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बचपन पर भारी पड़ते वीडियो गेम

बच्चे इनमें ऐसे रम जाते हैं जैसे उन्हें न भूख की सुध होती है और न खेल के असली मैदान में जाने का मन करता है।

Author नई दिल्ली | Published on: December 3, 2017 5:06 AM
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मीना

कभी वह ड्रैगनों के झुंड की मास्टर बनती है और उन्हें लड़वाती है। वह एक गांव भी बनाती है और जीतने के लिए खूब सारे ड्रैगन्स की जंग करवाती है। सोफे पर बैठ कर उसकी भाव-भंगिमा और भाषा शैली आठ साल की बच्ची की नहीं लगती। लड़ो, मरो, काटो, मार डालो, आगे बढ़ो, शाबास वाली भाषा बोलते वक्त वह हॉलीवुड की फिल्में ग्लैडिएटर या हंड्रेड के किरदारों की नकल करती दिखती है। शनिवार और रविवार को स्कूल की तो छुट्टी होती है। लेकिन छुट्टी वाले ये दोनों दिन आठ साल की तन्नू एक ऐसी दुनिया पर हुकूमत चलाती है जहां वह किसी सियासत की क्रूर मल्लिका है।  उसकी मां अलका कहती हैं कि मेरी बेटी अभी 8 साल की है। रोजमर्रा में तो वह स्कूल और अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहती है। लेकिन छुट्टी वाले दिन वह पूरा दिन वीडियो गेम खेलने में निकाल देती है। रोल प्ले गेमिंग (आरपीजी) उसे ज्यादा पसंद हैं। इधर, उसकी जिद पर मैंने उसे 300 रुपए तक का वीडियो गेम दिलाया। उसे खाने के लिए बुलाओ तो पांच मिनट बोल-बोल कर पूरा दिन निकाल देती है और मैं परेशान हो जाती हूं। कभी एलियंस के बीच, ड्रैगन की सवारी, खजाने की खोज, तो कभी चोर-पुलिस, कभी राक्षस को मारना और न जाने क्या-क्या। ये वीडियो गेम्स एक बटन दबाते ही खेले जा सकते हैं। बच्चे कब इन वीडियो गेम्स की आभासी दुनिया को असली दुनिया मान लेते हैं हमें पता ही नहीं चलता है। उस आभासी दुनिया में जैसा होता है वे हूबहू वैसा ही करते चले जाते हैं।

दिल्ली के पटपड़गंज में टेक्नोलॉजी अपार्टमेंट में रहने वाले रॉबिन 11वीं क्लास में पढ़ते हैं। रॉबिन बताते हैं कि वे 2010 से विडियो गेम्स खेल रहे हैं। इन दिनों फुटबॉल गेम फीफा खेलते हैं। यह गेम उन्होंने 3000 रुपए में खरीदा था। जब उनसे पूछा गया कि गेम्स खरीदने के लिए उन्होंने कभी जिद तो नहीं की तो वे कहते हैं कि नहीं, क्योंकि वो साल में एक गेम खरीदते हैं जिसके लिए वे अपने मां-बाप को पहले ही कह देते हैं। इस गेम को खेलने में वे एक घंटा बिताते हैं। लडब्लूडब्लूई एक फाइटिंग गेम है जिसे बच्चे बड़े चाव से टीवी पर देखते हैं। अब आलम यह है कि इस गेम को बच्चे सिर्फ टीवी पर ही नहीं देखते बल्कि इसके महंगे वीडियो गेम्स खरीदते हैं और घर बैठकर खेलते हैं। डब्लूडब्लूई गेम के दीवाने भरत कहते हैं कि मुझे यह गेम खेलने में बहुत मजा आता है। इसमें जीतने की खुशी बहुत अधिक होती है। अगर कभी हमारे दोस्तों के बीच लड़ाई होती है तो जैसे डब्लूडब्लूई में फाइट करते हैं मैं भी वैसे ही ट्रिक्स अपनाता हूं और जीत जाता हूं। मेरा पूरा ग्रुप इस तरह के वीडियो गेम्स खेलता है। पूर्वी दिल्ली में साइबर कैफे चलाने वाले राम कहते हैं कि उनके कैफे पर एक घंटे में 4 से 5 बच्चे गेम खेलने के लिए आते रहते हैं। और, मेरी ठीक-ठाक कमाई हो जाती है। एक बच्चा हमारे यहां आता था जो दिन के 10 घंटे सिर्फ गेम पर ही निकालता था। वह एक फाइटिंग विडियो खेलता था, जिसमें जीतने के लिए कई-कई घंटे हमारे यहां बिताता था। राम अपनी दुकान में 1000 से 2000 तक के वीडियो गेम रखते हैं।

लेवल्स वाले गेम हैं नुकसानदेह
क्या वीडियो गेम का कुछ अच्छा असर भी होता है? इस सवाल के जवाब में डॉक्टर नंदू ने बताया कि निर्भर करता है कि यह गेम किस तरह का है। जैसे कुछ गेम्स कंस्ट्रक्टिव होते हैं, कुछ पजल्स होते हैं। अगर ये गेम वे थोड़े समय के लिए खेलते हैं तो ठीक रहता है। कुछ गेम्स एडिक्टिेड होते हैं, जिनमें लेवल्स होते हैं। उन गेम्स में बच्चों को दिक्कतें होती हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कुछ बच्चे मुखर होते हैं जो वीडियो गेम खेलते समय खुद को कंट्रोल नहीं कर पाते हैं। उनमें डिप्रेशन बढ़ने लगता है जो कई बार आत्महत्या की ओर ले जाता है।
बचाव का क्या हो उपाय
डॉक्टर नंदू का कहना है कि हम बच्चों को संवेदनशील बनाते हैं। हम पहले बच्चों के खेलने का समय कम करते हैं। उन्हें कम करने में तकलीफ होती है, एंग्जाइटी होती है। इस पर कंट्रोल कैसे करना है इसके बारे में भी हम उन्हें बताते हैं। जैसे गहरी सांस लेना। इस तरह की गतिविधियों से हम उनका समय बढ़ाते हैं। फिर आधे घंटे से एक घंटा करके उन्हें किसी और गतिविधि में लगाते हैं। उनका फोकस पढ़ाई की तरफ लाते हैं। इस तरह धीरे-धीरे करके हम उन पर नियंत्रण करते हैं।

 
असली खेल के मैदान से दूर
वीडियो गेम्स दो तरह के होते हैं। पहला पोर्टेबल गेमिंग सिस्टम और दूसरा होता है गेमिंग कंसोल सिस्टम। पोर्टेबल गेमिंग सिस्टम में मोबाइल या लैपटॉप पर गेम खेला जाता है। वहीं गेमिंग कंसोल सिस्टम बड़ी स्क्रीन पर टीवी की स्क्रीन के साथ जोड़कर खेला जाता है। इनमें बच्चे इनमें ऐसे रम जाते हैं जैसे उन्हें न भूख की सुध होती है और न खेल के असली मैदान में जाने का मन करता है।

सेहत पर बुरा असर
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में मनोचिकित्सक डॉक्टर नंदु का कहना है कि जो बच्चे ज्यादातर समय गेम्स खेलते हैं उनका इरिटेशन लेवल बढ़ जाता है। वे किसी काम पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। नींद नहीं आती और धीरे-धीरे खेल में बच्चों का इनवॉल्वमेंट इतना अधिक हो जाता है कि उनकी सोशल और एकेडमिक एक्टिविटी कम हो जाती है।

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