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जिन शवों के नहीं पहुंचे सगे उनकी अंत्येष्टि कर रहे ‘योद्धा’

चार शवों को अंतिम संस्कार में करीब छह से आठ घंटे लग रहे हैं। तब तक कर्मी पीपीइ किट में बंधे वहीं खड़े रहते हैं। कई बार इंतजार भी करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एलएनजेपी के शवों को निगम बोध घाट के लिए चिन्हित है। वहां का सीएनजी स्टेशन खराब था तो निगम को लिख कर किसी तरह ठीक कराया।

Author नई दिल्ली | Published on: May 24, 2020 5:29 AM
बेहद विषम परिस्थितियों में काम कर रहे कोरोना योद्धाओं ने मोमबत्ती जलाकर अपनी आवाज उठाई।

कोरोना का इलाज तो चुनौती भरा है ही साथ ही आसान नहीं है शवों का अंतिम संस्कार भी। पूर्णबंदी व सीमाएं सील होने से कई शवों को भी इंतजार है अपनों के आने व उन्हें अंतिम सफर पर ले जाने का। एलएनजेपी में कुछ कोरोना योद्धा इस काम को अंजाम देने में अथक रूप से लगे हैं। तेज गर्मी व पीपीई किट की जकड़न में पसीने से तरबतर इन योद्धाओं के लिए लोगों का दुख अपने गम सरीखा बन गया है। यहां से रोज आठ-नौ शवों को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जाता है।

दिल्ली में कोरोना के लिए समर्पित सबसे बड़े अस्पताल लोकनायक के शवगृह में तेज धूप व गर्मी के बीच पसीने से तर-ब-तर पीपीई किट में बंधे हुए कर्मी चुपचाप शवों को गाड़ी में रख अंतिम संस्कार के लिए निकल रहे थे। एक गाड़ी पर ड्राइवर सहित दो कर्मी। बीच-बीच में उनके फोन बज रहे थे जिन पर शवों के परिजन की पूछताछ का जवाब देते। उन्हें बताते कि हम यहां से निकल रहे हैं आप लोग निगम बोध घाट पहुंचो। वहीं कुछ परिजन आंसुओं से तर व पसीने से भीगे पेड की ओट में खड़े इंताजार कर रहे थे। वे यहां शव लेने पहुंचे हुए हैं। एक -एक कर आज नौ शवों को यहां से अंतिम विदाई दी गई।

वहीं, यहां अभी भी 40 शव रखें हैं। इनमें से नौ शव ऐसे हैं जिनको इंतजार है अपनों के आने का। अपनों का कंधा तो इनको तब भी नसीब नहीं होगा लेकिन वे दूर से फूल चढ़ा के अंतिम सफर पर विदा दे सकेंगे। उनका इंतजार हो रहा है। अस्पताल के फोरेंसिक विभाग के मुखिया डॉ उपेंद्र किशोर माथुर ने बताया कि एलएनजेपी में शुक्रवार तक 97 मरीजों की कोरोना से मौत हो चुकी है।

संदिग्ध मामले अलग। उन्होंने बताया कि यहां नौ शव उन लोगों के हैं जो दिल्ली के बाहर के मूल निवासी थे व यहां या तो नौकरी के चलते रह रहे थे या फिर इलाज के लिए लाए गए थे। इनमें से दो काशीपुर के हैं व एक गोरखपुर के। वे पूर्णबंदी की वजह से आ नहीं पाए हैं। कोशिश यह भी कर रहे हैं कि जो आ नहीं पा रहे वे हमें अंत्येष्टि करने की इजाजत दे दें। डा उपेंद्र ने व यहां काम कर रहे कर्मियों ने बताया कि गर्मी बढ़ने के साथ ही शवों को संभालने में मुश्किल हो रही है। यहां रखे शवों में 15 ऐसे हैं जिनकी अभी तक किसी ने दावेदारी नहीं की है। वहीं, दो शव यहां लावारिस भी हैं।

डॉ माथुर ने बताया कि एलएलजेपी के शवगृह में 45 शवों को रखने की क्षमता है। जिनमें से 18 चेंबर अलग-अलग शव रखने वाले हैं। इतने तक तो कोरोना संक्रमितों के शव अगल रखे लेकिन अब साथ रख रहे क्यों कि वे सब भर गए हैं। वहीं कर्मी कुल चार व दो गाड़ियां ही है। कुछ कर्मचारी बंद की वजह से एनसीआर से आ नहीं पाए हैं। ऐसे में जो कर्मी हैं वह अथक रूप से लगे हुए हैं। कोई पृथकवास नहीं दिया गया है। वे मांग भी नहीं रहे उनके लिए लोगों का दुख अपना गम बन गया है।

चार शवों को अंतिम संस्कार में करीब छह से आठ घंटे लग रहे हैं। तब तक कर्मी पीपीइ किट में बंधे वहीं खड़े रहते हैं। कई बार इंतजार भी करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एलएनजेपी के शवों को निगम बोध घाट के लिए चिन्हित है। वहां का सीएनजी स्टेशन खराब था तो निगम को लिख कर किसी तरह ठीक कराया। बाद में दो पाली में अंत्येष्टि शुरू तो की गई लेकिन धार्मिक मान्यताओं के कारण लोग शाम को अंतिम संस्कार करने नहीं आ रहे।

वहीं दफनाने वाले शवों के लिए 15 फुट गड्ढा खोदने में चार घंटे का समय लगता है। हमें आइटीओ स्थित कब्रगाह में चार घंटे पहले से फोन करके समय लेना पड़ता है ताकि वे गढ्ढा पहले से खोद कर रखें उसके लिए जेसीबी मशीन बुलानी पड़ती है। जिसके प्रति गढ्ढा छह हजार रुपए का खर्च आता है।

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