Caste Reservation in Bengal: पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी सरकार ने ओबीसी आरक्षण नीति में बड़ा बदलाव करते हुए कुल आरक्षण को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। नई नीति के तहत अब यह आरक्षण केवल वास्तविक पिछड़े हिंदू समुदायों को दिया जाएगा, जो एससी और एसटी श्रेणी में शामिल नहीं हैं।

नई सरकार के इस फैसले के चलते मुस्लिम समुदायों को दिए जा रहे ओबीसी लाभ को तत्काल समाप्त कर दिया गया है। बीजेपी सरकार ने ममता बनर्जी की पिछली सरकार द्वारा कई मुस्लिम समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल करने के कदम को पलट दिया है इसे बीजेपी ने “मुस्लिम तुष्टीकरण” करार दिया है।

BJP सरकार ने लागू की ममता सरकार के पहले वाली स्थिति

बंगाल की नई बीजेपी सरकार ने इन 66 समूहों के लिए 7% ओबीसी कोटा लागू कर दिया है, जिससे राज्य में ओबीसी आरक्षण व्यवस्था ममता बनर्जी सरकार से पहले के दौर वाली स्थिति में आ गई है। ममता के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहली बार 2011 में बंगाल में सत्ता में आई थी। 2012 में, ममता सरकार ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग अधिनियम पारित किया, जिसमें कुल 17% ओबीसी आरक्षण प्रदान किया गयाय़। श्रेणी ए के तहत “अधिक पिछड़े वर्गों” के लिए 10% और श्रेणी बी के तहत “पिछड़े” वर्गों के लिए 7% किया गया था।

इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई और कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मई 2024 में राज्य सरकार द्वारा मार्च 2010 से मई 2012 के बीच पारित कई आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत 77 समुदायों में अधिकतर को ओबीसी श्रेणी के अंतर्गत आरक्षण दिया गया था। न्यायमूर्ति तपब्रता चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की खंडपीठ ने पाया कि पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग और राज्य सरकार द्वारा आरक्षण प्रदान करने का एकमात्र आधार धर्म था, जो संविधान और न्यायालय के आदेशों द्वारा निषिद्ध है।

हाईकोर्ट ने रद्द किए थे प्रमाण पत्र

हाई कोर्ट ने 2010 के बाद बंगाल सरकार द्वारा जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया, हालांकि इसने उन लोगों को, जिन्हें पहले ही इसके तहत भर्ती किया जा चुका था, अपनी नौकरी जारी रखने की अनुमति दी। अदालत का यह आदेश 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के बीच आया है, जिसमें मुसलमानों के लिए आरक्षण एक अहम मुद्दा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ बीजेपी ने विपक्ष पर हिंदुओं से आरक्षण और अन्य लाभ छीनकर मुसलमानों को देने का आरोप लगाया है।

लोकसभा चुनावों के दौरान ओबीसी हित भी प्रमुख मुद्दों में से एक के रूप में उभरा, जिसमें भाजपा और विपक्षी इंडिया ब्लॉक दोनों ने अपने-अपने चुनाव प्रचार में एक-दूसरे पर आरक्षण व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। 11 जून 2025 को बंगाल विधानसभा में तत्कालीन विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने ममता सरकार पर बंगाल में ओबीसी कोटा को एकतरफा लाभार्थी वर्ग कोटा में बदलने का आरोप लगाया।

शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि 2010 में ओबीसी जातियां 66 थीं जिनमें 11 मुस्लिम समूह शामिल थे जबकि ममता सरकार की 2025 की सूची में श्रेणी ‘ए’ के ​​51 समूहों में से 46 मुस्लिम समूह और श्रेणी ‘बी’ के 25 समूहों में से 21 मुस्लिम समूह शामिल हैं। पहली श्रेणी में मुसलमानों का प्रतिशत 90% था।

अदालत की घोर अवमानना का जिक्र

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर, 2024 को कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बंगाल सरकार द्वारा दायर अपील की सुनवाई करते हुए कहा था कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया, “ममता सरकार द्वारा तैयार की गई नई सूची अदालत की घोर अवमानना ​​है। तत्कालीन अध्यक्ष हंसराज अहीर के नेतृत्व में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने भी इस मामले को उठाया था और टीएमसी सरकार पर ओबीसी सूची में मुस्लिम जातियों की संख्या बढ़ाने का आरोप लगाया था।

जून 2025 में, एनसीबीसी ने तत्कालीन बंगाल के मुख्य सचिव मनोज पंत को नोटिस जारी कर राज्य में नव घोषित ओबीसी सूची के लिए किए गए सर्वेक्षणों की विस्तृत जानकारी तीन दिनों के भीतर मांगी। अहीर ने बताया कि 3 जून, 2025 की तीन कार्यकारी अधिसूचनाओं के माध्यम से राज्य की ओबीसी सूची में कई जातियों को अधिसूचित किया गया था, और उन्होंने यह भी बताया कि ये सूचियां विस्तृत सर्वेक्षणों पर आधारित थीं।

2024 में बंगाल सरकार पर उठे थे सवाल

एक एक्स पोस्ट में हंसराज अहिर ने लिखा था, “एनसीबीसी ने पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर एनसीबीसी के 22 दिसंबर 2023 के पहले नोटिस और उसके बाद 19 फरवरी 2024 के पत्र के जवाब मांगे हैं। राज्य सरकार ने जानकारी देने के लिए तीन से छह महीने का समय मांगा था। एक साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अपेक्षित जानकारी अभी तक प्राप्त नहीं हुई है।”

जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के जून 2025 के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें राज्य सरकार की संशोधित ओबीसी सूची को रोक दिया गया था। हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली राज्य की अपील पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने तीन न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता करते हुए कहा, “यह आश्चर्यजनक है। हाई कोर्ट इस तरह कैसे रोक लगा सकता है? आरक्षण कार्यपालिका के कार्यों का हिस्सा है। इंदिरा साहनी के समय से ही यह स्थिति रही है कि कार्यपालिका इसे कर सकती है। हम हाई कोर्ट के तर्क से हैरान हैं।”

शुभेंदु सरकार के इस कदम से भले ही कई मुस्लिम समूह आरक्षण के दायरे से बाहर हो गए हों लेकिन राज्य में ओबीसी कोटा की कुल मात्रा भी 17% से घटकर 7% हो गई है – जिसका इस्तेमाल विपक्ष भाजपा सरकार पर हमला करने के लिए कर सकता है।

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