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Vibrant Gujarat Summit 2015: विकास का रास्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के तमाम उपायों पर ध्यान केंद्रित किया है। उसका असर प्रवासी सम्मेलन और वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में स्वाभाविक रूप से देखा गया। सत्ता की बागडोर संभालने के साथ ही उन्होंने अमेरिका जाकर भारतीय मूल के लोगों के बीच अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराई। उसके बाद जिन भी […]

Author January 13, 2015 8:00 PM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक निवेशकों से भारत को कारोबार करने की दृष्टि ‘‘सबसे आसान’’ स्थान बनाने का वादा किया। (फ़ोटो-पीटीआई)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के तमाम उपायों पर ध्यान केंद्रित किया है। उसका असर प्रवासी सम्मेलन और वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में स्वाभाविक रूप से देखा गया। सत्ता की बागडोर संभालने के साथ ही उन्होंने अमेरिका जाकर भारतीय मूल के लोगों के बीच अपनी शानदार उपस्थिति दर्ज कराई। उसके बाद जिन भी देशों में गए, जोर देकर कहते रहे कि भारत में कारोबारी माहौल दूसरे देशों की अपेक्षा अधिक अनुकूल है, आप आएं और निवेश करें। विदेशों में रह रहे भारतवंशियों में मोदी के प्रति पैदा हुए भरोसे से भी संकेत मिला कि भारत में निवेश की स्थितियां कुछ बेहतर हो सकती हैं। इसी का नतीजा है कि प्रधानमंत्री ने वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन के मंच से पूरे उत्साह के साथ कर ढांचे को स्थिर और नीतियों को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने का भरोसा दिलाया। संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका सहित दुनिया के करीब सौ देशों से आए प्रतिनिधियों में से अधिकतर ने नरेंद्र मोदी के प्रयास की तारीफ की। मगर प्रत्यक्ष निवेश से संबंधित जो शुरुआती समझौते हुए उनमें सभी गुजरात में कारोबार शुरू करने को लेकर हुए और उन्हीं उद्योग समूहों ने ये समझौते किए, जो पहले से यहां मौजूद हैं। देश के दूसरे हिस्सों में निवेश की क्या स्थिति बनती है, यह संबंधित राज्यों के रुख पर काफी कुछ निर्भर करेगा।

भले प्रधानमंत्री स्थिर कर ढांचा और निवेश संबंधी नीतियों आदि के मामले में पारदर्शिता लाने का दावा कर रहे हों, पर हकीकत यह है कि अभी तक उनकी सरकार के ज्यादातर फैसले पुरानी सरकार की बनाई रूपरेखा पर ही आधारित हैं। इसलिए यह अकारण नहीं है कि भूमि अधिग्रहण जैसे उसके अध्यादेश को लेकर स्वदेशी जागरण मंच सरीखे भाजपा के आनुषंगिक संगठनों की तरफ से ही विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए हैं। फिर ऐसा नहीं कि मनमोहन सिंह सरकार के समय प्रत्यक्ष निवेश आकर्षित करने के प्रयास कम हुए। उनमें कामयाबी नहीं मिल पाई तो जो वजहें उस वक्त थीं, वे अब भी बनी हुई हैं। पहली बात यह कि बैंक दरों में लगातार परिवर्तन करने, औद्योगिक समूहों को रियायतें देने आदि के बावजूद पिछले कुछ सालों में न तो महंगाई का रुख नीचे की ओर आ रहा है और न विकास दर अपेक्षित गति से आगे खिसक पा रही है। औद्योगिक विकास पर जोर होने के बावजूद गरीबी की दर रोक पाना कठिन बना हुआ है। भ्रष्टाचार के चलते विकास योजनाओं में सुस्ती बनी हुई है। ये स्थितियां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की राह में बड़े रोड़े हैं।

इन स्थितियों से पार पाने की कोई तैयारी नरेंद्र मोदी सरकार के पास फिलहाल नजर नहीं आ रही। यह ठीक है कि भारत एक बड़ा बाजार है, पर इस आधार पर विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने का नतीजा अब तक का यही है कि निर्यात के क्षेत्र में अपेक्षित गति आने के बजाय आयात बढ़ता गया है। फिर बड़े उद्योग समूहों पर अधिक ध्यान दिए जाने की वजह से छोटे और मझोले उद्योग लगातार बुरी दशा को प्राप्त होते गए हैं। जबकि हकीकत यह है कि इन उद्योगों में बड़े उद्योगों की तुलना में रोजगार सृजन की क्षमता कहीं अधिक है। गरीबी से पार पाने का कारगर तरीका यही हो सकता है कि रोजगार के अधिक से अधिक नए अवसर पैदा किए जा सकें। जिन औद्योगिक समूहों को निवेश के लिए आकर्षित कर नरेंद्र मोदी सरकार अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का दम भर रही है, उनके जरिए गरीबी और रोजगार संबंधी समस्या से पार पाने में किस हद तक मदद मिलेगी, इस पर गंभीरता से विचार की जरूरत है।

 

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