पश्चिम बंगाल में पहले चरण की वोटिंग संपन्न हो गई है, 90 फीसदी के करीब मतदान हुआ है। पिछले 15 सालों से राज्य में ममता बनर्जी की सरकार है। 2011 में उन्होंने पहली बार सत्ता में आने के बाद बंगाल की जनता से कई वादे किए थे। बीजेपी आरोप लगाती है कि ममता उन वादों पर खरा नहीं उतर पाई हैं।
जनसत्ता अपनी स्पेशल सीरीज आंकड़े बोलते हैं के जरिए ममता बनर्जी की 15 साल की सरकार के कामकाज का विश्लेषण कर रही है। जानने का प्रयास है कि 15 सालों में स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, निवेश के क्षेत्र में कितना काम हुआ है।
शिक्षा के क्षेत्र में कितना काम?
Unified District Information System for Education का डेटा पश्चिम बंगाल की शिक्षा प्रणाली को लेकर विस्तृत जानकारी देता है। पश्चिम बंगाल में वर्तमान में 93 हजार 715 स्कूल है। राज्य में प्राथमिक यानी कि प्राइमरी स्कूलों की संख्या 74 हजार 316 है, वहीं माध्यमिक यानी कि सेकेंड्री स्कूलों की संख्या सिर्फ 3 हजार 280 है। पश्चिम बंगाल में सरकारी स्कूलों की संख्या 82 हजार 154 है, वहीं निजी स्कूलों की संख्या 7 हजार 176।
वर्तमान में पश्चिम बंगाल में 6482 ऐसे स्कूल हैं जहां सिर्फ एक ही शिक्षक मौजूद है, वहीं बिना छात्रों वाले स्कूलों की संख्या 3 हजार 812 दर्ज है। इसके अलावा बंगाल में 50 से कम बच्चे वाले स्कूलों की संख्या 38 फीसदी दर्ज की गई है। हर तीन में से एक स्कूल राज्य में छोटा है। नीचे दी गई टेबल से आसानी से समझ सकते हैं कि बंगाल में शिक्षा की कैसी व्यवस्था है और राष्ट्रीय औसत के मुकाबले इसकी स्थिति क्या है।
| सूचक | पश्चिम बंगाल | पूरे भारत | % पश्चिम बंगाल | % पूरे भारत |
| कुल स्कूल | 93,715 | 14,71,473 | 6.4 | — |
| प्राथमिक (Primary) | 74,316 | 7,30,518 | 79.3 | 49.6 |
| उच्च प्राथमिक (Upper Primary) | 8,528 | 4,34,013 | 9.1 | 29.5 |
| माध्यमिक (Secondary) | 3,280 | 1,42,749 | 3.5 | 9.7 |
| उच्च माध्यमिक (Higher Secondary) | 7,591 | 1,64,193 | 8.1 | 11.2 |
| सरकारी स्कूल | 82,154 | 10,13,322 | 87.7 | 68.9 |
| प्राइवेट (बिना सहायता) | 7,176 | 3,39,543 | 7.7 | 23.1 |
| एक शिक्षक वाले स्कूल | 6,482 | 1,04,125 | 6.9 | 7.1 |
| बिना नामांकन वाले स्कूल | 3,812 | 7,993 | 4.1 | 0.5 |
| छोटे स्कूल (<50 छात्र) | — | — | 38 | 36 |
ऊपर दी गई टेबल से एक ट्रेंड स्पष्ट दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल में प्राथमिक स्कूलों की संख्या जरूर 79 फीसदी है, लेकिन बात आगे की शिक्षा की आती है, हालात चिंताजनक दिखाई देते हैं। बंगाल में सेकेंड्री स्कूलों की संख्या 3.5 फीसदी है और हायर सेकेंड्री स्कूलों की संख्या 8.1 फीसदी। इसका सीधा मतलब है कि बच्चे एक से पांचवी कक्षा तक तो पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन आगे की शिक्षा के लिए उनके पास सीमित विकल्प हैं। ऐसी स्थिति में स्कूलों में ड्रॉप आउट रेट बढ़ सकता है।
| सूचक | पश्चिम बंगाल | पूरा भारत | बंगाल % | राष्ट्रीय % |
|---|---|---|---|---|
| कुल स्कूल | 93,715 | 14,71,473 | 6.4% | — |
| प्राथमिक (Primary) | 74,316 | 7,30,518 | 79.3% | 49.6% |
| उच्च प्राथमिक | 8,528 | 4,34,013 | 9.1% | 29.5% |
