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नरेंद्र मोदी सरकार बोली- पैसों की है किल्‍लत, RBI का जवाब- हमारे पास ऐसा कोई डेटा नहीं

नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच की तनातनी कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है।

यह घटना वित्त मंत्रालय के अधिकारियों और आरबीआई के प्रतिनिधियों की बैठक के दौरान की है। (फोटोः पीटीआई/रॉयटर्स)

नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच की तनातनी कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। हाल ही में इस बात अंदाजा आरबीआई के उस बयान से लगा, जिसमें केंद्रीय बैंक ने मोदी सरकार के पास पैसों की किल्लत होने से जुड़ा कोई भी आंकड़ा न होने की बात कही। यह घटना वित्त मंत्रालय के अधिकारियों और आरबीआई के प्रतिनिधियों के बीच हुई एक बैठक की है, जिसमें मंत्रालय के अधिकारियों ने नॉन बैंकिंग फाइनैंशियल कंपनी (एनबीएफसी) में पैसों की किल्लत का जिक्र छेड़ा था। अधिकारियों ने इसके साथ ही कहा था कि अगर इसमें जल्द से जल्द हस्तक्षेप न किया, तो हालात काबू से बाहर हो सकते हैं।

नाम न बताने की शर्त पर एक सरकारी अधिकारी ने इस बारे में बताया, “आरबीआई प्रतिनिधि अपने जवाब में बोले थे- हाल में क्रेडिट ग्रोथ में मजबूती देखने को मिली है और हमारे पास ऐसा कोई डेटा नहीं है, जो यह दर्शाता हो कि एनबीएफसी पैसों की किल्लत से जूझ रही हो।” यूनाइटेड स्टेट्स इंडिया स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप फोरम (यूएसआईएसपीएफ) में अपने भाषण के दौरान वित्त मंत्री ने बताया था कि हाल के वर्षों में क्रेडिट ग्रोथ 31 फीसदी हुई है, जो कि सामान्य की तुलना (14 फीसदी) में अधिक है।

आपको बता दें कि मोदी सरकार और आरबीआई के बीच इस वक्त सब कुछ ठीक नहीं चल रह है। लगातार आ रही मीडिया रिपोर्ट्स में दोनों पक्षों के बीच तनातनी बढ़ने की बातें आ रही हैं। इसी क्रम में बुधवार सुबह सीएनबीसी टीवी 18 की रिपोर्ट में कहा गया था कि केंद्र और आरबीआई में बढ़ती रार के बीच आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। पर इस मसले पर आरबीआई की प्रतिक्रिया नहीं आई, जबकि अन्य रिपोर्ट्स में बताया गया कि वह अपने पद पर बने रहेंगे। उन्होंने 19 नवंबर को बोर्ड की बैठक बुलाई है।

वहीं, वित्त मंत्रालय ने बयान जारी कर साफ किया, “आरबीआई अधिनियम के अधीन केंद्रीय बैंक की आजादी बेहद जरूरी है। सरकार ने हमेशा इस बात का ख्याल रखा है। सरकार और आरबीआई को जनता के हित और अर्थव्यवस्था की जरूरतों के हिसाब से आगे बढ़ना होगा।” जबकि मंगलवार (30 अक्टूबर) को वित्त मंत्री ने अंधाधुंध कर्ज देने (साल 2008 से 2014 के बीच) वाले बैंकों पर रोक लगाने में नाकाम रहने को लेकर आरबीआई की कड़ी आलोचना की थी।

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