पश्चिम बंगाल की भाजपा सरकार आज विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) बिल पेश कर सकती है। भाजपा ने यह कदम तृणमूल कांग्रेस के 15 वर्षीय शासन को समाप्त करने के लगभग दो महीने बाद उठाया है। इस विधेयक के आने के बाद शादी, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति के बंटवारे समेत कई नियमों में बदलाव होगा और यह सबके लिए एक समान होगा।

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में इसे शामिल किया था। जिसमें वादा किया गया था कि सरकार बनने के छह महीने के अंदर ही राज्य में यूसीसी बिल आएगा।

प्रस्तावित विधेयक टीएमसी के दोनों गुटों के साथ पहली बार एक बड़ा वैचारिक टकराव पैदा कर सकता है, जो 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद प्रतिद्वंद्वी खेमों में बंट गए थे। उम्मीद है कि यह विधेयक मौजूदा बजट सत्र पर हावी रहेगा।

इस विधेयक का उद्देश्य सभी धर्मों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और गोद लेने के मामलों में एक समान नागरिक ढांचा तैयार करना है। भाजपा के लिए, यह एक महत्वपूर्ण चुनावी वादे की पूर्ति और इस बात की पुष्टि है कि सभी नागरिकों पर एक ही प्रकार के नागरिक कानून लागू होने चाहिए। विपक्ष के लिए, इसने संवैधानिक सुरक्षा उपायों, सामाजिक सहमति और विभिन्न समुदायों को प्रभावित करने वाले किसी परिवर्तन को व्यापक परामर्श के बिना लागू किए जाने के बारे में प्रश्न उठाए हैं।

यह कदम विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा द्वारा अपने संकल्प पत्र में निर्धारित छह महीने की समय सीमा से काफी पहले उठाया गया है। घोषणापत्र जारी करते समय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार सत्ता में आने के छह महीने के भीतर यूसीसी को लागू करेगी और इसे धर्म की परवाह किए बिना कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम के रूप में प्रस्तुत किया था।

प्रस्तावित कानून विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में व्यक्तिगत कानूनों को सभी नागरिकों के लिए एक समान कानूनी संरचना से प्रतिस्थापित करेगा, जबकि कुछ समूहों के लिए संवैधानिक छूट को बरकरार रखेगा।

शुक्रवार को शुभेंदु अधिकारी ने स्पष्ट संकेत दिया कि सरकार मौजूदा सत्र में इस विधेयक को पारित करने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा, “जिस प्रकार गुजरात, उत्तराखंड और असम में प्रक्रिया का पालन करते हुए इसे (यूसीसी) लागू किया गया, उसी प्रकार इसे पश्चिम बंगाल में भी लागू किया जाएगा। मैं सोमवार को विधानसभा को इसकी जानकारी दूंगा।”

उनके बयानों से सरकार की उस मंशा का संकेत मिलता है कि वह अपने चुनावी वादों में से एक को जल्द से जल्द पूरा करना चाहती है और पश्चिम बंगाल के ढांचे को भाजपा शासित अन्य राज्यों में अपनाई गई प्रणालियों के अनुरूप ढालना चाहती है। प्रक्रिया पर उनका जोर विरोधियों की आलोचना का जवाब भी प्रतीत होता है, जिन्होंने कहा है कि व्यापक सामाजिक और कानूनी प्रभाव वाले सुधार के लिए व्यापक परामर्श आवश्यक है।

यूसीसी की पहली राजनीतिक परीक्षा

विधेयक पेश होने से पहले, राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने प्रस्ताव को लेकर उठ रही मुख्य चिंताओं में से एक का जवाब देते हुए कहा कि संवैधानिक रूप से संरक्षित आदिवासी समुदाय इसके दायरे से बाहर रहेंगे। भट्टाचार्य ने शनिवार को सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “यूसीसी पर भाजपा का रुख लंबे समय से स्पष्ट और निर्विवाद है। यह हमारी राजनीतिक प्रतिबद्धता और चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा है।”

