तमिलनाडु में बुधवार को फ्लोर टेस्ट के दौरान एआईएडीएमके के 25 विधायकों ने चंद्रशेखर जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को समर्थन दिया। इन विधायकों का समर्थन हासिल कर विजय सरकार ने विश्वास मत हासिल कर लिया। इसके साथ ही एआईएडीएमके में टूट भी अब औपचारिक रूप ले चुका है। पहली नजर में इस टूट से विजय सरकार अधिक सुरक्षित दिख रही है। लेकिन सत्ताधारी खेमे के भीतर यह चिंता भी है कि विजय सरकार को समर्थन दे रहा एआईएडीएमके का यह धड़ा कहीं दिल्ली के प्रभाव में तो नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो आने वाले समय में सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
दूसरी ओर पहली बार विधायक बनीं लीमा रोज मार्टिन के एआईएडीएमके विधायकों को एडप्पडी के पलानीस्वामी (ईपीएस) के नेतृत्व से अलग करने में अहम भूमिका निभाने की चर्चा है। इसी के साथ यह आशंका भी बढ़ गई है कि लॉटरी कारोबारी सैंटियागो मार्टिन का प्रभाव अब तमिलनाडु प्रशासन तक फैल सकता है। लीमा सैंटियागो मार्टिन की पत्नी हैं जबकि उनके दामाद आधव अर्जुन विजय के करीबी सहयोगी और टीवीके सरकार में मंत्री हैं। सूत्रों के मुताबिक लीमा जल्द कैबिनेट का हिस्सा बन सकती हैं।
विधानसभा चुनाव के परिणाम की घोषणा के बाद उभर कर आए इन राजनीतिक घटनाक्रम ने जयललिता के निधन के बाद से एआईएडीएमके के भीतर पनप रही दुविधाओं को फिर से जिंदा कर दिया है। चाहे वो ईपीएस की लीडरशिप की क्षमता पर सवाल हो, भाजपा के प्रभाव को लेकर असहजता हो या फिर वीके शशिकला खेमे की संभावित वापसी का मुद्दा हो।
हालांकि, इन सभी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच शायद ही किसी ने यह सोचा होगा कि इस पूरे घटनाक्रम में मार्टिन परिवार इतना प्रभावशाली बनकर उभरेगा। यह वही परिवार है जिस पर हाल के वर्षों में केंद्रीय एजेंसियों का दबाव रहा है। अब स्थिति यह है कि परिवार का एक सदस्य तमिलनाडु के पड़ोसी पुडुचेरी में एनडीए का विधायक भी है।
पर्दे के पीछे की नायिका – लीमा रोज मार्टिन
सूत्रों के अनुसार एआईएडीएमके विधायक लीमा रोज मार्टिन ने सबसे पहले संकेत दिया था कि पार्टी के कुछ नेताओं ने टीवीके से संपर्क साधा है। अब उन्हें पर्दे के पीछे से एआईएडीएमके विधायकों को टीवीके खेमे में लाने की बड़ी भूमिका निभाने का श्रेय दिया जा रहा है। दावा है कि इन विधायकों को मंत्री पद, बोर्ड चेयरमैन जैसे पद और कथित आर्थिक लाभ के प्रस्ताव दिए गए।
टीवीके के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि एआईएडीएमके के बागी गुट ने समर्थन के बदले आठ मंत्री पदों की मांग की है, जिनमें दो पद महिलाओं के लिए हैं। नेता ने कहा, “इनमें से एक लीमा के लिए है। चाहे विभाग कोई भी क्यों न हो।” आधिकारिक तौर पर बागी एआईएडीएमके नेताओं ने टीवीके को समर्थन देने को “वैचारिक सुधार” बताया है।
पूर्व मंत्री सी वी शनमुगम जो बागी गुट के प्रमुख नेताओं में हैं उन्होंने विधानसभा सत्र के बाद ईपीएस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री झूठ बोल रहे हैं। वो विधायकों के समर्थन को लेकर फर्जी दावे कर रहे हैं। वो गुप्त रूप से डीएमके के समर्थन से अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर रहे थे।
EPS ने बागियों को पार्टी पद से हटाया
