राजनीति की आदर्श कल्पना में चुनाव और राजनीतिक बहस सिंचाई, रोजगार, टैक्स, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दों पर होनी चाहिए। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि नीतियों और विचारधारा की जगह नैतिकता और निजी जीवन चर्चा का केंद्र बन जाते हैं। तमिलनाडु में इस सप्ताह कुछ ऐसा ही देखने को मिला। कावेरी जल विवाद को लेकर किसानों का प्रदर्शन मूल रूप से पानी, किसानों की समस्याओं और कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु के हिस्से का पानी नहीं छोड़ने जैसे मुद्दों पर था। लेकिन यह विरोध प्रदर्शन अचानक मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय और एक मशहूर अभिनेत्री के कथित रिश्ते पर चर्चा में बदल गया।

आपको बता दें कि तंजावुर में सोमवार को किसानों के प्रदर्शन के दौरान डीएमके नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन भाषण दे रहे थे। इसी दौरान भीड़ ने मशहूर तमिल अभिनेत्री का नाम लेकर नारे लगाए। इस पर उदयनिधि कुछ पल रुके, मुस्कुराए और एक ऐसी टिप्पणी की जिसे मुख्यमंत्री विजय और अभिनेत्री के रिश्ते पर इशारा माना गया। इसके बाद राजनीतिक बहस कावेरी विवाद से हटकर मुख्यमंत्री के निजी जीवन पर केंद्रित हो गई।

तमिलनाडु में पहले भी हो चुके हैं ऐसे विवाद

हालांकि तमिलनाडु की राजनीति में यह कोई नई बात नहीं है। द्रविड़ आंदोलन ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था, जातिगत ऊंच-नीच और धार्मिक रूढ़ियों का विरोध किया था। इस आंदोलन ने आत्मसम्मान विवाह (Self-Respect Marriages) को बढ़ावा दिया और राजनीति को नैतिक पहरेदारी से अलग रखने की बात कही। लेकिन जैसे-जैसे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ी, विरोधियों पर हमला करने के लिए उनके निजी रिश्तों और निजी जीवन को निशाना बनाना भी एक आम राजनीतिक हथियार बन गया।

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और उदयनिधि स्टालिन के दादा एम. करुणानिधि के निजी जीवन को राजनीतिक मुद्दा बनाया गया। राजाथी अम्माल और कनिमोझी के जन्म को लेकर भी सार्वजनिक और राजनीतिक बहस शुरू हो गई।

करुणानिधि की तीन पत्नियां थीं। उनकी दूसरी पत्नी दयालु अम्माल से वर्तमान डीएमके प्रमुख एम. के. स्टालिन का जन्म हुआ जबकि सांसद कनिमोझी की मां राजाथी अम्माल उनकी तीसरी पत्नी थीं।

बताया जाता है कि करुणानिधि और राजाथी अम्माल के रिश्ते की जानकारी बहुत कम लोगों को थी। कनिमोझी के जन्म के बाद यह रिश्ता सार्वजनिक रूप से चर्चा में आया।

साल 1968 में जब करुणानिधि राज्य सरकार में मंत्री थे तब विधानसभा में एक कांग्रेस नेता ने उनसे पूछा, ”मद्रास जनरल अस्पताल में जिस बच्चे का जन्म हुआ है, उसकी मां धर्माम्बाल (राजाथी अम्माल का दूसरा नाम) कौन हैं?” इस पर करुणानिधि ने संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट जवाब दिया था, ”कनिमोझी मेरी बेटी हैं और वह (राजाथी अम्माल) कनिमोझी की मां हैं।”

करुणानिधि के इस जवाब में एक असामान्य बात थी। उन्होंने अपने निजी जीवन को लेकर शर्मिंदगी या बचाव का रास्ता अपनाने के बजाय सीधे जवाब देकर इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनने से रोकने की कोशिश की।

