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‘सच्चे समाज सुधारक थे सावरकर’, जानें और क्या बोले उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू

नायडू ने आगे कहा, 'वीर सावरकर एक सामान्य पुरुष नहीं थे। वह एक दूरदर्शी समाज सुधारक, भविष्य की ओर देखने वाले उदारवादी और कई मायनों में मूर्तिपूजा के विरोधी और एक प्रख्यात व व्यवहारिक रणनीतिकार थे जो भारत को औपनिवेशिक शासन से आजाद कराना चाहते थे, भले ही हिंसक सशस्त्र प्रतिरोध की जरूरत पड़े।'

Author नई दिल्ली | Updated: November 16, 2019 8:38 AM
नायडू ने विक्रम संपत की पुस्तक ‘सावरकर: इकोज़ फ्रॉम ए फॉरगॉटन पास्ट’ का विमोचन किया। (फाइल फोटो)

उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने शुक्रवार को कहा कि आरएसएस के विचारक विनय दामोदर सावरकर एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक, लेखक, कवि, इतिहासकार, राजनेता और दार्शनिक के मिले जुले रूप थे। विक्रम संपत की पुस्तक ‘सावरकर: इकोज़ फ्रॉम ए फॉरगॉटन पास्ट’ के विमोचन के मौके पर नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में आयोजित एक कार्यक्रम में उप राष्ट्रपति संबोधित कर रहे थे।

नायडू ने कहा, ‘किताब के जरिए वीर सावरकर की जो कहानी सामने आती है, उससे भारत मां के इस दृढ़-संकल्प से भरे बेटे के देशभक्ति से भरे नजरिए का खुलासा होता है। उन्होंने 1857 के विद्रोह को देश की आजादी की पहली लड़ाई करार दिया और सशस्त्र प्रतिरोध को आजादी हासिल करने के विकल्प के तौर पर चुना…सावरकर ने लंदन और पूरे यूरोप में कई वीर युवाओं को नेतृत्व प्रदान किया ताकि भारत की आजादी के लिए समर्थन पाया जा सके।’

नायडू ने आगे कहा, ‘वीर सावरकर एक सामान्य पुरुष नहीं थे। वह एक दूरदर्शी समाज सुधारक, भविष्य की ओर देखने वाले उदारवादी और कई मायनों में मूर्तिपूजा के विरोधी और एक प्रख्यात व व्यवहारिक रणनीतिकार थे जो भारत को औपनिवेशिक शासन से आजाद कराना चाहते थे, भले ही हिंसक सशस्त्र प्रतिरोध की जरूरत पड़े।’

वहीं, नायडू ने इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर दी आर्ट्स (आईजीएनसीए) में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कहा कि दुनियाभर के लोगों ने यह माना है कि भारतीय परिवार व्यवस्था समाज में सौहार्द और आंतरिक शांति की दिशा में आगे बढ़ने की राह दिखाती है। उन्होंने कहा कि समय की कसौटी पर खरी अपनी मजबूत परिवार व्यवस्था के कारण भारत पूरी दुनिया के लिए आदर्श हो सकता है।

यहां उन्होंने समाज में माताओं की भूमिका को सराहते हुए कहा कि सभी धर्मों में श्रद्धा और आदर के साथ माताओं का उच्च स्थान प्रदान किया गया है। सम्मेलन में नायडू ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम – परिवार व्यवस्था और माता की भूमिका’ पर कहा, ‘‘दुनियाभर के धर्मों में महिलाओं और माताओं का विशेष महत्व दिया गया है और वे परिवार एवं मानवता की केंद्र बिंदु हैं।’’

हिंदू धर्म से लेकर, ईसाई धर्म और इस्लाम में माताओं के महत्व को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि हमारे समाज में महिलाओं को न सिर्फ बराबरी का दर्जा मिला है बल्कि वे पुरुषों से भी श्रेष्ठ हैं क्योंकि वे मानवता की जननी हैं।

(भाषा इनपुट्स के साथ)

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