छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के बाहरी इलाके में बसे रीवा गांव में पीने के पानी की भारी किल्लत है। इस चिलचिलाती गर्मी में सुनीता सिन्हा अपनी सास और 9 साल की बेटी के साथ खड़ी होकर सोलर-पावर्ड पंप से पानी भरने का इंतजार कर रही हैं। वे एक-एक करके डिब्बे भरती हैं और उन्हें पास खड़ी साइकिल से बांध देती हैं, फिर वे बारी-बारी से उस साइकिल को खींचते हुए लगभग 500 मीटर दूर अपने घर तक ले जाती हैं।
36 साल की सुनीता ने कहा, “जिस दिन सूरज नहीं निकलता, उस दिन पंप काम करना बंद कर देता है और फिर पानी नहीं मिलता। हर साल यही हाल रहता है और इसे बदलने के लिए कोई कुछ नहीं करता।” रीवा गांव की कई महिलाओं के लिए, हर गर्मियों में जिंदगी का यही दस्तूर बन गया है।
यह स्थिति इन इलाकों में ‘जल जीवन मिशन’ की व्यापक पहुंच के बावजूद है। कम-से-कम कागजों पर तो ऐसा ही है। जेजेएम डैशबोर्ड के आंकड़े दिखाते हैं कि रायपुर के 1.89 लाख घरों में से 97.89 प्रतिशत घरों में नल के कनेक्शन हैं, हालांकि केवल 64.15 प्रतिशत गांव ही प्रमाणित हैं।
लेकिन, यहां के लोगों का कहना है कि असल में ज्यादातर नल सूखे ही रहते हैं। रीवा के 73 साल के सरपंच घसीया राम साहू ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “यहां पिछले 40 सालों से भूजल का स्तर कम है। इसी वजह से, फरवरी से लेकर जून में मॉनसून के आने तक, यहां पानी की समस्या बनी रहती है। ‘जल जीवन मिशन’ के तहत काम तो चल रहा है, लेकिन पानी आएगा कहां से? दो साल पहले उन्होंने हमारे घरों में नल तो लगा दिए, लेकिन उनमें पानी की सप्लाई ही नहीं है?”
सिंचाई परियोजना
अपनी ओर से राज्य सरकार और जन प्रतिनिधियों का कहना है कि रीवा के लिए एक प्रस्तावित सिंचाई परियोजना है, जिसके अगले गर्मियों से पहले लागू होने की उम्मीद है।
कौशल विकास, तकनीकी शिक्षा और रोजगार और अनुसूचित जाति विकास मंत्री और आरंग से विधायक गुरु खुशवंत साहिब कहते हैं कि इस इलाके में अस्थायी इंतजाम के तौर पर टैंकर से पानी की सप्लाई की जाती है। वे कहते हैं, “रीवा गांव को एक बांध से पानी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव है। इस परियोजना पर 5 करोड़ रुपये खर्च होंगे और यह जल जीवन मिशन का हिस्सा है। इस पानी को गांव के लिए बनाए गए एक ओवरहेड टैंक में जमा किया जाएगा और नलों के जरिये सप्लाई किया जाएगा। यह परियोजना अब सचिव स्तर तक पहुंच चुकी है और इसे बहुत जल्द मंजूरी मिल जाएगी।”
पानी की तलाश
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने जल जीवन मिशन को जोरदार बढ़ावा दिया है। इस मिशन का मकसद हर ग्रामीण घर तक सुरक्षित और पर्याप्त मात्रा में पाइप से पीने का पानी पहुंचाना है। सत्ता में आते ही, साय ने अधिकारियों को जेजेएम के काम में तेजी लाने के निर्देश दिए। डैशबोर्ड के आंकड़ों से पता चलता है कि 22 मई तक, राज्य के कुल 49.95 लाख घरों में से 83.3 प्रतिशत घरों को नल का कनेक्शन मिल चुका था। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि सभी कनेक्शन चालू हालत में हों। लेकिन डैशबोर्ड पर और बारीकी से नजर डालने पर पता चलता है कि कुल 19,658 गांवों में से सिर्फ 6038 गांवों को ही यानी 30 प्रतिशत गांवों को 100 प्रतिशत चालू घरेलू नल कनेक्शन’ वाला गांव होने का सर्टिफिकेट मिला है।
डैशबोर्ड के अनुसार, रायपुर में जेजेएम के तहत 97.88 प्रतिशत कवरेज है। यह धमतरी के बाद राज्य में दूसरा सबसे ज्यादा है। लेकिन राज्य सरकार की अपनी ही स्वीकारोक्ति के अनुसार, ये आंकड़े गुमराह करने वाले हो सकते हैं। जेजेएम की प्रगति पर विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए, उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने दावा किया कि जहां पिछली कांग्रेस सरकार ने दिसंबर 2023 तक अपने ई-मिशन पोर्टल पर 36 लाख नल कनेक्शन दर्ज किए थे, वहीं जून 2024 में किए गए एक सत्यापन से पता चला कि केवल 21 लाख घरों को ही पानी मिल रहा था।
टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है
रीवा के लोगों के लिए इसका मतलब है कि गर्मियों के सबसे गर्म महीनों में पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ता है। गांव के लगभग 100 बोरवेल और 20 हैंडपंप सूख जाने के कारण लोगों को चार सोलर-पावर्ड हैंडपंपों और पानी के टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ता है। बर्तन धोने और कपड़े धोने के लिए, गांव के लोग 75 एकड़ के स्थानीय तालाब पर निर्भर रहते हैं।