बताया जाता है कि उस समय तक उनके और राजाथी अम्माल के रिश्ते की जानकारी केवल तत्कालीन मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरै (अन्ना) को थी। करुणानिधि के एक करीबी मित्र और पार्टी सहयोगी ने द इंडियन एक्सप्रेस से अप्रैल 2016 में कहा था, ”अन्ना कट्टर तर्कवादी (रैशनलिस्ट) थे और उन्होंने करुणानिधि का पूरा साथ दिया। वह कभी किसी को मुश्किल में नहीं छोड़ते थे।”

MGR का निजी जीवन

इसी तरह AIADMK के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री एम.जी. रामचंद्रन (MGR) का निजी और राजनीतिक जीवन भी कई विरोधाभासों से भरा रहा। उनके सार्वजनिक जीवन में दो महिलाओं की अहम मौजूदगी रही। एक ओर उनकी पत्नी जानकी रामचंद्रन तो दूसरी ओर उनकी राजनीतिक सहयोगी और फिल्मों की सह-कलाकार जे. जयललिता। ये बात अलग है कि तमिल समाज ने इन रिश्तों को कभी स्वीकार किया , कभी उन पर अटकलें लगाई, कभी उनका सम्मान किया और कभी उनकी आलोचना भी की।

साल 1987 में एमजीआर के निधन के बाद जब उनका पार्थिव शरीर राजाजी हॉल में रखा गया था, तब अंतिम यात्रा के दौरान जयललिता को अंतिम संस्कार वाहन से धक्का देकर हटाया गया। यह घटना तमिलनाडु की राजनीति की सबसे चर्चित तस्वीरों में से एक बन गई। यह विवाद सिर्फ उत्तराधिकार का नहीं था बल्कि राजनीतिक वैधता और नेतृत्व की दावेदारी का भी प्रतीक माना गया।

साल 2009 में तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर नेताओं के निजी रिश्तों की चर्चा की ओर मुड़ गई। उस समय एम. करुणानिधि ने एक राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया जब उन्होंने अविवाहित जे. जयललिता को उनके लिए प्रचलित संबोधन ‘सेल्वी’ (अविवाहित महिला) की जगह बार-बार ‘तिरुमति’ (श्रीमती) कहकर संबोधित किया।

करुणानिधि ने कहा था कि जब तक जयललिता उनकी सरकार को ‘अल्पमत सरकार’ कहती रहेंगी तब तक वह उन्हें ‘तिरुमति’ ही कहकर संबोधित करेंगे। इस टिप्पणी को व्यापक रूप से एमजीआर और जयललिता के रिश्ते को लेकर सालों से चली आ रही सार्वजनिक अटकलों पर तंज के रूप में देखा गया। एआईएडीएमके ने इसे जयललिता का व्यक्तिगत अपमान बताते हुए कड़ी आलोचना की लेकिन करुणानिधि अपने बयान पर कायम रहे और उन्होंने कोई पछतावा नहीं जताया।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखाया कि जो नेता सार्वजनिक तौर पर रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं का विरोध करते थे। वहीं राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर हमला करने के लिए कई बार उन्हीं सामाजिक मानदंडों का इस्तेमाल करते थे। यानी तमिलनाडु की राजनीति में कई मौकों पर नैतिकता और निजी जीवन राजनीतिक हथियार बन गए। ज़रूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल किया गया और जब सुविधाजनक नहीं रहा तो उन्हें नजरअंदाज कर दिया।

नैतिकता कैसे बनी राजनीति का हथियार

इसी वजह से ताजा विवाद भी काफी हद तक पुराना और जाना-पहचाना लगता है। चेहरे और नाम भले बदल गए हों लेकिन राजनीति की शैली आज भी वही है। कभी निशाने पर करुणानिधि थे फिर एमजीआर और अब मुख्यमंत्री विजय हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में एक दिलचस्प विडंबना भी छिपी है। ब्रिटिश शासन से पहले जब विवाह संबंधी कानूनों को औपचारिक रूप से तय नहीं किया गया था और ‘पाप’ जैसी अवधारणाओं को कानूनी और सामाजिक ढांचे में नहीं जोड़ा गया था, तब भारतीय समाज आज की राजनीतिक भाषा से कहीं अधिक विविध और लचीला था।

