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7/11 मुंबई धमाका: पीड़ितों के परिजन ने कहा, देर में सही लेकिन इंसाफ़ मिला

साल 2006 के सिलसिलेवार ट्रेन धमाकों के पीड़ितों के परिजन ने एक विशेष अदालत की ओर से इस मामले के 12 दोषियों में से पांच को सुनाई गई मौत की सजा..

Author मुंबई | September 30, 2015 8:08 PM
साल 2006 के सिलसिलेवार ट्रेन धमाकों के पीड़ितों के परिजन ने एक विशेष अदालत की ओर से इस मामले के 12 दोषियों में से पांच को सुनाई गई मौत की सजा और शेष को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को ‘‘सही सजा’’ करार देते हुए फैसले की तारीफ की और कहा कि इंसाफ में देरी हुई है, लेकिन इंसाफ मिला है। (पीटीआई फोटो)

साल 2006 के सिलसिलेवार ट्रेन धमाकों के पीड़ितों के परिजन ने एक विशेष अदालत की ओर से इस मामले के 12 दोषियों में से पांच को सुनाई गई मौत की सजा और शेष को सुनाई गई उम्रकैद की सजा को ‘‘सही सजा’’ करार देते हुए फैसले की तारीफ की और कहा कि इंसाफ में देरी हुई है, लेकिन इंसाफ मिला है। इन सिलसिलेवार धमाकों में 189 लोग मारे गए थे जबकि 829 लोग जख्मी हो गए थे।

सिलसिलेवार धमाकों की चपेट में आकर नौ साल तक एक अस्पताल में जिंदगी की खातिर जूझने के बाद हाल ही दम तोड़ देने वाले पराग सावंत के परिजन ने कहा कि उन्हें न्याय तभी मिलेगा जब मौत की सजा पाने वाले दोषियों को फांसी दे दी जाए।

11 जुलाई 2006 को पश्चिमी लाइन पर माटुंगा और मीरा रोड के बीच स्थानीय उप-नगरीय ट्रेनों को अपनी चपेट में लेने वाले सिलसिलेवार धमाकों के मामले में विशेष अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए पीड़ितों के परिजन ने कहा कि मुकदमे में थोड़ी तेजी लानी चाहिए थी। विशेष मकोका अदालत ने धमाकों के नौ साल बाद मुकदमा संपन्न किया है।

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पराग के पिता जयप्रकाश ने कहा, ‘‘न्याय तभी होगा जब दोषियों को फांसी दे दी जाए। हमने अपना बेटा खोया है। हमारे साथ जो भी हुआ, वह किसी और के साथ नहीं होना चाहिए। हमारी न्याय व्यवस्था द्वारा कड़ा संदेश दिए जाने की जरूरत है कि ऐसी हरकतों पर नरमी नहीं बरती जाएगी।’’

पराग की मौत इस साल जुलाई में हुई जिससे इस मामले में जान गंवाने वाले वह 189वें पीड़ित थे। उनके परिवार में उनके माता-पिता, पत्नी, एक नाबालिग बेटी और एक भाई हैं।

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दहिसर के रहने वाले और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) अशोक वाघेला बोरीवली में अपनी कंसल्टेंसी कंपनी शुरू करने के बाद शायद ही कभी लोकल ट्रेन से सफर करते थे। लेकिन 11 जुलाई 2006 को वह अपने एक मुवक्किल से मिलने दक्षिण मुंबई गए और धमाकों की चपेट में आ गए।

अशोक की पत्नी योगिता अपने पति की मौत के बाद अपने दो बच्चों के साथ जिंदगी बिता रही है। घटना के वक्त दोनों बच्चे स्कूल में पढ़ते थे और अब सीए की पढ़ाई कर रहे हैं जबकि योगिता अपने परिवार का भरन पोषण करने के लिए त्योहारों के दौरान कपड़े और साज-सज्जा के सामान बेचने का काम करती है।

योगिता ने कहा, ‘‘अदालत ने सही सजा सुनाई है। दोषियों ने कुछ ही मिनटों में कई लोगों की जानें ले ली थी, लेकिन उन्हें दोषी करार देने में नौ साल लग गए।’’

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