ईपीएस खेमे ने जवाब में कहा कि उन्हें सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना गया था और बुधवार को विजय सरकार के खिलाफ मतदान के लिए पार्टी के सभी 47 विधायकों को व्हिप भी जारी किया गया था। ईपीएस ने आरोप लगाया कि बागी विधायकों ने “छह मंत्री पद और 10 बोर्ड चेयरमैन पदों” के लालच में पाला बदल लिया। उन्होंने कहा, “ये विधायक सिर्फ ‘टू लीव्स’ चुनाव चिन्ह, एमजीआर और अम्मा (जयललिता) की वजह से जीते हैं। उन्होंने उसी पार्टी से विश्वासघात किया जिसने उन्हें पहचान दी।” बाद में ईपीएस ने बागी नेताओं को पार्टी पदों से हटाने की घोषणा भी की।
हालांकि शनमुगम ने दावा किया कि विधायक दल की कोई बैठक हुई ही नहीं थी। उन्होंने ईपीएस को चुनौती देते हुए कहा कि वह उस प्रस्ताव सार्वजनिक करें, जिसमें सभी 47 विधायकों के हस्ताक्षर हैं। शनमुगम के मुताबिक जिन हस्ताक्षरों का दावा ईपीएस कर रहे हैं वे चुनाव के बाद पुडुचेरी के एक रिसॉर्ट में लिए गए थे और उनका उद्देश्य ईपीएस को विधायक दल का नेता चुनना नहीं बल्कि डीएमके के बाहरी समर्थन से एआईएडीएमके सरकार बनाने के प्रस्ताव को बल देना था।
उन्होंने आरोप लगाया कि ईपीएस ने विधायकों से कहा था कि इस योजना को “दिल्ली” की मंजूरी प्राप्त है। बागी गुट के मुताबिक विजय सरकार का समर्थन करना वैचारिक आत्मसमर्पण नहीं बल्कि डीएमके के समर्थन से बनने वाली ईपीएस के नेतृत्व वाली सरकार से कम अपमानजनक विकल्प है। शनमुगम ने कहा कि चुनावों के दौरान एआईएडीएमके और टीवीके दोनों का लक्ष्य डीएमके को हराना था। उन्होंने पूछा, “अगर पलानीस्वामी डीएमके के समर्थन से सरकार बनाने के बारे में सोच सकते हैं तो हम विजय सरकार का समर्थन क्यों नहीं कर सकते?”
बागी गुट के दूसरे बड़े नेता एसपी वेलुमणि ने भी ईपीएस के नेतृत्व की समीक्षा की मांग की। उन्होंने कहा कि पार्टी 2019, 2021 और अब 2026 में लगातार हार झेल चुकी है। वेलुमणि ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं के लिए ईपीएस को जिम्मेदार ठहराया और वीके शशिकला, टीटीवी दिनाकरन, ओ पन्नीरसेल्वम समेत निष्कासित नेताओं की वापसी की सार्वजनिक अपील की।
एआईएडीएमके के पुनर्गठन की शुरुआत
गौरतलब है कि जयललिता के निधन के बाद ईपीएस ने ही संघर्ष कर पार्टी की कमान संभाली थी। वह इन नेताओं की वापसी के सबसे बड़े विरोधी रहे हैं। इधर, इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। एआईएडीएमके के कई नेताओं ने निजी तौर पर माना कि विजय सरकार का समर्थन करने वाले कई नेता राजनीतिक रूप से भाजपा नेतृत्व के अधिक करीब हैं।
उनके अनुसार, एआईएडीएमके में यह विद्रोह दिल्ली (केंद्र की एनडीए सरकार) के बहुत सारे राजनीतिक हितों के अनुकूल है। इस फैसले से ईपीएस की क्षेत्र में पकड़ कमजोर होगी, टीवीके सरकार में कांग्रेस के केवल पांच विधायकों की तुलना में एक बड़ा प्रभावशाली गुट बनेगा और भविष्य में तमिलनाडु की किसी भी संसदीय व्यवस्था को अधिक फ्लेक्सिबल समझौतों पर निर्भर रखा जा सकेगा। इस लिहाज से देखा जाए तो मंगलवार-बुधवार की घटनाएं जयललिता के बाद लंबे समय से टल रहे एआईएडीएमके के पुनर्गठन की शुरुआत मानी जा रही हैं।
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तमिलनाडु विधानसभा में बुधवार को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किया गया विश्वासमत प्रस्ताव बहुमत से पारित हो गया। टीवीके चीफ ने बड़े आराम से फ्लोर टेस्ट पास कर लिया। उन्हें कुल 144 विधायकों ने समर्थन दिया, जो 234 सदस्यीय विधानसभा के बहुमत के आंकड़े 118 से अधिक है। पूरी खबर पढ़ें…
