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3 घंटे में थाने से घर पहुंच गए विजय माल्या, नरेंद्र मोदी सरकार के लिए और मुश्किल होगा प्रत्यर्पण

ब्रिटेन की दुनिया के करीब 100 मुल्कों के साथ प्रत्यर्पण संधि है। यह प्रक्रिया काफी लंबी है। भारत इस संधि में कैटिगरी 2 के टाइप बी वाले मुल्कों में शामिल है।

भारत के 17 बैंकों से 9 हजार करोड़ रुपये का कर्ज लेने वाले विजय माल्या से शायद आज सभी बैंक यही बोल रहे होंगे।

विजय माल्या को बेल मिलने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 3 घंटे में माल्या को बेल मिलने के बाद भारत को इस मामले में ब्रिटेन की डिप्लोमेसी और जूडिशरी से दो-चार होना पड़ेगा। कोर्ट में पेश होने के बाद अब विजय माल्या भगोड़ा नहीं रह गया है, क्योंकि उन्होंने कोर्ट में पेश होकर कानूनी तौर पर बेल ली है। अब नरेंद्र मोदी सरकार को ब्रिटिश अदालत में ठोस सबूत पेश करने होंगे और केस को मजबूत बनाना होगा, ताकि यह साबित किया जा सके कि विजय माल्या पर भारत के 17 बैंकों का 9 हजार करोड़ रुपये लेकर कर्ज है और वह उसने इसे नहीं चुकाया है। माल्या ने बेल मिलने के बाद भारतीय मीडिया पर केस को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने पर तंज कसा और कहा कि अभी तो प्रत्यर्पण का केस शुरू ही हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह केस काफी लंबा खिंच सकता है और इसमें 2-3 साल का वक्त लग सकता है।

कसाब का केस लड़ने वाले वरिष्ठ वकील उज्जवल निकम ने कहा कि माल्या की गिरफ्तारी पर अभी बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अभी इसमें काफी वक्त लग सकता है। बता दें कि पूर्व अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम को इंटरपोल ने साल 2002 में पुर्तगाल के लिसबन से उनकी प्रेमिका मोनिका बेदी के साथ गिरफ्तार किया गया था। अबु सलेम और मोनिका बेदी को फर्जी वीजा की वजह से पुर्तगाल में गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद पुर्तगाल की अदालत ने फरवरी 2004 में मुंबई बम धमाके मामले में सलेम को भारत को सौंपने का रास्ता साफ कर दिया था। इके बाद नवंबर 2005 में अबू सलेम को भारत लाया गया था। वहीं अंडरवर्ल्ड डॉन छोटा राजन साल 1989 में दुबई भाग गया था। इसके बाद उसे 25 अक्टूबर 2015 में इंडोनेशिया की पुलिस ने बाली से गिरफ्तार किया था। उसे 6 नवंबर 2015 को भारत भेजा गया था।

माल्या के केस में भी भारत के सामने काफी मुश्किलें हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि काफी जटिल है। यह है प्रक्रिया:

-भारत और ब्रिटेन के बीच जो प्रत्यर्पण संधि है, वह काफी जटिल है। ब्रिटेन की दुनिया के करीब 100 मुल्कों के साथ प्रत्यर्पण संधि है। यह प्रक्रिया काफी लंबी है। भारत इस संधि में कैटिगरी 2 के टाइप बी वाले मुल्कों में शामिल है।

-सबसे पहले विदेश मंत्रालय से आग्रह किया जाएगा, जो इस बात का फैसला करता है कि इसे सर्टिफाई किया जाए या नहीं।

-जज फैसला करता है कि शख्स के अरेस्ट के लिए वॉरंट जारी किया जाए या नहीं। इसके बाद शुरुआती सुनवाई होगी। इसके बाद प्रत्यर्पण की सुनवाई होगी।

-इसके बाद विदेश मंत्री तय करता है कि प्रत्यर्पण का आदेश दिया जाए या नहीं। आग्रह करने वाले देश को क्राउन प्रॉसिक्युशन सर्विस (सीपीएस) को आग्रह का शुरुआती मसौदा सौंपने के लिए कहा जाता है, ताकि बाद में कोई दिक्कत न हो।

-अगर कोर्ट स्वीकार कर लेता है कि पूरी जानकारी मुहैया करा दी गई है तो गिरफ्तारी का वॉरंट जारी किया जाएगा। इसमें उस शख्स से जुड़ी सारी जानकारी होती है।

-गिरफ्तारी के बाद शुरुआती सुनवाई और प्रत्यर्पण सुनवाई होती है। इसके बाद जज संतुष्ट होता है तो मामले को विदेश मंत्रालय को बढ़ा दिया जाता है।

-इसके बावजूद जिसके प्रत्यर्पण पर बातचीत हो रही है, वो शख़्स मामला विदेश मंत्रालय को भेजने के जज के फ़ैसले पर अपील कर सकता है।

-अहम बात है कि विदेश मंत्रालय को मामला भेजने के दो महीने के भीतर फैसला करना होता है। ऐसा ना होने पर व्यक्ति रिहा करने के लिए आवेदन कर सकता है। हालांकि विदेश मंत्री अदालत से फैसला देने की तारीख आगे बढ़वा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद भी शख्स के पास हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार रहता है। यानी विजय माल्या को भारत लाने की प्रक्रिया काफी जटिल है।

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