पश्चिम बंगाल में बुधवार को दूसरे और आखिरी चरण का मतदान हो रहा है। मतदान खत्म होने के साथ ही 294 विधानसभा सीटों पर किस्मत आजमा रहे सभी उम्मीदवारों की किस्मत मतपेटी में कैद हो जाएगी। पहले चरण में बंपर वोटिंग के बाद से भारतीय जनता पार्टी यह दावा कर रही है कि पार्टी राज्य में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाएगी। दूसरी ओर सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस लगातार चौथी बार सरकार बनाने का दावा कर ही है।
हालांकि, राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा के लिए राज्य में जीत हासिल करने का रास्त आसान नहीं है। इसके पीछे कई गहरे राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण हैं। पहला और सबसे अहम है पार्टी की राज्य में क्षेत्रीय पकड़। ममता बनर्जी की पार्टी ने पिछले दो दशक में गांव-गांव तक मजबूत नेटवर्क बना लिया है। स्थानीय स्तर पर पार्टी की पकड़ इतनी गहरी है कि भाजपा के लिए उस जमीनी संरचना को तोड़ना आसान नहीं।
‘बाहरी’ बनाम ‘स्थानीय’ का नैरेटिव
बंगाल की राजनीति में “बाहरी” बनाम “बंगाली अस्मिता” का मुद्दा काफी असरदार रहा है। टीएमसी अक्सर भाजपा को बाहरी पार्टी के रूप में पेश करती है, जिससे स्थानीय मतदाताओं में भावनात्मक जुड़ाव बनता है। हालांकि, भाजपा इस नैरेटिव से उबरने की लगातार कोशिश कर रही है। यही वजह है कि अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी अगर चुनाव जीतती है तो मुख्यमंत्री बंगाली भाषी ही होगा, कोई बाहरी नहीं।
कल्याणकारी योजनाओं का असर
राज्य सरकार की योजनाएं जैसे कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार, स्वास्थ्य साथी सीधे गरीब और महिला वोटरों को प्रभावित करती हैं। इससे टीएमसी को स्थायी वोट बैंक मिला है, जिसे भाजपा के लिए तोड़ना चुनौतीपूर्ण है। यही वजह है कि भाजपा ने 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए अपने घोषणापत्र, जिसे ‘भरोसा पत्र’ कहा गया है, में महिलाओं के लिए कई प्रमुख वादे किए हैं।
इन वादों में महिलाओं को तीन हजार रुपये मासिक सहायता देने का वादा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की गर्भवती महिलाओं को 21 हजार रुपये की सहायता और पोषण किट देने का वादा, स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने पर अविवाहित छात्राओं को एकमुश्त 50 हजार का अनुदान देने का वादा किया गया है। साथ ही 75 लाख महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य रखा गया है।
अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण
बंगाल में बड़ा मुस्लिम वोट बैंक है, जो आमतौर पर भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर वोट करता है। इससे भाजपा की कई सीटें जीतने की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं, खासकर मुस्लिम मतदाता बहूल क्षेत्रों में। राज्य में मुख्य रूप से तीन जिले मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर मुस्लिम बहुल हैं। इसके अतिरिक्त, दक्षिण 24 परगना, बीरभूम, और नादिया जिलों में भी मुस्लिम आबादी का प्रतिशत काफी अधिक है। मुर्शिदाबाद राज्य की मुस्लिम राजनीति का मुख्य केंद्र है, जहां 22 विधानसभा सीटें हैं।
SIR प्रक्रिया का ‘उल्टा असर’
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का मुद्दा भी इस बार के चुनाव में वोटरों के बीच अहम है। इस मुद्दे को टीएमसी लगातार भुना रही है। पार्टी को उम्मीद है कि जिन लाखों लोगों को पहचान के संकट से जूझना पड़ा, जिनका नाम वोटर लिस्ट से कटा और फिर जुड़ा, वो भाजपा के खिलाफ गुस्सा दिखाएंगे।
SIR के मुद्दे ने वोटरों के बीच इमोशनल और राजनीतिक तनाव को काफी बढ़ा दिया है। यह निश्चित रूप से वोटरों के मूड पर असर डालेगा। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि इसका असर पहले से पता लगाया जा सके। इसका असर किसी भी खेमे को प्रभावित कर सकता है।
स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक कमजोरी
हालांकि भाजपा लगातार राज्य में मजबूत पार्टी की तरह उभर रहा है। इसके बावजूद बूथ स्तर पर संगठन अभी भी टीएमसी जितना मजबूत नहीं है। चुनाव जीतने में “ग्राउंड कैडर” बहुत अहम होता है। 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे साफ बताते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में उल्लेखनीय विस्तार जरूर किया है, लेकिन सत्ता तक पहुंचना अब भी उसके लिए एक कठिन चुनौती बना हुआ है।
नेतृत्व का अंतर
राज्य स्तर पर ममता बनर्जी का मजबूत और पहचान वाला चेहरा है, जबकि भाजपा को बंगाल में उसी स्तर का सर्वमान्य क्षेत्रीय नेता अभी तक नहीं मिला। इस कारण वोटर इस बात को लेकर अनिश्चित हैं कि वह वोट किसके लिए कर रहे। अगर भाजपा जितती है तो राज्य का मुखिया कौन होगा। यह फैक्टर जीत के रास्ते में बड़ा रोड़ा है। पार्टी इस नैरेटिव से उबरने की कोशिश कर रही है। हालांकि, यह जनता पर कितना असर डालेगी यह तो 4 मई को ही साफ हो पाएगा।
भाजपा के लिए मौके कहां हैं?
इन चुनौतियों के बीच भी पार्टी के लिए इस बार के चुनाव में कुछ प्लस प्वॉइंट भी हैं। शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पार्टी का समर्थन बढ़ रहा है। वोटर्स जो पहले वाम दलों को दलों को समर्थन देते थे, धीरे-धीरे भाजपा की ओर शिफ्ट हो रहे हैं। वहीं, राज्य के युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं में भी पार्टी ने पैठ बनाने की कोशिश की है। पार्टी ने राज्य की जनता को केंद्र सरकार की योजनाओं का प्रभाव दिखाया है। वहींं, राज्य में 15 साल से शासन कर रही टीएमसी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार के चुनाव में कोई स्पष्ट लहर दिखाई नहीं दे रही क्योंकि वोटर काफी हद तक साइलेंट हैं। ऐसे में फिलहाल यही मानना उचित होगा कि भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन भाजपा के लिए चुनाव जीतना “मुश्किल खेल” है क्योंकि उसे सिर्फ एक पार्टी नहीं, बल्कि एक मजबूत क्षेत्रीय पहचान, स्थापित नेटवर्क और सामाजिक समीकरणों से मुकाबला करना पड़ेगा।
यह भी पढ़ें – पिछले 10 साल में भाजपा बनी मुख्य चैलेंजर, आंकड़ों से समझिए बंगाल में भाजपा का उभार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा के बीच माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के आदि रूप भारतीय जन संघ (BJS) की स्थापना बंगाल के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी मगर आज तक बीजेएस या भाजपा, राज्य में सरकार नहीं बना सके हैं। 2016 के बाद से भाजपा ने खुद को बंगाल में मजबूत जरूर किया है। पूरी खबर पढ़ें…
