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पश्‍चिम बंगाल में ऐसे बढ़ी भाजपा, तीन साल में 10 से 40 फीसदी हो गया वोट शेयर

पश्चिम बंगाल में बीजेपी का सत्ता संघर्ष जारी है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी लगातार इन्हीं विरोध-प्रदर्शन के आधार पर राज्य में अपनी जमीन मजबूत करती जा रही है। इसका बेहतर परिणाम 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को मिल चुका है। लिहाजा, इस संघर्ष को बीजेपी 2021 तक जारी रखना चाहती है ताकि पूरब के इस बड़े राज्य में दो साल बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में जीत दर्जकर भगवा सरकार बनाई जा सके। नीलांजन सरकार का आलेख-

बीजेपी ने वोट परसेंट बढ़ाने के लिए न सिर्फ हिन्दू मतदाताओं का धुवीकरण किया बल्कि ममता बनर्जी की छवि हिन्दू विरोधी और मुस्लिम हितैषी राजनेता के रूप में भी बनाई। (एक्सप्रेस फोटो)

पश्चिम बंगाल में 2019 के चुनावी नतीजों पर गौर करें तो पता चलता है कि तीन साल पहले 2016 के विधान सभा चुनाव में बीजेपी को मात्र 10 फीसदी वोट मिले थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 40.25 फीसदी हो गया, जबकि 2016 में 45 फीसदी वोट पाने वाली ममता बनर्जी की पार्टी का वोट परसेंट घटकर 43.28 फीसदी रह गया। इससे स्पष्ट है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में जबर्दस्त ध्रुवीकरण की राजनीति की है। इस दौरान कांग्रेस और वामदलों ने भी अनुकूल हवा बनाने में बीजेपी की मदद की। 2014 के चुनावों में इन दोनों का वोट शेयर जोड़ दें तो वह 39 फीसदी के करीब था मगर 2019 में घटकर यह मात्र 13 फीसदी पर सिमट गया। यानी ये वोट बीजेपी की तरफ स्थानांतरित हो गए। 2014 में राज्य में बीजेपी को 17.2 फीसदी वोट मिले थे जो 2019 में बढ़कर 40.25 फीसदी हो गए। यानी 2014 के मुकाबले बीजेपी को करीब 23 फीसदी वोट का फायदा हुआ है और 2016 के मुकाबले 30 फीसदी की बढ़त।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी ने वोट परसेंट बढ़ाने के लिए न सिर्फ हिन्दू मतदाताओं का धुवीकरण किया बल्कि ममता बनर्जी की छवि हिन्दू विरोधी और मुस्लिम हितैषी राजनेता के रूप में भी बनाई। सोशल मीडिया पर बीजेपी ने ममता के खिलाफ जबर्दस्त तरीके से कैम्पेनिंग की। पिछले साल हुए पंचायत चुनावों में जिस तरह हिंसा हुई और करीब 34 फीसदी सीटों पर निर्विरोध टीएमसी कार्यकर्ताओं का चुनाव हुआ, उससे राज्य में ममता सरकार के खिलाफ एक उबाल था, बीजेपी ने इस उबाल को वोट में तब्दील करने में अहम सफलता पाई। कांग्रेस और वाम दलों ने भी उस दौरान ममता के खिलाफ हवा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। हालांकि, अगर कांग्रेस और टीएमसी मिलकर चुनाव लड़ते तो स्थिति कुछ और रह सकती थी।

2019 के चुनावों में कांग्रेस और टीएमसी के वोट परसेंट को जोड़ दें तो यह करीब 49 फीसदी हो जाता है जो बीजेपी के वोट परसेंट से करीब 9 फीसदी ज्यादा है। ऐसे में बीजेपी को छह सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता था और गठबंधन 30 सीटें जीत सकता था लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व के जबर्दस्त विरोध की वजह से राज्य में टीएमसी-कांग्रेस का चुनावी गठबंधन नहीं हो सका और बीजेपी ने अभूतपूर्व सफलता हासिल करते हुए 42 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस-टीएमसी गठबंधन की स्थिति में जिन छह सीटों से बीजेपी को हाथ धोना पड़ सकता था उनमें बालुरघाट, बैरकपोर, बर्धमान-दुर्गापुर, झारग्राम, मालदा उत्तर और रायगंज शामिल है। मालदा और मुर्शिदाबाद में मुस्लिम आबादी की वजह से कांग्रेस का परंपरागत गढ़ रहा है लेकिन कांग्रेस की कमजोर स्थिति और हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की वजह से इन इलाकों में भी बीजेपी को बढ़त मिल गई।

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2019 में एक नई शुरुआत की और अनुसूचित जाति और जनजाति के मतदाताओं को भी अपने पाले में करने में कामयाब रही। 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में 23 फीसदी अनुसूचित जाति (एससी) और 5.5 फीसदी अनुसूचित जनजाति (एसटी) आबादी है। बीजेपी हिन्दू राष्ट्रवाद का कार्ड दिखाकर करीब 28 फीसदी (एससी-एसटी) आबादी को अपने पाले में करने में कामयाब रही है।

इसका स्पष्ट उदाहरण उन इलाकों में मिलता है, जहां एससी आबादी 17 फीसदी से कम है, वहां बीजेपी को 32 फीसदी वोट मिले लेकिन जहां एससी आबादी 32 फीसदी से ज्यादा है, वहां बीजेपी को 42 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। इसी तरह जहां-जहां एसटी आबादी 0.5 फीसदी और उससे कम है, वहां बीजेपी को 37 फीसदी वोट मिले, जबकि जहां एसटी आबादी 11 फीसदी से ज्यादा है, वहां बीजेपी को 50 फीसदी वोट मिले। यानी स्पष्ट है कि एससी और एसटी समुदाय के लोगों ने इस बार बीजेपी को वोट दिया है। इसके पीछे के कारणों में ममता सरकार के खिलाफ रोष, धार्मिक ध्रुवीकरण और मोदी सरकार की योजनाओं का लाभ भी शामिल हो सकता है।

(नीलांजन सरकार अशोक यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के वरिष्ठ विजिटिंग फेलो हैं।)

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