| माध्यमिक (Secondary) | 3,280 | 1,42,749 | 3.5% | 9.7% |
| उच्च माध्यमिक | 7,591 | 1,64,193 | 8.1% | 11.2% |
| सरकारी स्कूल | 82,154 | 10,13,322 | 87.7% | 68.9% |
| एक शिक्षक वाले स्कूल | 6,482 | 1,04,125 | 6.9% | 7.1% |
| बिना नामांकन वाले स्कूल | 3,812 | 7,993 | 4.1% | 0.5% |
| छोटे स्कूल (50 से कम छात्र) | 38% | 36% | — | — |
| वर्ष | प्राथमिक | उच्च प्राथमिक | माध्यमिक |
|---|---|---|---|
| 2020–21 | 0% | 0% | 13.26% |
| 2021–22 | 8.62% | 0% | 17.98% |
| 2022–23 | 8.10% | 3.40% | 8.50% |
| 2023–24 | 0% | 0% | 17.80% |
| 2024–25 | 1.40% | 3% | 20% |
| राज्य | प्राथमिक 2020-21 | प्राथमिक 2024-25 | माध्यमिक 2020-21 | माध्यमिक 2024-25 |
|---|---|---|---|---|
| पश्चिम बंगाल | 0% | 1.40% | 13.26% | 20% |
| केरल | 0.02% | 0.40% | 7.05% | 4.80% |
| हिमाचल प्रदेश | 1.89% | 0.50% | 7.62% | 6.60% |
| राजस्थान | 0.98% | 2.70% | 8.89% | 7.40% |
| पंजाब | 0% | 2.50% | 9.02% | 6.20% |
| गुजरात | 1.02% | 0.20% | 23.31% | 16.90% |
| वर्ष | सरकारी अस्पताल | बेड की संख्या |
|---|---|---|
| 2011 | 654 | 71,191 |
| 2012 | 1,566 | 77,210 |
| 2013 | 1,566 | 78,188 |
| 2014 | 1,566 | 78,566 |
| 2019 | 1,594 | 96,012 |
| 2022 | 1,510 | 97,000 |
| वर्ष | भारत (%) | पश्चिम बंगाल (%) | स्थिति |
|---|---|---|---|
| 2022 | 10.90% | 8.40% | राष्ट्रीय से बेहतर |
| 2023 | 10.00% | 8.10% | राष्ट्रीय से बेहतर |
| 2024 | 10.30% | 9.70% | करीब |
| 2025 | 9.90% | 10.60% | राष्ट्रीय से खराब |
| शिक्षा स्तर | पुरुष (%) | महिला (%) |
|---|---|---|
| पोस्ट ग्रेजुएट | 2.90% | 15.40% |
| ग्रेजुएट | 7.10% | 12.50% |
| डिप्लोमा | 5.70% | 13.80% |
| हायर सेकेंडरी | 4.00% | 7.70% |
| सेकेंडरी | 1.70% | 6.00% |
| मिडिल | 2.60% | 2.00% |
| प्राइमरी | 1.10% | 0.70% |
| अनपढ़ | 0.30% | 0.10% |
| क्षेत्र (सेक्टर) | हिस्सेदारी (%) | स्थिति |
|---|---|---|
| कृषि एवं संबद्ध | 23.60% | कृषि प्रधान |
| व्यापार, होटल, रेस्टोरेंट | 15.90% | ठीक |
| रियल एस्टेट, व्यवसाय सेवाएं | 12.70% | ठीक |
| विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) | 12.30% | कमजोर |
| अन्य सेवाएं | 8.30% | ठीक |
| निर्माण (कंस्ट्रक्शन) | 7.40% | ठीक |
| परिवहन, भंडारण, संचार | 6.50% | ठीक |
| बैंकिंग और बीमा | 5.30% | ठीक |
| सार्वजनिक प्रशासन | 5.00% | ठीक |
| बिजली, गैस, जल आपूर्ति | 2.00% | ठीक |
| खनन एवं उत्खनन | 1.00% | ठीक |
बंगाल में स्कूलों का ड्रॉप आउट रेट
स्कूल ड्रॉप आउट को लेकर कुछ विश्वसनीय आंकड़े मौजूद हैं जो पश्चिम बंगाल की स्पष्ट तस्वीर दिखाते हैं। राज्यसभा में दिए गए डेटा से 2020 से लेकर 2025 तक के आंकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं। नीचे दी गई टेबल से समझते हैं-
| वर्ष | प्राथमिक | उच्च प्राथमिक | माध्यमिक |
| 2020–21 | 0% | 0% | 13.26% |
| 2021–22 | 8.62% | 0% | 17.98% |
| 2022–23 | 8.10% | 3.40% | 8.50% |
| 2023–24 | 0% | 0% | 17.80% |
| 2024–25 | 1.40% | 3% | 20% |
