West Bengal Election News: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पर एसआईआर के मुद्दे के सामने भ्रष्टाचार, शिक्षा, सिंचाई, कृषि सहित अन्य क्षेत्रों में सरकार की विफलता के मुद्दे लगातार दब रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस ने अल्पसंख्यक बहुल सीटों को साधने के लिए 47 प्रत्याशियों को चुनावी समर में उतारकर, एक बड़े वर्ग को साधने की कोशिश की है। प्रदेश में 40 से 45 मुस्लिम सीट पर उतरने वाले उम्मीदवारों की इस चुनाव में निर्णायक भूमिका रहने की संभावना जताई जा रही है। एसआइआर के मुद्दे को लेकर लोगों की बेरुखी को भी भुनाने की राजनीतिक दलों की कोशिश है।
पश्चिम बंगाल की 294 सीट पर होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस ने 291 सीटों पर प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी जबकि दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की तीन सीटें सहयोगी पार्टी भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (बीजीपीएम) के उम्मीदवार चुनाव मैदान में होंगे। पार्टी ने 47 मुसलिम बहुल विधानसभा सीट पर मुसलिम उम्मीदवारों को उतारा है। प्रदेश में 25 फीसद से मुसलिम मतदाता हैं और जिन सीटों पर तृणमूल ने अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को उतारा है, उन जगहों पर 30 से 75 फीसद मुसलिम आबादी है।
विधानसभा चुनाव में एसआईआर का मुद्दा अहम
पश्चिम बंगाल चुनाव के बारे में रविंद्र भारती यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बिश्वनाथ चक्रवर्ती ने बातचीत में कहा, विधानसभा चुनाव में एसआईआर का मुद्दा सबसे अहम है। करीब 60 लाख लोगों के नाम काटने के बाद लोगों का रुझान एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस की तरफ होता दिख रहा है। हालांकि, प्रो चक्रवती ने कहा, 60 फीसद से अधिक लोगों में सत्ता विरोधी लहर है, फिर भी भारतीय जनता पार्टी इसे पूरी तरह समझ नहीं सकी। पश्चिम बंगाल में मतदान का रुझान अन्य राज्यों से काफी अलग हैं, इसलिए किसी और राज्य की तर्ज पर आगे बढ़ने का भाजपा को खास फायदा मिलने की उम्मीद कम है।
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उन्होंने कहा, किसी भी एक वर्ग विशेष पर केंद्रित होकर पश्चिम बंगाल में चुनाव में जीत की राह आसान नहीं है। यहां सभी संप्रदाय एक दूसरे वर्ग से न केवल, सामाजिक बल्कि आर्थिक तौर पर भी एक दूसरे पर निर्भर है। उन्होंने कहा, एसआइआर के मुद्दे को लेकर अल्पसंख्यकों के साथ वामदलों सहित अन्य पार्टियों का झुकाव तृणमूल कांग्रेस की तरफ और बढ़ने की संभावना और प्रबल हो गई है। प्रोफेसर चक्रवती के मुताबिक प्रदेश में शिक्षा, सिंचाई, कृषि और औद्योगिक विकास न के बराबर हुई।
टीएमसी को फायदा मिलने की संभावना प्रबल
बावजूद इस मौके को भुनाने में अभी तक किसी अन्य दल को सफलता नहीं मिल सकी है, जिसका फायदा तृणमूल कांग्रेस को मिलने की संभावना प्रबल होने लगी है। सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र, कोलकाता के एसोसिएट प्रोफेसर मैदुल इस्लाम ने कहा, इस चुनाव में एसआईआर का मुद्दा सबसे अहम है। इसका मकसद, वास्तविक मतदाताओं को उनका अधिकार दिलाना है। 2002 की सूची से मिलान किया गया, इससे लोगों को कई तरह की मुश्किलें पेश आर्इं और धीरे धीरे बेरुखी बढ़ती जा रही है। हालांकि, सूची में सुधार के बाद मतदाताओं को इसका फायदा मिलना चाहिए। एसआईआर के मुद्दे पर लोगों की भावनाओं को भुनाने के साथ ही तृणमूल कांग्रेस अपनी योजनाओं के साथ जनता के बीच उतर रही है। महिलाओं, 40 वर्ष तक के युवाओं, पुरोहितों और मौलवियों के लिए भत्ता बढ़ाने सहित अन्य योजनाओं के जरिए भी समर्थन हासिल करने में पार्टी जुट गई है।
मैदुल इस्लाम ने कहा, एसआइआर मुद्दे के बाद अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों, वामदलों समेत कई अन्य वर्गों का रुझान सत्तारूढ़ दल की तरफ बढ़ रहा है। पार्टी ने इस बार जितने नए चेहरों को उतारा है, उनमें ज्यादातर की पृष्ठभूमि राजनीतिक है और पहले कोई न कोई आंदोलन या अभियान से जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा, भाजपा के समर्थन में इसलिए कम लोग हैं क्योंकि रेलवे, नौकरियों के वादे, मनरेगा का बकाया समेत कई ऐसे मुद्दे हैं, जिससे साबित नहीं कर पाने की वजह से एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस को विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।
मुसलिम बहुल सीटों पर मतदाताओं की निर्णायक भूमिका
पश्चिम बंगाल की कुल 294 सीटों में से करीब 40 से 45 मुसलिम बहुल सीटों पर पर भूमिका निर्णायक रहने की उम्मीद है। इनमें मालदा, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में कई सीट हैं जहां 50 से 75 फीसद तक मुसलिम मतदाता हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस से निलंबित हुमायूं कबीर के अलग पार्टी बना लिया, लेकिन जानकारों का कहना है कि इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।
60 लाख मतदाताओं का भविष्य अधर में लटका
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का पहले चरण में अभी एक महीने का वक्त बचा है, लेकिन सत्ता दल और विपक्ष ने अपने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं, जोर-शोर से प्रचार शुरू हो गया है। पार्टी और प्रत्याशियों के घरों और दफ्तरों में रौनक छाई हुई है। इसके विपरीत राज्य के कई गांवों में अनिश्चितता और भय का माहौल छाया हुआ है, क्योंकि 60 लाख मतदाताओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है, जिनके नाम निर्णायक सूची में हैं। पढ़ें पूरी खबर…
