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आंखों में जलन और दम घुटने लगा था, शुभ मूहुर्त में मचा था मौत का तांडव; गैस कांड ने दिलाई भोपाल त्रासदी की याद

जब तक कोई कुछ समझ पाता, जानकारी मिली कि यूनियन कार्बाइड कंपनी की फैक्ट्री जहर उगल रही है। फैक्टी से जहरीली गैस का रिसाव हो रहा था। यह पता चलते ही लोग जान बचाकर अपने घरों से निकलकर भागने लगे। लेकिन मौत का तांडव होना तो बाकी था।

Author Edited By आलोक श्रीवास्तव नई दिल्ली | Updated: May 7, 2020 6:35 PM
Bhopal gas tragedy 850भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित आज भी अस्पताल और कोर्ट के चक्कर लगाते देखे जा सकते हैं।

आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम स्थित आरआर वेंकटपुरम गांव में गुरुवार सुबह केमिकल फैक्ट्री में गैस लीक होने से अब तक 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। एक हजार से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हैं। इन्हें सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन की शिकायत हो रही थी। केमिकल फैक्ट्री में पॉलिमर से जुड़े काम होते थे। यह हादसा गुरुवार तड़के 3:30 बजे हुआ।

इस हादसे ने भोपाल त्रासदी की याद ताजा कर दी। 36 साल पहले भोपाल में हुए उस गैस लीक कांड में हजारों लोगों की जान चली गई थी। जो बचे भी थे, वे जिंदा लाश बनकर रह गए। उस हादसे ने इतने घाव दिए, कि इतने साल बाद भी भोपाल गैस पीड़ितों की सांसों से वे रिस रहे हैं।

वह 2/3 दिसंबर 1984 की रात थी। शादियां का सीजन था। उस दिन की सहालग बहुत तेज थी। कहा जाता है कि उस दिन बहुत शुभ मूहुर्त था, लेकिन मौत ने ऐसा तांडव मचाया कि शायद ही कोई ऐसे मूहुर्त की दोबारा आने की इच्छा करे। शादियों का सीजन होने के कारण शहर में बैंड-बाजे बज रहे थे। बाराती और घराती जश्न मना रहे थे। तभी शहर के पुराने इलाके में अचानक तूफान आ गया।

लोगों की आंखों में जलन होने लगी। उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी, बल्कि यूं कहें कि दम घुटने लगा। जब तक कोई कुछ समझ पाता, जानकारी मिली कि यूनियन कार्बाइड कंपनी की फैक्ट्री जहर उगल रही है। फैक्टी से जहरीली गैस का रिसाव हो रहा था। यह पता चलते ही लोग जान बचाकर अपने घरों से निकलकर भागने लगे। लेकिन मौत का तांडव होना तो बाकी था।

जो भागे उन्हें गैस का असर ज्यादा हुआ। गैस जितना शरीर के अंदर गई जिंदगी की डोर उतनी जल्दी टूट गई। घरों, सड़कों, स्टेशन, जहां-तहां लाशों के ढेर लगने लगे। लाशें रखने के लिए कब्रिस्तान छोटे दिखने लगे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भोपाल गैस कांड में करीब 3 हजार लोगों की मौत हो गई थी। हालांकि, प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि मौतों की संख्या इससे कहीं ज्यादा थी।

यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में कीटनाशक दवा बनाती थी। भोपाल त्रासदी में सबसे ज्यादा आसपास के इलाकों और झुग्गी बस्ती में रहने वाले लोगों की मौत हुई। जो बचे उनके फेफड़े कमजोर हो गए। आंखों की रोशनी कम हो गई या चली गई। बीमारी का यह सिलसिला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी और फिर अब तक जारी है। गैस पीड़ित आज भी अस्पताल और कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।

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