आरएसएस प्रमुख मोहन भगवत की यह टिप्पणी कि बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे युवाओं से बातचीत में देरी करके गलती की है, संघ परिवार के हलकों में परीक्षा पेपर लीक के विरोध में चल रहे छात्र आंदोलन पर एक टिप्पणी से कहीं अधिक के रूप में देखी जा रही है।
संघ के ताने-बाने में यह वास्तव में एक परिचित पैटर्न में फिट बैठता है। आरएसएस सार्वजनिक रूप से कुछ राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों को बीजेपी सरकार द्वारा संभालने के तरीके पर अपनी असहमति जताता है, लेकिन सीधे टकराव से बचता है।
कमियां तो रही हैं- मोहन भागवत
गुरुवार को मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए, भागवत ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों से बातचीत शुरू करने में सरकार की देरी के बारे में पूछे जाने पर कहा, “कमियां तो रही हैं।” उन्होंने तर्क दिया कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक संवाद का एक वैध रूप है, युवा प्रदर्शनकारियों को राष्ट्र-विरोधी करार देने के खिलाफ चेतावनी दी और इस बात पर जोर दिया कि भारत के एजुकेशन सिस्टम को लेकर चिंताएं वास्तविक हैं और उन्हें खारिज करने के बजाय उनसे बातचीत करने की जरूरत है।
आरएसएस प्रमुख ने कहा, “जब कोई ऐसी घटना घटित होती है जो नहीं होनी चाहिए, तो स्पष्ट है कि कोई गलती हुई है। कमी तो रही है। ऐसा होना चाहिए था। हमें यह भी देखना चाहिए कि अगर जेन-जी विरोध कर रही है, तो वह हमारे विरोध में नहीं है। वह किसी समस्या का सामना कर रही है। उस समस्या का समाधान ढूंढना होगा।”
आरएसएस और बीजेपी के बीच संबंधों से परिचित लोगों का कहना है कि भागवत के हस्तक्षेप को संघ की वैचारिक मार्गदर्शक के रूप में लंबे समय से चली आ रही भूमिका के संदर्भ में सबसे अच्छी तरह समझा जा सकता है, जो समय-समय पर इसकी राजनीतिक शाखा को सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
अटल बिहारी वाजपेयी के दौर के संघ के विपरीत, मोहन भगवत के नेतृत्व वाला आरएसएस शायद ही कभी भाजपा सरकार से सीधे तौर पर भिड़ता है। इसके बजाय, जब वे दखल देते हैं, तो आमतौर पर सरकार की मुख्य दिशा को तो मानते हैं, लेकिन साथ ही उसके काम को लागू करने, बातचीत या राजनीतिक रणनीति में कमियों की ओर भी इशारा करते हैं।
यह तरीका 2020-21 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों (जिन्हें बाद में रद्द कर दिया गया) के खिलाफ हुए किसान आंदोलन के दौरान साफ तौर पर देखा गया था, यह वह आखिरी मौका था जब नरेंद्र मोदी सरकार किसी आंदोलन के दबाव में झुकी थी। जब 2020 और 2021 में किसानों का विरोध-प्रदर्शन जारी रहा (जो मुख्य रूप से दिल्ली की सीमाओं पर हो रहा था), तो सरकार ने समाधान खोजने में आनाकानी की और गतिरोध कई महीनों तक बना रहा।
जनवरी 2021 में आरएसएस के तत्कालीन महासचिव भैयाजी जोशी ने खुले तौर पर संवाद की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने तब इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, “यह महत्वपूर्ण है कि हम वह बिंदु खोजें जहां दोनों पक्ष सहमत हो सकें और आंदोलन समाप्त हो सके। लंबे समय तक चलने वाला कोई भी आंदोलन लाभकारी नहीं होता। एक मध्य मार्ग खोजना होगा और दोनों पक्षों को समाधान खोजने के लिए काम करना होगा।”
आरएसएस नेतृत्व के बयान ने सरकार की संकट को राजनीतिक रूप से हल करने में असमर्थता पर सवाल उठाया। दस महीने बाद प्रधानमंत्री मोदी ने तीनों कानूनों को निरस्त करने की घोषणा की।
2024 के चुनावों के बाद संदेश
2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला और उसकी सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। एक दशक में यह पहली बार था जब पार्टी को सरकार बनाने के लिए अपने एनडीए सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा। चुनावी नतीजे घोषित होने के बाद भागवत ने टिप्पणी की कि सच्चा सेवक अहंकारी नहीं होता और दूसरों को धक्का दिए बिना सीमा के भीतर रहकर काम करता है। उन्होंने कहा, “सच्चा सेवक मर्यादा बनाए रखता है। वह आसक्ति नहीं रखता, उसे इस बात का घमंड नहीं होता कि यह काम मैंने किया है। केवल वही सेवक कहला सकता है।”