ऊपर दी गई टेबल से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में माध्यमिक शिक्षा का हाल काफी खराब है। लगातार छात्रों का ड्रॉप आउट रेट बढ़ता गया है। जो आंकड़ा 2020-21 में 13.26 फीसदी था, वो 2024-25 तक 20 फीसदी पहुंच चुका है। यह बताने के लिए काफी है कि राज्य में पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई करना एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। दूसरे कई राज्य इस दिशा में बंगाल की तुलना में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। नीचे दी गई टेबल से टॉप पांच राज्यों की स्थिति समझें-
| राज्य | 2020–21 (प्राथमिक) | 2024–25 (प्राथमिक) | 2020–21 (माध्यमिक) | 2024–25 (माध्यमिक) |
| केरल | 0.02% | 0.40% | 7.05% | 4.80% |
| हिमाचल प्रदेश | 1.89% | 0.50% | 7.62% | 6.60% |
| गुजरात | 1.02% | 0.20% | 23.31% | 16.90% |
| राजस्थान | 0.98% | 2.70% | 8.89% | 7.40% |
| पंजाब | 0% | 2.50% | 9.02% | 6.20% |
स्वास्थ्य के क्षेत्र में कितना काम
पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार दावा करती है कि पिछले 15 सालों में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी काम हुआ है। कुछ पहलुओं को आंकड़ों की कसौटी पर परखने की कोशिश करते हैं। Central Bureau of Health Intelligence का डेटा बताता है कि पश्चिम बंगाल में 2011 के बाद से सरकारी डॉक्टरों की संख्या कितनी रही है। हैरानी की बात यह है कि सरकारी डॉक्टरों के आंकड़े काफी अस्थिर दिखाई देते हैं। कभी अचानक से अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखने को मिली है तो कभी भारी गिरावट। नीचे दी गई टेबल से बीते कुछ सालों का ट्रेंड समझते हैं-
| वर्ष | सरकारी डॉक्टरों की संख्या |
| 2011 | 10,854 |
| 2012 | 3,325 |
| 2013 | 9,474 |
| 2014 | 8,829 |
| 2021 | 90 |
| 2022 | 17,692 |
सरकारी अस्पतालों की संख्या
पश्चिम बंगाल में सरकारी अस्पताल को लेकर Central Bureau of Health Intelligence द्वारा आंकड़े दिए गए हैं। उन आंकड़ों के मुताबिक 2011 से सरकारी अस्पतालों की संख्या में बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन आगे चलकर आंकड़ा स्थिर रहा है, कोई बड़ी बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली है। उदाहरण के लिए 2019 में 1594 सरकारी अस्पताल बंगाल में दर्ज हुए, लेकिन 2020 में आंकड़ा 1510 रह गया। इसका मतलब है कि कुछ छोटे सरकारी अस्पतालों का मर्ज अप हुआ है। नीचे दी गई टेबल से 2011 से सरकारी अस्पतालों का ट्रेंड समझते हैं-
| वर्ष | अस्पतालों की संख्या |
| 2011 | 654 |
| 2012 | 1,566 |
| 2013 | 1,566 |
| 2014 | 1,566 |
| 2019 | 1,594 |
| 2022 | 1,510 |
सरकारी अस्पतालों में बेड की संख्या
सिर्फ ज्यादा सरकारी अस्पताल बना देना किसी सरकार की कामयाबी नहीं हो सकती, वहां कैसी सुविधाएं दी जा रही हैं, इस पर भी काफी कुछ निर्भर कर सकता है। पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पतालों में बेड की क्या व्यवस्था है, इसे लेकर भी सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस डेटा देता है। डेटा के मुताबिक पश्चिम बंगाल में लगातार ही 2011 से सरकारी अस्पतालों में बेड की स्थिति सुधरती गई है। 2011 में जो आंकड़ा 71 हजार 191 बेड का था, 2022 में वो बढ़कर 97000 पहुंच गया, यानी कि सीधे-सीधे 36.3 फीसदी की बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिली। नीचे दी गई टेबल से इस ट्रेंड को डीकोड करते हैं-
