पश्चिम बंगाल में बुधवार को दूसरे चरण का मतदान जारी है। उत्तर में सीमावर्ती जिलों से लेकर दक्षिण में शहरी आबादी वाले औद्योगिक पट्टी तक के कुल 142 सीटों पर मतदाता आज कुल 1,448 उम्मीदवार की किस्मत का फैसला करेंगे। इस बार का चुनाव मूल रूप से सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही है। हालांकि, एक शांत लेकिन अहम फैक्टर है जो चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है। वाम दलों और कांग्रेस के गठबंधन का वोट शेयर। इसे साल 2021 के चुनाव के बाद से अनदेखा किया जा रहा है, लेकिन अगर इस साल वोटरों का मिजाज जरा भी बदला तो चुनाव परिणाम में बदलाव निश्चित है।

चुनाव आयोग के साल 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव के डेटा का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि संयुक्त मोर्चा जिसमें वाम दल, कांग्रेस और आईएसएफ शामिल हैं, उसको भले ही केवल एक सीट पर जीत मिली। लेकिन इसका वोट शेयर 117 विधानसभा क्षेत्रों में जीत के अंतर से अधिक रहा। यह 294 सदस्यीय विधानसभा का लगभग 40 प्रतिशत है। इन 117 सीटों में 74 पर टीएमसी ने जीत दर्ज की थी। जबकि 43 सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों ने बाजी मारी थी।

हालांकि, करारी हार के बावजूद यह हैरान करने वाली बात थी कि वाम दल और कांग्रेस के गठबंधन ने टीएमसी के खिलाफ वोटों का बंटवारा कर दिया था। संयुक्त मोर्चा की इकलौती सीट भांगर रही, जिसे आईएसएफ ने जीता। जबकि वाम दलों और कांग्रेस दोनों का खाता तक नहीं खुल पाया। लेकिन आईएसएफ को अलग भी कर दें, तब भी वाम-कांग्रेस का वोट शेयर 108 विधानसभा क्षेत्रों में जीत के अंतर से अधिक था। यानी जो गठबंधन चुनावी तौर पर हाशिये पर दिख रहा था, वह वोटों की गणित के रूप से काफी अहम था।

यही वजह है कि इस बार टीएमसी सिर्फ अपने वोट बैंक को बनाए रखने पर ही ध्यान नहीं दे रही, बल्कि वाम दलों और कांग्रेस के प्रदर्शन पर भी उसकी नजर है। चुनाव से पहले टीएमसी के एक नेता ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा था, “हम चाहते हैं कि वाम दल और कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करें। इससे हमें फायदा होगा।”

बंगाल में दूसरे चरण का चुनाव क्यों है अहम?

बंगाल में दूसरे चरण का रण अहम है क्योंकि उक्त 117 सीटों में से 54 सीटों पर इस चरण में मतदान होना है। इनमें बंगाल का शहरी और औद्योगिक क्षेत्र, जिसमें कोलकाता, हावड़ा, हुगली, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना के साथ-साथ बर्दवान और मेदिनीपुर के कुछ हिस्से शामिल हैं। यह जियोग्राफिकल फैक्टर काफी अहम है। पहले चरण के उलट दूसरा चरण शहरी, अर्ध-शहरी इलाकों और औद्योगिक कॉरिडोर में फोकस करता है। पहला चरण जिसमें उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती जिले शामिल थे, इसमें मुकाबला काफी हद तक ध्रुवीकृत था।

दूसरे चरण में शामिल विधानसभा सीटें वह क्षेत्र हैं जहां वाम दलों की ऐतिहासिक रूप से मजबूत पकड़ रही है। यहां पर पार्टी का वोटबैंक ट्रेड यूनियनों, नगर निकायों के नेटवर्क और शहरी कैडर के जरिए बनी रही है। यहां के मतदाता शहरी शासन, रोजगार और स्थानीय भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे मुद्दे जो वाम दलों के एजेंडे में हैं और जिन पर वे इस बार फिर से पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

साथ ही, इन “अहम” सीटों का एक बड़ा हिस्सा दक्षिण बंगाल में आता है, जहां टीएमसी ने 2021 में शानदार प्रदर्शन किया था। जैसे डायमंड हार्बर में सीपीआई-एम को करीब 17 प्रतिशत वोट मिले, जबकि टीएमसी की जीत का अंतर लगभग 7 प्रतिशत ही रहा था। इसी तरह, हावड़ा उत्तर में वाम दलों का लगभग 5 प्रतिशत वोट शेयर भी टीएमसी की 3 प्रतिशत की मामूली जीत के अंतर से अधिक था।

वहीं, उत्तरपाड़ा में सीपीआई-एम को करीब 21 प्रतिशत वोट मिले, जो उस 18 प्रतिशत के अंतर से ज्यादा था, जिससे बीजेपी यहां टीएमसी से हारी थी। इसी तरह के पैटर्न अन्य सीटों पर भी देखने को मिला था। सिंगुर में सीपीआई-एम का 14 प्रतिशत वोट शेयर टीएमसी की 12 प्रतिशत जीत के अंतर से ज्यादा था।

चंदननगर में सीपीआई-एम को करीब 19 प्रतिशत वोट मिले, जबकि टीएमसी का जीत का अंतर लगभग 17 प्रतिशत था। दुर्गापुर पूर्व में वाम दलों को करीब 15 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि टीएमसी केवल 2 प्रतिशत के अंतर से जीती थी। पांडुआ में भी वाम दलों का लगभग 19 प्रतिशत वोट शेयर जीत के अंतर से अधिक रहा।

