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जल बंटवारा : भारत व पाक के लिए कितना मुफीद विवाद

वैश्विक झगड़ों पर किताब लिख चुके ब्रह्म चेलानी के मुताबिक, भारत वियना समझौते के लॉ ऑफ ट्रीटीज की धारा 62 के अंतर्गत यह कहकर पीछे हट सकता है कि पाकिस्तान चरमपंथी गुटों का उसके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय कह चुका है कि अगर मूलभूत स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी संधि को रद्द किया जा सकता है।

Author Updated: February 26, 2019 8:40 AM
भारत से पाकिस्तान की ओर जाने वाली सिंधु नदी फोटो सोर्स : PTI

भारत से बहने वाली तीन नदियों का पानी पाकिस्तान को रोकने के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के ऐलान के बाद सिंधु जल संधि को लेकर बहस का दौर शुरू हो गया है। गडकरी के मंत्रालय के मुताबिक, रावी, सतलज और ब्यास नदियों का पानी बांध बनाकर रोका जाएगा। शाहपुर-कांडी बांध बनाने का काम हो रहा है। अब मंत्रिमंडल अन्य दो बांध बनाने पर फैसला लेगा।

क्या है सिंधु जल संधि की पृष्ठभूमि?
ब्रिटिश राज के दौरान ही दक्षिण पंजाब में सिंधु नदी घाटी पर बड़े नहर का निर्माण करवाया था। उस इलाके को इसका इतना लाभ मिला कि बाद में वह दक्षिण एशिया का एक प्रमुख कृषि क्षेत्र बन गया। भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे के दौरान जब पंजाब को विभाजित किया गया तो इसका पूर्वी भाग भारत के पास और पश्चिमी भाग पाकिस्तान के पास गया। सिंधु नदी घाटी और इसके विशाल नहरों को भी विभाजित किया गया। इससे होकर मिलने वाले पानी के लिए पाकिस्तान पूरी तरह भारत पर निर्भर था। पूर्व और पश्चिमी पंजाब के चीफ इंजीनियरों के बीच 20 दिसंबर 1947 को एक समझौता हुआ। इसके तहत भारत को बंटवारे से पहले तय किया गया पानी का निश्चित हिस्सा 31 मार्च 1948 तक पाकिस्तान को देते रहना तय हुआ।

एक अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं रहा तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया, जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ जमीन पर हालात खराब हो गए। भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए, जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था। बाद में भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राजी हो गया। 1951 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया। लिलियंथल पाकिस्तान गए और वापस अमेरिका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी घाटी के बंटवारे पर एक लेख लिखा। यह लेख विश्व बैंक के प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया और फिर शुरू हुआ दोनों पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला। आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी घाटी समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

समझौते में क्या है?
पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत जी पार्थसारथी के मुताबिक, सिंधु समझौते के तहत सिंधु नदी घाटी की नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया। झेलम और चेनाब को पश्चिमी नदियां बताया गया। रावी, ब्यास और सतलज को पूर्वी नदियां बताते हुए इनका पानी भारत के लिए तय किया गया। भारत पूर्वी नदियों के पानी का, कुछ अपवादों को छोड़कर, बेरोकटोक इस्तेमाल कर सकता है। पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को भी दिया गया था, जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी आदि। दोनों देशों के बीच समझौते को लेकर बातचीत करने और साइट के मुआयना आदि का प्रावधान भी है। इसी समझौते में सिंधु आयोग स्थापित किया गया जिसके तहत दोनों देशों के आयुक्तों के किसी भी विवाद पर बात करने और समय-समय पर आपस में मिलने का प्रावधान रखा गया। किसी भी विवादित मुद्दे पर तटस्थ विशेषज्ञ की मदद लेने या कोर्ट आॅफ आॅर्बिट्रेशन में जाने का प्रावधान भी रखा गया है।

आपत्तियां
पाकिस्तान भारत की बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पाकल (1,000 मेगावाट), रातले (850 मेगावाट), किशनगंगा (330 मेगावाट), मियार (120 मेगावाट) और लोअर कलनाई (48 मेगावाट) पर आपत्ति उठाता रहा है। हालांकि जानकार कहते हैं कि कश्मीर अपने जल संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा है। जब महबूबा मुफ्ती जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री थीं, तो उन्होंने कहा था कि सिंधु जल संधि से राज्य को 20 हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। इसके लिए केंद्र को कुछ करना चाहिए।

पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे कहते हैं कि बंटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुजरने वाली नदियों पर नियंत्रण को लेकर उपजे विवाद की मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी। अगर भारत यह समझौता तोड़ता है तो पाकिस्तान सबसे पहले विश्व बैंक के पास जाएगा और वहभारत पर ऐसा नहीं करने के लिए दबाव बनाएगा।

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