पश्चिम बंगाल विधानसभा का पहला सत्र गुरुवार को समाप्त हो गया। लेकिन सदन में विपक्ष की भूमिका जितनी स्पष्ट होनी चाहिए थी, उतनी दिखाई नहीं दी। इसकी वजह रही टीएमसी के अंदर चल रही आपसी लड़ाई। विधानसभा में टीएमसी के दो गुट एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आए। कई बार तो ऐसा भी देखने को मिला कि एक गुट ने बीजेपी सरकार से ही दूसरे टीएमसी गुट के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर डाली।

एक दिलचस्प मौका तब आया, जब विधानसभा अध्यक्ष ने टीएमसी के बागी गुट के मुख्य सचेतक अखरुज्जमान को बजट पर बोलने के लिए 8 मिनट दिए। उन्होंने अपने हिस्से के 2 मिनट टीएमसी के दूसरे गुट के मुख्य सचेतक शोभनदेब चट्टोपाध्याय को दे दिए। हैरानी की बात यह रही कि बागी गुट की विधायक सबीना यास्मीन उन 2 मिनटों पर अपना दावा जता रही थीं, लेकिन समय दूसरे गुट के नेता को दे दिया गया।

विधानसभा में एक और दिलचस्प तस्वीर तब देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी राज्यपाल के अभिभाषण पर जवाब दे रहे थे। उसी दौरान टीएमसी के बागी गुट ने सदन से वॉकआउट कर दिया। बागी नेताओं का कहना था कि चुनाव के बाद उनके समर्थकों पर हुई हिंसा का राज्यपाल के भाषण में कहीं भी जिक्र नहीं किया गया। इस दौरान बागी गुट के नेता फिरहाद हकीम ने टीएमसी के दूसरे गुट के नेता कुणाल घोष और शोभनदेब चट्टोपाध्याय से भी वॉकआउट में शामिल होने की अपील की, लेकिन दोनों नेताओं ने ऐसा करने से इनकार कर दिया।

इसके बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तंज कसते हुए कहा, “अच्छी टीएमसी तो सदन से बाहर चली गई, लेकिन कालीघाट टीएमसी सदन में ही बैठी रही।” यहां कालीघाट टीएमसी से उनका इशारा ममता बनर्जी के गुट की ओर था।

वहीं, ममता बनर्जी के समर्थकों का कहना था कि उन्होंने सदन से वॉकआउट इसलिए नहीं किया क्योंकि वे अपनी जिम्मेदारी निभाना चाहते थे। कुणाल घोष ने कहा, “हमें लगा कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का विधानसभा में यह पहला भाषण है। ऐसे में हमें वॉकआउट नहीं करना चाहिए, बल्कि उनका भाषण सुनना चाहिए।”

जानकारी के लिए बता दें कि टीएमसी के अंदर जारी खींचतान लगातार बढ़ती जा रही है। दावा किया गया कि बागी गुट के पास पार्टी के 80 में से 62 विधायकों का समर्थन है। विधानसभा में भी कुणाल घोष को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा। उनके भाषण के दौरान बीजेपी विधायकों ने पूछ लिया कि आखिर वे टीएमसी के किस गुट में हैं। इस पर कुणाल घोष ने जवाब दिया, “मेरी उंगली पर लगी स्याही अभी तक नहीं मिटी है। मैं कोई गद्दार नहीं हूं।”

सदन में विवाद तब और बढ़ गया, जब बीजेपी विधायक टीएमसी के बागी गुट के नेता ऋतब्रत बनर्जी के समर्थन में उतर आए। इसी बीच कुणाल घोष ने सवाल उठाया कि “जिस व्यक्ति पर दुष्कर्म का आरोप है, उसे विपक्ष का नेता कैसे बनाया जा सकता है?” विधानसभा अध्यक्ष ने उन्हें ऐसी टिप्पणी करने से रोका, लेकिन घोष ने अपनी बात जारी रखी। इसके बाद बीजेपी विधायक उनके विरोध में खड़े हो गए। कुणाल घोष ने यह भी आरोप लगाया कि बागी गुट के जिन विधायकों पर भ्रष्टाचार के मामले हैं, उनके खिलाफ सरकार कार्रवाई नहीं कर रही क्योंकि वे अब बीजेपी के करीब हैं।

विधानसभा की तस्वीर इसलिए भी बदली हुई नजर आई क्योंकि टीएमसी के बागी विधायक दिनेन रॉय ने राज्य सरकार के बजट की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “यह अभूतपूर्व बजट है। जो अच्छा है, उसे अच्छा कहना चाहिए। हम इस बजट का पूरी तरह स्वागत करते हैं।”

इसके बाद बीजेपी विधायक सजल घोष ने तंज कसते हुए कहा, “अभी जो नेता बोल रहे थे, उन्हें सुनकर मैं खुद भ्रमित हो गया। समझ नहीं आया कि वे विपक्ष के विधायक हैं या सत्ता पक्ष के। मुझे तो लगता है कि वे सिर्फ यह जताना चाहते हैं कि वे बीजेपी में शामिल होने के इच्छुक हैं।” हालांकि, शुभेंदु सरकार को बजट पास कराने में ज्यादा मुश्किल नहीं हुई। बजट बिना किसी बदलाव के ही विधानसभा से पारित हो गया।

वहीं, सदन के बाहर भी टीएमसी की अंदरूनी लड़ाई साफ दिखाई दी। विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान लिया। इसके बाद बागी गुट को विधानसभा में वही कमरा और हॉल आवंटित कर दिया गया, जो विपक्ष के नेता को मिलता है। इससे नाराज ममता समर्थक नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय, कुणाल घोष और असीमा पात्रा ने विरोध जताया। शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने तो अपने गुट के लिए अलग कमरे की भी मांग कर दी।

इस पूरे घटनाक्रम पर एक वरिष्ठ बीजेपी विधायक ने कहा, “हमें यह स्थिति पसंद आ रही है, क्योंकि विपक्षी दलों के बीच लड़ाई होना हमारे लिए हमेशा फायदे की बात होती है। वे सरकार पर हमला करने के बजाय एक-दूसरे पर ही हमला कर रहे हैं।”

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