तमिलनाडु की राजनीति और प्रशासन के लिए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की सरकार के शुरुआती 100 दिन एक असामान्य प्रयोग की तरह रहे हैं। एक तरफ लंबे समय से स्थापित और मजबूत प्रशासनिक ढांचे के सामने ऐसी राजनीतिक टीम सत्ता में आई है, जिसके अधिकांश सदस्यों के पास सरकार चलाने का अनुभव लगभग नहीं है। दूसरी तरफ इसी अनुभवहीनता ने कुछ पुराने तौर-तरीकों को चुनौती देने की गुंजाइश भी पैदा की है।
100 दिन किसी सरकार के प्रदर्शन को पूरी तरह आंकने के लिए बहुत लंबा समय नहीं होता। इस अवधि में उपलब्धियों की सूची, विज्ञापन और राजनीतिक दावे तो सामने आ सकते हैं, लेकिन यह पता लगाना मुश्किल होता है कि प्रशासन की कार्यशैली वास्तव में बदली है या नहीं। विजय सरकार के मामले में यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि तमिलनाडु की प्रशासनिक मशीनरी दशकों से स्थापित राजनीतिक दलों के साथ काम करती रही है।
अनुभव की कमी बनी ताकत
सरकार के 50 दिन पूरे होने पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने TVK सरकार की तुलना आजादी के बाद बनी नई सरकार से की थी। उनका कहना था कि नई सरकार में ऊर्जा तो बहुत है, लेकिन सरकारी कामकाज की समझ सीमित है। कई मंत्री और विधायक पहली बार सरकारी समीक्षा बैठकों, नीति दस्तावेजों और सचिवालय की जटिल प्रक्रियाओं से रूबरू हुए। उनके लिए फोर्ट सेंट जॉर्ज का प्रशासनिक तंत्र एक बिल्कुल नई दुनिया था।
दिलचस्प बात यह है कि अनुभव की यही कमी सरकार के लिए कुछ मामलों में फायदे का कारण भी बनी है। इनमें सबसे चर्चित मुद्दा भ्रष्टाचार है। कई वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार शुरुआती 100 दिनों में विभागों में भ्रष्टाचार के खुले तौर पर होने में कमी दिखाई दी है। हालांकि, अधिकारी यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि यह बदलाव स्थायी रहेगा।
एक वरिष्ठ सरकारी सचिव के मुताबिक भ्रष्टाचार के लिए भी एक तरह की व्यवस्था और कौशल की जरूरत होती है। पैसे मांगने, लेने, उसे संभालने और राजनीतिक स्तर तक पहुंचाने की पूरी प्रक्रिया एक स्थापित तंत्र पर निर्भर करती है। नई सरकार के मंत्रियों के पास ऐसा पुराना नेटवर्क मौजूद नहीं है।
तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीतिक पार्टियों के साथ लंबे समय में ऐसे तंत्र विकसित हुए थे। पार्टी फंड से लेकर अधिकारियों की पोस्टिंग तक, राजनीतिक और प्रशासनिक नेटवर्क की अपनी एक व्यवस्था बन चुकी थी। टीवीके सत्ता में ऐसी विरासत के बिना आई है।
कुछ विभागों में इसका असर भी दिखाई दे रहा है। बिजली बोर्ड में कुछ महत्वपूर्ण ट्रांसफर अब काउंसलिंग और ऑनलाइन व्यवस्था की ओर बढ़ाए गए हैं। इससे अधिकारियों की पोस्टिंग के बदले राजनीतिक दबाव और आर्थिक लेन-देन की पुरानी व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। पुलिस अधिकारियों पर स्थानीय राजनीतिक नेताओं का दबाव कम होने की बात भी सामने आई है।
हालांकि, इसे स्थायी सुधार मान लेना जल्दबाजी होगी। सरकार के पास करीब 10 लाख कर्मचारी हैं और भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली व्यवस्था अभी भी सीमित संसाधनों के साथ काम करती है। आने वाले महीनों में यह देखना होगा कि नई राजनीतिक टीम के भीतर भी पुराने तौर-तरीके जगह बनाते हैं या नहीं।
ब्यूरोक्रेसी के पास अनुभव का बड़ा फायदा
फिलहाल प्रशासनिक अधिकारियों के पास स्पष्ट बढ़त है। वे राज्य की व्यवस्था, विभागीय प्रक्रियाओं और सरकारी नियमों को मंत्रियों की तुलना में कहीं बेहतर जानते हैं। सरकार में अभी ऐसा कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं है जिसके पास वर्षों का प्रशासनिक अनुभव हो और जो किसी जटिल विभागीय प्रस्ताव को उसकी बारीकियों के साथ चुनौती दे सके।