सरपंच घसिया राम साहू ने कहा, “हमने 500 फीट तक बोरवेल खोदे हैं, लेकिन जमीन में अब पानी बचा ही नहीं है।” उन्होंने कहा, “कुछ ग्रामीणों के घरों की छतों पर बारिश का पानी जमा करने के सिस्टम लगे हैं, लेकिन वे भी नाकाफी साबित हुए हैं।”
इसका नतीजा यह है कि पंपिंग स्टेशनों पर लंबी-लंबी लाइनें लगी रहती हैं। जब उषा धीवर हैंडपंप पर अपने कई बर्तन भर रही होती हैं, तो उनका चार साल का बेटा हेमलल उनसे पानी मांगता है। वह उसे प्लास्टिक के ढक्कन में एक घूंट पानी देती हैं, फिर पानी से भरा एक बर्तन लेकर अपनी इंतजार करती साइकिल की ओर दौड़ती हैं और फिर दूसरे चक्कर के लिए वापस आती हैं।
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “इतनी गर्मी होने के बावजूद, हम रात में कूलर नहीं चला पाते क्योंकि उनका पानी खत्म हो जाता है। जिन औरतों की शादी हो जाती है और वे इस जगह को छोड़कर चली जाती हैं, वे ज्यादा खुश रहती हैं, लेकिन हमें ऐसी कोई राहत नहीं मिलती।” चूंकि, यह सीमित संसाधनों के लिए एक संघर्ष है, इसलिए कभी-कभी यह किस्मत का भी खेल होता है।
हमारे घर के ठीक बाहर एक सोलर पंप लगा- गौतम धीर
33 साल के गौतम धीर ने कहा, “हमारे घर के ठीक बाहर एक सोलर पंप लगा है, लेकिन वह दिन में सिर्फ दो से तीन घंटे ही चलता है। इसलिए, हम सुबह जल्दी उठ जाते हैं, लेकिन देखते हैं कि लोग पहले से ही लाइन में लगे हुए हैं। अगर हमें कुछ नहीं मिलता, तो हमें गांव के दूसरे कोने तक पैदल जाना पड़ता है।”
कुछ लोग पानी की तलाश में आस-पास के गांवों तक पैदल जाते हैं। उनमें 35 साल की शकीला बंजारे भी शामिल हैं। उन्होंने कहा, “हमारे घर पर कोई बोरवेल नहीं है, इसलिए हम पीने के पानी के लिए पूरी तरह से पड़ोसी गांव कुकरा पर निर्भर हैं। कोई भी हम जैसे आम लोगों की बात नहीं सुनता और न ही किसी को हमारी कोई परवाह है।”
गांव वालों ने दिए कुछ सुझाव
इस संकट को हल करने के लिए गांव वालों ने कुछ सुझाव दिए हैं, लेकिन उनका कहना है कि उन्हें अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है। साहू ने कहा, “हमने उन्हें दो सुझाव दिए। या तो वे 75 एकड़ के तालाब को और गहरा करें और पानी को साफ करके उसे इस्तेमाल लायक बनाएं या फिर पाइपलाइन सिस्टम के जरिये महानदी नदी से पानी लाएं।”
अधिकारियों का कहना है कि प्रस्तावित सिंचाई परियोजना के अलावा जिला प्रशासन बारिश के पानी को बचाने के लिए जागरूकता अभियान भी चला रहा है। जिला प्रशासन के तहत जन स्वास्थ्य इंजीनियरिंग (PHE) विभाग के सब-इंजीनियर रानू दिनकर कहते हैं, “हमने कुछ रिचार्ज पॉइंट बनाए हैं और गांव वाले भी सक्रिय रूप से और ज्यादा पॉइंट बना रहे हैं।”
इस बीच, विशेषज्ञों का मानना है कि भूजल का स्तर कम होने की वजह अंधाधुंध और अवैज्ञानिक तरीके से पानी निकालना है, इसलिए उन्होंने बेहतर जल प्रबंधन उपायों और फसल के तरीकों में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया है। नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स के गौतम बंद्योपाध्याय ने कहा, “अभी इस बात की कोई ठीक से निगरानी नहीं हो रही है कि लोग और कंपनियां बोरवेल के जरिये कितना भूजल निकाल रहे हैं।” उन्होंने कहा, “धान की खेती वाले खेतों का सिकुड़ना भी एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि पारंपरिक रूप से भूजल को रिचार्ज करने में इनकी अहम भूमिका रही है।”
सुनीता ने कहा, “जब से मेरी शादी हुई और मैं 15 साल पहले यहां आई, तब से मैं यह समस्या देख रही हूं। नेता वोट के लिए वादे तो करते हैं, लेकिन कुछ भी नहीं बदलता।”
यह भी पढ़ें: 76 जवानों की हत्या के सभी 10 आरोपी 16 साल बाद बरी
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 2010 के ताडमेटला हमले में सभी 10 आरोपियों की रिहाई को बरकरार रखा है। इस हमले में माओवादियों ने 76 सुरक्षाकर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी थी और उनके हथियार लूट लिए थे। कोर्ट ने सबूतों की कमी, जांच में प्रक्रियात्मक खामियों और उचित संदेह से परे दोष सिद्ध करने में विफलता का हवाला दिया। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