| वर्ष | बेड की संख्या |
| 2011 | 71,191 |
| 2012 | 77,210 |
| 2013 | 78,188 |
| 2014 | 78,566 |
| 2019 | 96,012 |
| 2022 | 97,000 |
बंगाल के स्वास्थ्य बजट का विश्लेषण
पश्चिम बंगाल कुल राशि के लिहाज से स्वास्थ्य पर कम खर्च करता है, लेकिन पिछले कुछ सालों का ट्रेंड दिखाता है राज्य सरकार ने लगातार इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। बंगाल सरकार के ही डेटा से पता चलता है कि 2017-18 में स्वास्थ्य पर 8 हजार 856 करोड़ खर्च हुए थे, 2023-24 तक वो आंकड़ा बढ़कर 18 हजार 490 करोड़ पहुंच गया। कोरोना काल में भी पश्चिम बंगाल ने स्वास्थ्य पर काफी खर्च किया है। 2019-20 में जो आंकड़ा 10 हजार 739 करोड़ था, 2020-21 में वो बढ़कर 12 हजार 831 पहुंच गया। 2025-26 की बात करें तो बंगाल सरकार ने बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 21 हजार 355 करोड़ रुपये आवंटित किए थे।
| वर्ष | स्वास्थ्य खर्च / बजट (₹ करोड़) |
| 2017–18 | 8,856 |
| 2019–20 | 10,739 |
| 2020–21 | 12,831 |
| 2023–24 | 18,490 |
| 2025–26 | 21,355 |
दूसरे शब्दों में कहें तो पश्चिम बंगाल में 2017-18 में स्वास्थ्य पर खर्च राज्य के कुल व्यय का 5.5 फीसदी रहा था। 2021-22 में ये आंकड़ा बढ़कर 7.4 प्रतिशत पहुंच गया। देश की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति कहती है कि राज्यों के कुल बजट का 8 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च होना चाहिए, उस लिहाज से बंगाल उस लक्ष्य से अभी कुछ दूर जरूर है, लेकिन वो आगे जरूर बढ़ रहा है।
बंगाल में कितनी बेरोजगारी?
बंगाल की ममता सरकार ने नौकरियों को लेकर कई दावे किए हैं। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey) 2025 बताता है कि बंगाल में वर्तमान में 15 से 29 वर्ष के लोगों के बीच में बेरोजगारी दर 10.6 फीसदी चल रही है, राष्ट्रीय औसत 9.9 फीसदी है। ग्रामीण बेरोजगारी दर की बात करें तो बंगाल में यह आंकड़ा 9.4 फीसदी चल रहा है, शहरी बेरोजगारी दर का आंकड़ा 13.9 फीसदी है।
अगर सभी एज ग्रुप की बात करें तो बंगाल में ग्रामीण बेरोजगारी दर 2.4 फीसदी है, वहीं शहरी बेरोजगारी दर 3.9 फीसदी दर्ज की गई है। कुल आंकड़ा 2.8 फीसदी का बैठता है। पिछले चार सालों का ट्रेंड भी कुछ पहलुओं पर रोशनी डालता है। नीचे दी गई टेबल से समझते हैं-
| वर्ष | भारत (%) | पश्चिम बंगाल (%) |
| 2022 | 10.90% | 8.40% |
| 2023 | 10.00% | 8.10% |
| 2024 | 10.30% | 9.70% |
| 2025 | 9.90% | 10.60% |
बंगाल में बेरोजगारी सिर्फ कम पढ़े-लिखों तक सीमित नहीं है। ग्रेजुएट और डिप्लोमा धारक भी बड़ी संख्या में नौकरी की तलाश में हैं। नीचे दी गई टेबल से देखें, किस शिक्षा स्तर पर कितने प्रतिशत लोग बेरोजगार चल रहे हैं-
| शिक्षा स्तर | पुरुष (%) | महिला (%) |
| पोस्ट ग्रेजुएट | 2.90% | 15.40% |
| ग्रेजुएट | 7.10% | 12.50% |
| डिप्लोमा | 5.70% | 13.80% |
| हायर सेकेंडरी | 4.00% | 7.70% |
| सेकेंडरी | 1.70% | 6.00% |
| मिडिल | 2.60% | 2.00% |
| प्राइमरी | 1.10% | 0.70% |
| अनपढ़ (Illiterate) | 0.30% | 0.10% |
बंगाल में कितने लोग गरीबी से बाहर आए?