विजय के सामने अधिकारी शिकायत लेकर आते हैं और अधिकारी भी मंत्रियों की शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचाते हैं। लेकिन कई मामलों में विजय की अनुभवहीनता ने ब्यूरोक्रेसी की पुरानी आदतों को भी चुनौती दी है।
उदाहरण के लिए, विवादित मामलों में सरकार का अदालत का रुख करना लंबे समय से एक सुविधाजनक रास्ता रहा है। विजय ने सवाल उठाया कि हर मामले में तुरंत अदालत जाने के बजाय पहले बातचीत क्यों नहीं की जा सकती। कावेरी नदी के मुद्दे पर कर्नाटक के साथ सीधे बातचीत की उनकी कोशिश इसी सोच का उदाहरण थी, भले ही वह सफल नहीं हो सकी।
दौरे से आगे बढ़कर सिस्टम में बदलाव जरूरी
विजय की कार्यशैली का सबसे प्रमुख पहलू उनकी अचानक और हाई-प्रोफाइल विजिट रही है। चेन्नई के दलित छात्रावास में उनका अचानक पहुंचना या एग्मोर के उस बच्चों के अस्पताल का दौरा करना, जहां उनका जन्म हुआ था, सुर्खियों में रहा।
मुख्यमंत्री के किसी संस्थान में पहुंचते ही पूरा सरकारी तंत्र सक्रिय हो जाता है। अधिकारी पहुंचते हैं, निरीक्षण होता है, निर्देश जारी होते हैं और कभी-कभी कार्रवाई भी होती है। लेकिन असली सवाल यह है कि मुख्यमंत्री के वहां से निकलने के बाद क्या सिस्टम बदलता है?
अगर किसी छात्रावास में खामियां मिलती हैं तो केवल उसी छात्रावास की समस्या दूर करना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार के पास पूरे तमिलनाडु के छात्रावासों का ऐसा डैशबोर्ड होना चाहिए, जिसमें यह पता चल सके कि किस छात्रावास का आखिरी निरीक्षण कब हुआ, पानी और भोजन की व्यवस्था कैसी है, कितनी शिकायतें लंबित हैं और दिए गए निर्देशों पर अमल हुआ या नहीं।
इसी तरह अस्पताल का दौरा सिर्फ उस अस्पताल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उससे पूरे राज्य में बेड, डॉक्टरों की उपलब्धता, स्टाफ, मरीजों की प्रतीक्षा अवधि और दूसरी कमियों का डेटा सामने आना चाहिए। वरना सरकार का कामकाज उन घटनाओं की श्रृंखला बन सकता है, जिनमें मुख्यमंत्री की तस्वीर तो खूब दिखाई दे, लेकिन स्थायी संस्थागत बदलाव कम नजर आए।
विधानसभा की लाइव कवरेज से बढ़ी राजनीतिक पारदर्शिता
सरकार ने विधानसभा की कार्यवाही को भी ज्यादा सार्वजनिक बनाने की दिशा में कदम उठाया है। प्रश्नकाल, बहस और सदन के भीतर होने वाली चर्चाओं का लाइव प्रसारण अब जनता को सीधे राजनीतिक प्रक्रिया देखने का अवसर देता है।
विजय की पहले से मौजूद बड़ी लोकप्रियता को देखते हुए इसका प्रभाव ज्यादा हो सकता है। अब मतदाता केवल संपादित वीडियो या अखबारों की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहेंगे, बल्कि सदन में कौन क्या कह रहा है, यह सीधे देख सकेंगे।
इससे विपक्षी दलों पर भी दबाव बढ़ सकता है। सदन से बहिष्कार या वॉकआउट करने से पहले पार्टियों को यह सोचना पड़ेगा कि जनता पूरी घटना को खुद देख रही है।
विजय की सबसे बड़ी ताकत, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी
विजय को एक खास राजनीतिक लाभ यह मिला है कि उनका कोई पुराना शासन रिकॉर्ड नहीं है। DMK और AIADMK जैसे दलों के विपरीत विपक्ष विजय से यह सवाल नहीं पूछ सकता कि दस साल पहले सत्ता में रहते हुए उन्होंने क्या किया था। उनकी राजनीतिक पहचान लगभग पूरी तरह वर्तमान से बनी है। यही उनकी नैतिक ताकत है और यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी।
