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सु्प्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी- पॉर्न देखना फ्रीडम ऑफ स्पीच का हिस्सा नहीं, लगनी चाहिए रोक

जस्टिस दीपक मिश्रा और एसके सिंह ने सरकार से कहा कि अश्‍लीलता और अनुमति के बीच एक लाइन होनी चाहिए।

पोर्न वेबसाइट पर एक्स बॉयफ्रेंड ने पोस्ट की लड़की की तस्वीर । (Representative Image)

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र से देश में सभी प्रकार की बाल पोर्नोग्राफी (अश्लीलता) पर पाबंदी लगाने के तरीके सुझाने को कहा है। शीर्ष अदालत ने कहा कि देश अभिव्यक्ति की आजादी या स्वतंत्रता के नाम पर कोई परीक्षण नहीं कर सकता है। न्यायूमर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिव कीर्ति सिंह की पीठ ने कहा कि केंद्र हलफनामा दायर करके बाल पोर्नोग्राफी पर लगाम कसने के तरीकों पर सुझाव देगा। मासूम बच्चों को इस तरह की दर्दनाक स्थिति का पीड़ित नहीं बनाया जा सकता है और एक देश आजादी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बच्चों पर किसी तरह का परीक्षण बर्दाश्त नहीं कर सकता है। सभी को कला और अश्लीलता के बीच रेखा खींचने की जरूरत है और बाल पोर्नोग्राफी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता है।

पीठ ने कहा कि पोर्नोग्राफी बहुत मुश्किल विषय है। कुछ लोग मोनालीसा की तस्वीर को अश्लील मानेंगे जबकि कुछ लोग इसे कला मानेंगे। फिर हम क्या कर सकते हैं? शीर्ष अदालत ने कहा कि पोर्नोग्राफी से संबंधित पैमानों पर फैसला होना चाहिए और अन्य मामलों में भी यह व्यवस्था दी गई है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1 ए) में मौजूद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संपूर्ण नहीं है और इस पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

केंद्र ने जब अपना रुख दोहराते हुए कहा कि पोर्नोग्राफी वाली वेबसाइटों पर पाबंदी लगाना मुश्किल है क्योंकि वे किसी देश के क्षेत्राधिकार में नहीं आता है तो पीठ ने कहा कि आपको एक रेखा खींचनी होगी कि सार्वजनिक रूप से क्या देखा जा सकता है और अकेले में क्या देखा जा सकता है। पीठ ने केंद्र से वयस्क और बाल पोर्नोग्राफी से निपटने के लिए वेबसाइटों पर पाबंदी पर विशेषज्ञों और राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) से सुझाव लेने के लिए कहा। अतिरिक्त महान्यायवादी पिंकी आनंद ने कहा कि इंटरपोल और सीबीआइ जैसी एजंसियां बाल पोर्नोग्राफी से जुड़ीं वेबसाइटें बंद करने के लिए जरूरी कदम उठा रही हैं।
उन्होंने कहा कि बाल पोर्नोग्राफी पर पाबंदी लगाना संभव है लेकिन पोनोग्राफी वाली वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है क्योंकि वे किसी देश के क्षेत्राधिकार में नहीं हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश विजय पंजवानी ने कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर पोर्नोग्राफी सामग्री देखना या किसी को देखने को मजबूर करना पूरी तरह से प्रतिबंधित होना चाहिए। इस मामले में आगे की सुनवाई मार्च के तीसरे हफ्ते में होगी।

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