इतिहासकारों के अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में पारिवारिक रिश्तों, उत्तराधिकार, वैवाहिक संबंधों और परिवार की संरचना को लेकर अलग-अलग परंपराएं और सामाजिक व्यवस्थाएं मौजूद थीं। यानी समाज में एक जैसी नैतिक या पारिवारिक व्यवस्था नहीं थी बल्कि काफी विविधता देखने को मिलती थी।

ब्रिटिश शासन के दौरान आई विक्टोरियन शिक्षा और सोच के प्रभाव में भारत में कई ऐसे रिश्तों को कानूनी नियमों में बांध दिया गया जिन्हें पहले समाज अलग-अलग तरीकों से स्वीकार करता था। धीरे-धीरे सार्वजनिक नैतिकता कानून का हिस्सा बनी और फिर वही राजनीति में भी इस्तेमाल होने लगी।

अपनी प्रसिद्ध किताब ‘ऑन द जीनियोलॉजी ऑफ मोरल्स’ में जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे कहते हैं कि नैतिकता कोई ऐसी शाश्वत सच्चाई नहीं है जो ऊपर से तय होकर आती हो। समाज समय-समय पर अपने हिसाब से नैतिक नियम बनाता, बदलता और उनका इस्तेमाल करता है। कई बार नैतिकता का इस्तेमाल सही-गलत तय करने से ज्यादा राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए किया जाता है।

इटली के दार्शनिक और विचारक एंटोनियो ग्राम्शी ने भी इस विषय को अलग तरीके से समझाया। उन्होंने कहा कि एक तरफ राजनीतिक व्यवस्था होती है जो कानून और सरकारी संस्थाओं के जरिए काम करती है। वहीं दूसरी तरफ नागरिक समाज होता है जहां लोगों की सोच और सहमति बनाई जाती है।

आज भी दिखता है सामंती सोच का असर

तमिलनाडु भले ही राजनीतिक रूप से आधुनिक राज्य माना जाता हो लेकिन सामाजिक स्तर पर आज भी कई जगह सामंती सोच का असर दिखाई देता है। यही सोच कई बार राजनीति में भी नजर आती है। द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख नेता सी. एन. अन्नादुरै की अधिकांश फिल्मों का संदेश सामंतवाद और अंधविश्वास के विरोध में था। हालांकि जमींदारी व्यवस्था खत्म हो चुकी है। लेकिन उससे जुड़ी भाषा और सामाजिक सोच अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

इसी संदर्भ में उदयनिधि स्टालिन की विवादित टिप्पणी को भी देखा जा रहा है। यह विवाद सिर्फ एक बयान का नहीं बल्कि उस पुरानी राजनीतिक परंपरा का हिस्सा है जिसमें नैतिकता को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे मामलों में निशाना केवल किसी नेता का निजी जीवन नहीं होता बल्कि उसकी राजनीतिक विश्वसनीयता और वैधता को कमजोर करने की कोशिश की जाती है। जब जनता किसी नेता के नैतिक आचरण पर सवाल उठाने लगती है तो उसके राजनीतिक कद और स्वीकार्यता पर भी असर पड़ता है।

सत्ता से विपक्ष तक: पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री का बेटा नहीं

तमिलनाडु की राजनीति में उदयनिधि स्टालिन अपने राजनीतिक जीवन में शायद पहली बार किसी पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे की तरह नहीं दिखे। बल्कि एक विपक्षी राजनेता की तरह नजर आए। कावेरी जल विवाद को लेकर उदयनिधि ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय पर टिप्पणी की थी। जिसके बाद पुलिस ने उन्हें मंगलवार को चेन्नई के नीलांगरई स्थित आवास से हिरासत में लिया। पुलिस के साथ बाहर आते उदयनिधि की तस्वीरें इसलिए चर्चा में नहीं थीं कि तमिलनाडु में किसी नेता की गिरफ्तारी हुई, बल्कि इसलिए कि इस बार तस्वीर में सत्ता नहीं, विपक्ष दिखाई दे रहा था।