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मनमोहन काल में नियम तोड़ कर संसदीय समिति‍ सदस्‍य बनाए गए थे विजय माल्‍या

विजय माल्या पहली बार साल 2002 में कर्नाटक से निर्दलीय सांसद के तौर पर चुनाव जीतकर राज्यसभा पहुंचे थे। उस वक्त कांग्रेस और जेडीएस ने उन्हें समर्थन दिया था।

शराब कारोबारी विजय माल्या। (एपी फाइल फोटो)

बैंकों के करीब 9000 करोड़ रुपये लेकर फरार चल रहे शराब कारोबारी विजय माल्या को साल 2010 में नियमों की अनदेखी कर संसदीय समिति का सदस्य बनाया गया था। माल्या को अगस्त 2010 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय की सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया था। उस वक्त केंद्र में मनमोहन सिंह की यूपीए-2 की सरकार थी और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल नागरिक उड्डयन मंत्री थे। नियमत: ऐसे लोगों को संसदीय समिति में सदस्य नहीं बनाया जाता है, जिनका उस विभाग से संबंधित कोई कारोबार हो और सीधे-सीधे उनका निजी या व्यावसायिक हित जुड़ा हो लेकिन विजय माल्या के केस में इस नियम की अनदेखी की गई। माल्या किंगफिशर एयरलाइन्स के मालिक हैं। उस वक्त उनकी एयरलाइन्स परिचालन में थी। बता दें कि संसद के मैन्यूअल के मुताबिक मंत्रालयों की सलाहकार समिति का गठन विभागीय मंत्री करते हैं। इसके लिए मंत्री लोकसभा और राज्यसभा में विभिन्न दलों के नेताओं को पत्र लिखकर उनसे नाम की सिफारिश मंगवाते हैं और बाद में समिति में उनकी नियुक्ति करते हैं। निर्दलीय उम्मीदवारों के मामले में मंत्री स्वयं उस सांसद को मनोनीत करते हैं।

विजय माल्या पहली बार साल 2002 में कर्नाटक से निर्दलीय सांसद के तौर पर चुनाव जीतकर राज्यसभा पहुंचे थे। उस वक्त कांग्रेस और जेडीएस ने उन्हें समर्थन दिया था। दूसरी बार फिर माल्या निर्दलीय सांसद के तौर पर कर्नाटक से चुनाव जीतक राज्य सभा पहुंचे थे। इस बार उन्हें बीजेपी और जेडीएस ने समर्थन दिया था। इसके बाद अगस्त 2010 में तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने माल्या को विमानन मंत्रालय की सलाहकार (परामर्शदातृ) समिति का सदस्य बनाया था। माल्या इसके अलावा केमिकल एंड फर्टिलाइजर, इंडस्ट्री, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, पर्यावरण एवं वन समेत रक्षा मंत्रालयों की संसदीय समिति में भी सदस्य रह चुके हैं।

बता दें कि विजय माल्या पिछले लगभग ढाई साल से देश से फरार हैं और लंदन में रह रहे हैं। भारत सरकार माल्या के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रही है। इस बीच माल्या ने आरोप लगाया है कि लंदन भागने से पहले उसने वित्त मंत्री अरुण जेटली से संसद में मुलाकात की थी। बता दें कि माल्या उस वक्त राज्यसभा के सांसद थे। बाद में संसद की इथिक्स कमेटी ने जब माल्या की सदस्यता खारिज किए जाने की सिफारिश की तो माल्या ने संसद से इस्तीफा दे दिया था।

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