अगर भ्रष्टाचार या प्रशासनिक विफलता का कोई बड़ा मामला विजय सरकार के कार्यकाल में सामने आता है तो उसका राजनीतिक नुकसान ज्यादा हो सकता है। आखिर उनकी राजनीति का बड़ा आधार यही रहा है कि वे पुराने राजनीतिक ढांचे से अलग व्यवस्था देने आए हैं। जिस स्पॉटलाइट ने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया है, वही स्पॉटलाइट अब उनके शासन की हर कमी को भी बड़ा करके दिखा सकती है।
उपलब्धियों की लंबी सूची, लेकिन आर्थिक सीमाएं भी
पहले 100 दिनों में सरकार ने कई पारंपरिक घोषणाएं और योजनाएं भी पेश की हैं। मुफ्त बिजली से जुड़ी रियायतें, महिला सुरक्षा और नशा विरोधी पहल, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक स्थलों के पास 717 तस्माक दुकानों को बंद करना, फसल ऋण राहत और कई कल्याणकारी वादे सरकार की उपलब्धियों में गिनाए जा रहे हैं।
पहले बजट में 125 चुनावी वादों को शामिल करने का दावा किया गया। सरकार के मुताबिक पहले 100 दिनों में एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के निवेश प्रस्ताव भी सामने आए हैं। लेकिन वित्तीय दबाव इन घोषणाओं के सामने बड़ी चुनौती है।
सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना के वादे को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई पुरानी योजनाएं जारी हैं, कुछ को नए नाम दिए गए हैं और प्रशासनिक ढांचे का बड़ा हिस्सा अब भी उसी तरह काम कर रहा है जैसे पिछली सरकारों के समय करता था। यानी सरकार बदलने से शासन की पूरी मशीनरी अपने आप नहीं बदल जाती।
राजनीति में पुराने तौर-तरीकों की वापसी?
सरकार के शुरुआती 100 दिनों पर सबसे गहरे राजनीतिक सवाल भी उठे हैं। AIADMK विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त से लेकर TVK विधायकों को तोड़ने के आरोपों तक, सत्ता की राजनीति में पुराने तौर-तरीकों की झलक दिखाई दी है।
यह स्थिति उस पार्टी के लिए असहज करने वाली है, जिसने खुद को नई राजनीतिक संस्कृति के विकल्प के रूप में पेश किया था। अगर नई राजनीति भी सत्ता के साथ वही पुराने राजनीतिक खेल अपनाने लगे, तो बदलाव का दावा कमजोर पड़ सकता है।
100 दिन नहीं, लंबी दौड़ होगी असली परीक्षा
द्रविड़ राजनीति के एक एक्सपर्ट ने इसे ऐसी राजनीति के रूप में देखने की सलाह दी है जिसमें कोई गारंटी नहीं होती। तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास ऐसे वादों से भरा है, जिन्हें सत्ता में आने के बाद वास्तविक प्रशासनिक और आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
विजय के सामने भी यही चुनौती है। केवल ‘बदलाव’ का वादा अपने आप में उपलब्धि नहीं बन सकता। जनता को यह महसूस होना चाहिए कि बदलाव प्रशासनिक संस्थाओं, भ्रष्टाचार नियंत्रण, कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में दिखाई दे रहा है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने विजय के बारे में बेहद दिलचस्प टिप्पणी की, उनका लक्ष्य मुख्यमंत्री बनना था और उन्होंने वह हासिल कर लिया। अब सवाल यह है कि उस सपने के पूरा होने के बाद वह वास्तव में करना क्या चाहते हैं।
यही सवाल विजय सरकार के अगले चरण की सबसे बड़ी परीक्षा भी है। पहले 100 दिनों में विजय ने तमिलनाडु की व्यवस्था को समझना शुरू किया है। अब देखना यह है कि अगले कुछ वर्षों में तमिलनाडु की व्यवस्था विजय के आने से खुद को कितना बदल पाती है। क्योंकि असली बदलाव वह नहीं है जो मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान दिखाई दे, बल्कि वह है जो उनके चले जाने के बाद भी सिस्टम में बना रहे।
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