नीति आयोग के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 2016 से 2021 के बीच में 92.58 लाख लोग गरीबी से बाहर आए हैं। 2016 में पश्चिम बंगाल में गरीबी दर 21.3 फीसदी थी, 2021 आते-आते 9.4 फीसदी की गिरावट देखने को मिली और आंकड़ा 11.9 फीसदी पर आ गया। 2022-23 को लेकर Multidimensional Poverty Index का डेटा बताता है कि बंगाल में गरीबी दर 8.60 फीसदी पहुंच गई है। देश के कुल राज्यों में बंगाल इस मामले में 15वें पायदान पर आता है।
देश की जीडीबी में बंगाल का कितना हिस्सा?
देश की जीडीपी में पश्चिम बंगाल का हिस्सा 2023-24 में सिर्फ 5.7 फीसदी रहा। 1960 में जहां बंगाल देश की जीडीपी में 10.5 फीसदी की हिस्सेदारी दे रहा था, साल दर साल वो घटता रहा और अब आंकड़ा मात्र 5.7 फीसदी पर सिमट गया है। जानकार मानते हैं कि बंगाल में समय के साथ ओद्योगिकीकरण कमजोर होता गया है, उसी वजह से आर्थिक मोर्चे पर उसके सामने कई चुनौतियां पेश हुई हैं। नीचे दी गई टेबल से इस ट्रेंड को समझिए-
| वर्ष | जीडीपी में हिस्सेदारी (%) |
| 1960–61 | 10.50% |
| 1970–71 | 9.70% |
| 1980–81 | 8.80% |
| 1990–91 | 7.90% |
| 2000–01 | 8.20% |
| 2010–11 | 6.70% |
| 2020–21 | 5.70% |
| 2023–24 | 5.60% |
नीति आयोग की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल अभी भी एक कृषि प्रधान राज्य है और यहां पर उद्योग से जुड़े विभाग अभी भी कमजोर प्रदर्शन कर रहे हैं। नीचे दी गई टेबल से 2012–13 से 2021–22 की औसत हिस्सेदारी समझने की कोशिश करते हैं।
| सेक्टर | हिस्सेदारी (%) |
| कृषि एवं संबद्ध गतिविधियां | 23.60% |
| व्यापार, होटल और रेस्टोरेंट | 15.90% |
| रियल एस्टेट, आवास एवं व्यवसाय सेवाएं | 12.70% |
| विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) | 12.30% |
| अन्य सेवाएं | 8.30% |
| निर्माण (कंस्ट्रक्शन) | 7.40% |
| परिवहन, भंडारण और संचार | 6.50% |
| बैंकिंग और बीमा | 5.30% |
| सार्वजनिक प्रशासन | 5.00% |
| बिजली, गैस और जल आपूर्ति | 2.00% |
| खनन एवं उत्खनन | 1.00% |
बंगाल का वित्तीय घाटा क्या कहता?
नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में पश्चिम बंगाल का वित्तीय घाटा 3.6 फीसदी है। राष्ट्रीय औसत से यह अभी भी ज्यादा है, लेकिन फिर भी नियंत्रण में कहा जा सकता। बंगाल का वित्तीय घाटे का ट्रेंड बताता है कि राज्य ने समय के साथ अपनी आर्थिक सेहत में सुधार किया है। नीति आयोग ने बंगाल के वित्तीय घाटे को लेकर एक स्पष्ट तस्वीर अपनी रिपोर्ट में पेश की थी-
| साल | घाटा (%) |
| 1998–99 | 8.80% |
| 2010–11 | 6.30% |
| 2022–23 | 4.00% |
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