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सुभाष चंद्र बोस के परपोते ने मोदी सरकार से कहा- लोकतांत्रिक देश में नहीं कर सकते भय की राजनीति, गलत है कानून थोपना

उन्होंने कहा कि "एक बार विधेयक कानून के रूप में पास हो गया तो राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी है। उन्हें लागू करना ही होगा। यह कानूनी स्थिति है।”

पश्चिम बंगाल बीजेपी के उपाध्यक्ष चंद्र कुमार बोस (फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

पश्चिम बंगाल बीजेपी के उपाध्यक्ष और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परपोते चंद्र कुमार बोस ने कहा है कि नए नागरिकता कानून को लेकर देश भर में जारी विरोध प्रदर्शन के बीच हमें लोगों के पास जाना होगा और उन्हें कानून के फायदों को समझाना होगा। एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों पर कानून थोपा नहीं जा सकता है। रविवार को उन्होंने कहा कि “हमारा काम लोगों को यह समझाना है कि हम सही हैं और वे गलत हैं।”

कानून बनने के बाद विरोध अनुचित: सीएए पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि “एक बार विधेयक कानून के रूप में पास हो गया तो राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी है। यह कानूनी स्थिति है, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में आप हमारे देश के नागरिकों के साथ कोई भी अपमानजनक व्यवहार नहीं कर सकते हैं। सिर्फ इसलिए कि आज हमारे पास संख्या है, हम भय की राजनीति नहीं कर सकते।”

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कहा हमारा दृष्टिकोण अलग होना चाहिए: बोस ने बताया कि उन्होंने विधेयक में कुछ ऐसे संशोधनों का सुझाव दिया है, जिससे विपक्ष का पूरा अभियान ही बेकार हो जाएगा। “हमें विशेष रूप से यह समझाने की आवश्यकता है कि यह विधेयक सताए गए अल्पसंख्यकों के लिए है। हमें किसी भी धर्म का उल्लेख नहीं करना चाहिए। हमारा दृष्टिकोण अलग होना चाहिए।”

पूरे देश में विपक्ष कर रहा विरोध: सीएए की वजह से पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने तो इसको खत्म ही कर देने का आह्वान किया। पश्चिम बंगाल में विरोध-प्रदर्शन सबसे ज्यादा है। वहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और सीएम ममता बनर्जी ने कसम खाई है कि वह अधिनियम को अपने राज्य में लागू नहीं होने देंगी। देश में कानून के क्रियान्वयन को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है, इसमें कहा गया है कि राज्यों को केंद्र को चुनौती देने का अधिकार है और “असंवैधानिक कानून” को लागू करने के लिए “मजबूर” नहीं किया जा सकता है जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय में इस पर याचिका का निर्णय नहीं हो जाता है।

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