बर्धमान उत्तर में सीपीआई-एम का लगभग 12 प्रतिशत वोट शेयर उस अंतर से ज्यादा था, जिससे बीजेपी टीएमसी से हारी थी। सोनारपुर दक्षिण में सीपीआई को करीब 14 प्रतिशत वोट मिले, जबकि टीएमसी का जीत का अंतर लगभग 11 प्रतिशत था। यहां तक कि जिन सीटों पर वाम-कांग्रेस गठबंधन सीधे तौर पर जीत के अंतर से आगे नहीं था, वहां भी उसकी मौजूदगी महत्वपूर्ण रही। हावड़ा दक्षिण में सीपीआई-एम को करीब 13 प्रतिशत और संक्रैल में 15 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे।

अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक को शिबपुर में लगभग 14 प्रतिशत वोट मिले थे। पांचला और उलुबेरिया में आईएसएफ समर्थित आरएसएससीएमजेपी प्रतीक पर लड़ने वाले उम्मीदवारों को करीब 16-16 प्रतिशत वोट मिले थे। जादवपुर में सीपीआई-एम को लगभग 27 प्रतिशत वोट मिले, जिससे बीजेपी तीसरे स्थान पर चली गई थी।

यह गणित इस बात की ओर इशारा करता है कि वाम-कांग्रेस के वोट शेयर में कोई भी बदलाव इस बार चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। अगर यह स्थिर रहता है या कुछ सीटों पर थोड़ा बढ़ता है, तो यह टीएमसी के खिलाफ वोटों का बंटवारा कर सकता है, जिससे भाजपा के लिए विपक्षी समर्थन को एकजुट करना मुश्किल हो जाएगा।

भाजपा की ओर खिसक गया वोट बैंक

हालांकि, इसका उल्टा भी संभव है। 2016 से 2021 के बीच वाम दलों का एक बड़ा पारंपरिक वोट बैंक भाजपा की ओर खिसक गया था। अगर यह रुझान जारी रहता है, तो भाजपा को अधिक सघन वोट एकजुटता का फायदा मिल सकता है। ऐसे चरण में, जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम रहने की उम्मीद है, 2–3 प्रतिशत का छोटा सा बदलाव भी निर्णायक साबित हो सकता है। संयुक्त मोर्चा को 2021 के चुनाव में करीब 9 प्रतिशत वोट मिले थे।

2021 में एक भी सीट नहीं पाने के बाद सीपीआई-एम ने पूरी तरह से वापसी के बजाय रणनीतिक बैलेंस बनाने की कोशिश की है। इस बार के चुनाव में पार्टी ने अपने छात्र और युवा संगठनों से नए नेताओं को आगे किया है। बूथ स्तर पर संगठन को फिर से खड़ा करने का प्रयास किया है और डिजिटल पहुंच बढ़ाई है। उसका अभियान रोजगार, औद्योगिक गिरावट और भ्रष्टाचार जैसे आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित रहा है।

साथ ही वाम दलों ने टीएमसी और भाजपा दोनों को नाकाफी विकल्प के रूप में पेश किया गया है। सीपीआई-एम की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने कहा, “लोग तृणमूल से नाराज हैं और उनका भरोसा पार्टी से उठ गया है, इसलिए वे विकल्प तलाश रहे हैं। पहले लोग भाजपा को विकल्प मान रहे थे, लेकिन उसके प्रचार के तरीके से साफ है कि वह भी विकल्प नहीं है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भवानीपुर में एक भी बैठक नहीं की, वे कोलकाता में ही डेरा डाले हुए हैं।”

चक्रवर्ती ने दावा किया कि वाम दलों समर्थन बढ़ रहा है। उन्होंने कहा, “वाम रैलियों में लोगों की भागीदारी काफी बड़ी है। लाल झंडों की लहर दिखाई दे रही है, जिससे लोगों का रुख साफ है। पंचायत चुनावों में वाम दलों का प्रदर्शन बीजेपी से बेहतर रहा था। इस बार भी लोगों की मंशा वही है और वे वाम के साथ जाने में रुचि दिखा रहे हैं।”

हालांकि, इन प्रयासों के बावजूद चुनौतियां बरकरार हैं। टीएमसी और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला अब भी मतदाताओं की सोच पर हावी है, और खासकर चुनिंदा शहरी व औद्योगिक इलाकों से बाहर वाम दलों का संगठनात्मक क्षरण अब तक पूरी तरह नहीं रुक पाया है। इसके अलावा कांग्रेस इस बार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ रही है, जिससे एकजुट तीसरे मोर्चे की संभावना और कमजोर हो गई है।

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सांसद महुआ मोइत्रा ने बुधवार को तृणमूल कांग्रेस की ओर से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को “लोकतंत्र बचाने की लड़ाई” बताया। उन्होंने मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आरोप लगाते हुए भरोसा जताया कि जनता इसका जवाब भारी मतदान के जरिए इस चरण में भी देगी। नदिया जिले के करीमपुर गर्ल्स हाई स्कूल स्थित मतदान केंद्र संख्या 120 पर वोट डालने के बाद मोइत्रा ने कहा, “चुनाव आयोग ने मोटरसाइकिल से आने से मना किया था, इसलिए हम टोटो से आए हैं।” पूरी खबर पढ़ें…