पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का असर अब सिर्फ तेल और ईंधन तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका प्रभाव भारत में इस्तेमाल होने वाली कई रोजमर्रा की चीजों पर भी पड़ रहा है। इसमें इंस्टेंट नूडल्स, जूस, दूध के पैकेट, पेय पदार्थ से लेकर बड़ी कार कंपनियों के पुर्जों तक शामिल हैं। सबसे बड़ी समस्या सप्लाई चेन के टूटने और पैकेजिंग मटेरियल की कमी की है। इसी कारण नेस्ले इंडिया को पैकेजिंग सामग्री की कमी का सामना करना पड़ रहा है। बताया जा रहा है कि इसके चलते कंपनी की कुछ फैक्ट्रियों में मैगी नूडल्स का स्टॉक जमा हो गया है और उसका समय पर डिस्पैच नहीं हो पा रहा है।

देश की कई बड़ी कंपनियां ऊर्जा बचाने के लिए उत्पादन में कटौती कर रही हैं। पश्चिम भारत में एक बड़ी फूड प्रोसेसिंग कंपनी ने सरकारी सलाह के बाद अपने प्लांट में बिजली और गैस की खपत कम कर दी है। कुछ कर्मचारियों को घर से काम करने को कहा गया है ताकि फैक्ट्री सीमित संसाधनों में चलती रहे।

पैकेजिंग लागत बढ़ने का सीधा असर कीमतों पर भी दिख रहा है। बिसलेरी ने अपने 1 लीटर पानी की बोतल की कीमत 18 रुपये से बढ़ाकर 20 रुपये कर दी है। वहीं कोका-कोला की एक बड़ी बॉटलिंग कंपनी भी आने वाले समय में कीमतें बढ़ाने की तैयारी में है। ऑटोमोबाइल सेक्टर भी इस संकट से प्रभावित हुआ है। टाटा मोटर्स और मर्सिडीज-बेंज जैसी कंपनियों ने हाल ही में कीमतें बढ़ाई हैं, जबकि मारुति सुजुकी ने भी छोटे कारों के दाम बढ़ाने की बात कही है। बीएमडब्ल्यू ग्रुप इंडिया ने भी 2% तक कीमतें बढ़ाई हैं।

सरकार की ओर से तेल और एलपीजी की सप्लाई को प्राथमिकता दी जा रही है, जिससे पेट्रोकेमिकल उद्योग जैसे प्लास्टिक और केमिकल उत्पादन पर असर पड़ा है। इससे पैकेजिंग इंडस्ट्री और भी कमजोर हो गई है और कई जगह उत्पादन घट गया है। कई कंपनियां अब अपने उत्पादों की मात्रा कम कर रही हैं, जिसे ‘श्रिंकफ्लेशन’ कहा जाता है, यानी दाम वही लेकिन मात्रा कम।

ऊर्जा बचाने के लिए सरकार ने उद्योगों को उत्पादन कम करने और इलेक्ट्रिक ऊर्जा के उपयोग की सलाह दी है। भारी उद्योग मंत्रालय ने भी कंपनियों को वैकल्पिक सामग्री इस्तेमाल करने को कहा है। मारुति सुजुकी के अनुसार कच्चे माल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, इसलिए दाम बढ़ाना जरूरी हो गया है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की मैन्युफैक्चरिंग गतिविधि मार्च में घटकर 53.9 रह गई, जो चार साल में सबसे कम है। साथ ही लागत महंगाई 43 महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो 15 अप्रैल के बाद कई और चीजों के दाम बढ़ सकते हैं।

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इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में वैश्विक राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां ‘शक्ति ही सत्य है’ की अवधारणा पुनर्जीवित हो गई है। दुनिया का सबसे धनी देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सबसे बड़ा वित्तपोषक होने के नाते अमेरिका ने स्वयं को एक ऐसे ‘वैश्विक दारोगा’ के रूप में स्थापित कर लिया है, जिसे रोकने का साहस वर्तमान में किसी भी अंतरराष्ट्रीय इकाई के पास नहीं दिखता। संयुक्त राष्ट्र से लेकर विश्व बैंक तक, अधिकांश संस्थाएं अमेरिकी संसाधनों पर टिकी हैं। ऋण के जाल में फंसे देश हों या व्यापारिक समझौतों की बैसाखियों पर टिकी अर्थव्यवस्थाएं, कोई भी अमेरिका की नीतियों के विरुद्ध स्वर मुखर करने की स्थिति में नहीं है। इसी वर्चस्व की अगली कड़ी ईरान और अमेरिका-इजराइल के सैन्य संघर्ष के रूप में एक महीने से भी अधिक समय तक दिखती रही। मगर अब अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम पर समझौता हुआ है। इसके बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि स्थायी शांति की राहें निकलेंगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक