रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को 1975 के आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक करार दिया। उन्होंने व्यक्तिगत अधिकारों के उल्लंघन, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों को याद किया।

आपातकाल लागू होने की 51वीं वर्षगांठ के अवसर राजनाथ सिंह ने एक पोस्ट में लिखा, “25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला दिन था, जब देश पर आपातकाल लगाया गया। आपातकाल के दौरान सत्ता के अहंकार में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन किया गया, प्रेस की स्वतंत्रता को कुचला गया, हजारों राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों तथा आम नागरिकों को अकारण जेलों में डाला गया और असहमति की आवाज़ों को दबाया गया। उस दौर में संविधान के मूल्यों और लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करने के भरसक प्रयास किए गए।”

राजनाथ सिंह ने आगे लिखा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में स्मरण करने का निर्णय लेकर देश को इस काले अध्याय की याद दिलाई है, ताकि भावी पीढ़ियां लोकतंत्र पर हुए उस प्रहार को कभी न भूलें। यह दिन लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को पुनः दृढ़ करने का अवसर भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि संविधान हमारे देश का सबसे पवित्र ग्रंथ तथा हमारे लोकतांत्रिक गणराज्य की सुदृढ़ आधारशिला है, जिसकी रक्षा का दायित्व हम सभी का है।

रक्षा मंत्री ने कहा कि आज ‘संविधान हत्या दिवस’ पर उन सभी लोकतंत्र के सेनानियों को श्रद्धापूर्वक नमन, जिन्होंने आपातकाल की तानाशाही के दौर में संघर्ष किया, यातनाएँ सहीं और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया। उनका साहस, त्याग और बलिदान हमें सदैव प्रेरित करता रहेगा।

शिवराज सिंह चौहान ने क्या कहा?

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने चौहान ने कहा कि 25 जून 1975 की वह काली रात देश कभी नहीं भूल सकता, जब इंदिरा जी ने आपातकाल लगाया था। संविधान को तार-तार कर दिया गया, लोकतंत्र का गला घोंट दिया गया और नागरिक स्वतंत्रता को पैरों तले रौंद दिया गया। विरोध की हर आवाज़ कुचल दी गई।

चौहान ने आगे कहा कि मैं उन लोकतंत्र सेनानियों को प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष किया, जेल गए और अमानुषिक यातनाएं सहीं। उन्हीं की तपस्या से लोकतंत्र फिर बहाल हुआ। आइए, संकल्प लें कि लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और संविधान की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे, ताकि वह काला दिन फिर कभी न आए।

25 जून, 1975 को लगाया गया था आपातकाल

बता दें, 25 जून, 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने “आंतरिक अशांति” का हवाला देते हुए अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। इस दौरान देश में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 के बीच आपातकाल लागू रहा था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की इस दौरान मौलिक अधिकारों के निलंबन और जयप्रकाश नारायण सहित विपक्षी नेताओं को कठोर आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (एमआईएसए) के तहत गिरफ्तार करने के लिए व्यापक रूप से आलोचना की जाती है। जेपी नारायण ने 1970 के दशक में कांग्रेस सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति बिहार आंदोलन का नेतृत्व किया था।

शाह आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, उस अवधि में बड़े पैमाने पर लोगों को हिरासत में लिया गया, नसबंदी अभियान चलाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगाई गई। भाजपा ने पिछले वर्ष आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ को “संविधान हत्या दिवस” ​​के रूप में मनाया था।

पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं- विदेश मंत्रालय

विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने बुधवार साफ कहा कि पासपोर्ट केवल यात्रा और पहचान संबंधी दस्तावेज है, न कि भारतीय नागरिकता का प्रमाण। अधिकारियों ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि पासपोर्ट विदेश में भारतीयों की राष्ट्रीयता को प्रमाणित करता है, लेकिन यह नागरिकता का दस्तावेज नहीं है। पढ़ें पूरी खबर।