हैं। यूपी पब्लिक सर्विस कमीशन ने सहायक प्रोफेसरों के 200 पदों के लिए 2017 में विज्ञापन निकाला था। दो साल बाद इसका स्क्रीनिंग एग्जाम हुआ और जनवरी 2020 से इसके लिए साक्षात्कार लिए जा रहे हैं। कमीशन ने अपनी तरफ से चयनित उम्मीदवारों के बारे में हायर एजुकेशन डिपार्टमेंट को बता दिया है, लेकिन इन युवाओं को भी नौकरी नहीं मिल सकी है। एक युवा का कहना है कि सरकार कमीशन की लिस्ट दबा रही है।

कमीशन के चेयरमैन और कार्मिक मंत्रालय से इस मसले पर संपर्क नहीं हो सका, लेकिन रेलवे के प्रवक्ता डीजे नारायणन कहना है कि खाली पदों को भरने के लिए बीते दो माह से परीक्षा कराई जा रही है। कोविड प्रोटोकाल के चलते परीक्षा समय पर कराने में परेशानी हुई, लेकिन अब समय पर परिणाम घोषित कर दिया जाएगा। उधर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर अविनाश कुमार का कहना है कि जॉब सिक्योरिटी की वजह से सरकारी नौकरियां का युवाओं में काफी क्रेज है। लेकिन 2011-18 के दौरान जॉब ग्रोथ पिछले समय की तुलना में तेजी से घटी हैं।

अविनाश कुमार का कहना है कि युवाओं में हताशा के लिए सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं। नोटबंदी से हालात बदतर हुए तो अपनी गलत नीतियों की वजह से सरकार उस वादे को पूरा नहीं कर सकी, जिसमें दो करोड़ रोजगार हर साल दिए जाने थे। सरकार को अभी तक यह भी पता ही नहीं है कि वो इस योजना पर कैसे काम करे। बीजेपी की पॉलिटिकल फिलॉसफी भी लोगों में डर का संचार कर रही है। सरकार को समाज के सभी वर्गों के बीच विश्वास बहाली का काम करना चाहिए पर देखा जाए तो हो इसका उलट रहा है। विश्वास लगातार दरक रहा है।

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