हालांकि, उन्होंने बीजेपी का नाम नहीं लिया, लेकिन आरएसएस प्रमुख की इन बातों को पार्टी को मिली हार के बाद उसके नेतृत्व के लिए एक संदेश के तौर पर देखा गया। उनके बयान के समय ने इस बात को और पुख्ता कर दिया। यह बयान तब आया था जब बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि बीजेपी संगठनात्मक रूप से आत्मनिर्भर हो गई है और अब वह आरएसएस पर उस तरह निर्भर नहीं है, जैसी पहले हुआ करती थी।
इस प्रकार भागवत की टिप्पणियों को केवल एक नैतिक टिप्पणी के रूप में ही नहीं, बल्कि इस बात की याद दिलाने के रूप में भी देखा गया कि चुनावी ताकत ने संघ परिवार के भीतर वैचारिक पदानुक्रम को नहीं बदला है।
एलजीबीटीक्यू अधिकार
भागवत ने कई बार व्यापक रूढ़िवादी विमर्श को बीजेपी के रुख से अलग दिशाओं में भी निर्देशित किया है। 2013 में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का विरोध करते हुए इसे अप्राकृतिक बताया था।
एक दशक बाद, भागवत ने एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण व्यक्त किया। जनवरी 2023 में, उन्होंने तर्क दिया कि समलैंगिकता एक जैविक वास्तविकता है, अपने तर्क को भारतीय सभ्यतागत परंपराओं पर आधारित किया और कहा कि एलजीबीटीक्यू समुदाय समाज में गरिमा और अपना निजी स्थान पाने का हकदार है।
जरासंध के सेनापतियों हंस और दिम्भाका की कहानी का हवाला देते हुए आरएसएस प्रमुख ने सुझाव दिया कि भारत में समलैंगिक लोग हमेशा से मौजूद रहे हैं और समाज को उन्हें बहिष्कृत करने के बजाय स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने कहा, “आरएसएस चाहता है कि उन्हें अपना निजी स्थान मिले और वे महसूस करें कि वे भी समाज का हिस्सा हैं।”
बदलते हालात
ये दखल मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों में आ रहे बदलावों को दिखाते हैं। 2014 के बाद से बीजेपी का बहुत ज्यादा विस्तार हुआ है। चुनावी तौर पर वह पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है और संस्थागत रूप से भी अपने इतिहास में सबसे मजबूत स्थिति में है। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आजादी से काम करता है, जिससे संगठन से जुड़े रोजमर्रा के कामों के लिए आरएसएस पर उनकी निर्भरता कम हुई है।
साथ ही, आरएसएस ने परिवार के राजनीतिक प्रबंधक के बजाय वैचारिक स्रोत के रूप में अपनी भूमिका को बरकरार रखने का प्रयास किया है। नियमित शासन संबंधी मामलों में हस्तक्षेप करने के बजाय, यह सार्वजनिक टिप्पणी तभी करता है जब उसे लगता है कि राजनीतिक नेतृत्व अपने संगठनात्मक मूल्यों से भटक रहा है या सामाजिक भावनाओं से नाता तोड़ रहा है।
यही वजह है कि भागवत के हालिया बयानों पर इतना ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने आरएसएस को एक बार फिर बीजेपी के ‘नैतिक मार्गदर्शक’ के तौर पर पेश करने की कोशिश की है। एक ऐसा मार्गदर्शक जो समय-समय पर बीजेपी को यह याद दिलाता रहता है कि जनता का भरोसा और समर्थन जीतने के लिए चुनावी जीत जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी बातचीत और लोगों की बात सुनना व उन पर प्रतिक्रिया देना भी है।
आरएसएस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “बीजेपी आरएसएस से निकली है, न कि इसका उल्टा। बीजेपी से पहले, आरएसएस द्वारा ही एक और पार्टी बनाई गई थी। आरएसएस सौ वर्षों से अस्तित्व में है और अगले सौ वर्षों तक भी रहेगा। भगवत जी जो कहते हैं, वह एक संरक्षक की भूमिका में होता है। अगर कोई स्वयंसेवक, भले ही उसकी मंशा अच्छी हो, कोई गलती करता है, तो उसे सुधारना सरसंघचालक का काम है। आखिरकार, यह सब परिवार के भीतर ही होता है।”
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कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के Gen-Z पर दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया दी है। अभिजीत दीपके ने न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए कहा कि भागवत के बयान में सबसे अहम बात यह थी कि Gen-Z को एंटी नेशनल नहीं कहा जाना चाहिए। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