बंगाल भाजपा प्रमुख ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 366(25) और 342 के तहत मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजातियों के सदस्य प्रस्तावित कानून से मुक्त रहेंगे और उनके रीति-रिवाज, परंपराएं और विशेष अधिकार संरक्षित रहेंगे। भट्टाचार्य ने इस दावे को भी खारिज कर दिया कि यह कानून परिवार के आकार के नियमन से जुड़ा है, और कहा कि ऐसे प्रावधान “न तो यूसीसी का उद्देश्य हैं और न ही इसका हिस्सा हैं।”

सरकार ने इस विधेयक को संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित एक शासन उपाय के रूप में प्रस्तुत किया है। साथ ही तर्क दिया है कि नागरिक कानूनों का एक समान समूह कानूनी समानता को मजबूत करेगा और धर्म आधारित व्यक्तिगत कानूनों द्वारा उत्पन्न असमानताओं को दूर करेगा। हालांकि, विपक्षी दलों का कहना है कि यह मुद्दा जितना कानूनी है उतना ही राजनीतिक भी है।

शुक्रवार को पार्टी विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के साथ हुई रणनीति बैठक में टीएमसी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पार्टी को विधानसभा के अंदर और बाहर इस विधेयक का कड़ा विरोध करने का निर्देश दिया। पार्टी के अनुसार, यह प्रस्ताव संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक सहमति और भारत के बहुलवादी स्वरूप से जुड़े व्यापक प्रश्न उठाता है।

टकराव की तैयारी में टीएमसी

टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह इस विधेयक का इस्तेमाल कानूनी सुधार के बजाय राजनीतिक हथियार के रूप में कर रही है। एक वरिष्ठ टीएमसी नेता ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, “सवाल यह है कि क्या यूसीसी वास्तव में नागरिकों के कल्याण और संवैधानिक मूल्यों के लिए लाया जा रहा है, या इसका इस्तेमाल राजनीतिक ध्रुवीकरण के हथियार के रूप में किया जा रहा है?”

विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी, जिनके बागी गुट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी है। उन्होंने ने भी सरकार की कार्यगति पर सवाल उठाए हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने हाल ही में कहा, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि इतनी जल्दी क्या है। यूसीसी जैसे मामले में व्यापक चर्चा और परामर्श की आवश्यकता होती है।” उन्होंने तर्क दिया कि व्यक्तिगत कानूनों और पारिवारिक मामलों से संबंधित कानून को व्यापक जन चर्चा के बिना जल्दबाजी में पारित नहीं किया जाना चाहिए।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब शुभेंदु अधिकारी सरकार द्वारा सोमवार को विधानसभा में दो और विधेयक पेश किए जाने की संभावना है, जिनमें राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए कड़े उपाय किए जाएंगे।

प्रस्तावित दो विधेयक- पश्चिम बंगाल सार्वजनिक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण विधेयक, 2026 और पश्चिम बंगाल सार्वजनिक व्यवस्था रखरखाव (संशोधन) विधेयक, 2026 – भी विधानसभा में पेश किए जाने की संभावना है।

इन विधेयकों में जबरन वसूली जैसी संगठित असामाजिक गतिविधियों से सख्ती से निपटने के प्रावधान शामिल हैं, जिनकी शिकायत पूर्व टीएमसी शासन के दौरान बार-बार की जाती थी। इनका उद्देश्य सार्वजनिक अव्यवस्था, तोड़फोड़ और पुलिसकर्मियों तथा अन्य लोक सेवकों पर हमले करने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाना भी है। प्रस्तावित कानून के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जाता है, तो उसे एक वर्ष तक की निवारक हिरासत में रखा जा सकता है। विधेयक में नुकसान की भरपाई के लिए अपराधी की संपत्ति को नीलामी के लिए जब्त करने का भी प्रस्ताव है।

TMC की संपत्ति, सिंबल और संगठन पर किसका होगा हक?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में अफरा-तफरी मची है। टीएमसी के कई पुराने नेता ममता बनर्जी से किनारा कर चुके हैं। ऐसे पार्टी को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हों। पार्टी के नाम, नेतृत्व, फंड और टीएमसी के चुनाव चिह्न पर दावेदारी को लेकर विवाद हो रहा है। पढ़ें पूरी खबर।