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भारत में अमेरिका से भी महंगी वैक्सीन, प्राइवेट अस्पतालों को वैक्सीन देने पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

याचिका में दावा किया गया है कि भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा भारत में विकसित और सरकार द्वारा प्रायोजित होने के बाद भी ये वैक्सीन अधिकांश अमेरिकी टीकों की तुलना में अधिक महंगा है।

कोविड वैक्सीन के लिए कतार में खड़े लोग। (पीटीआई)।

केरल के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास और टीआईएसएस के प्रोफेसर आर रामकुमार ने सुप्रीम कोर्ट में संयुक्त याचिका दायर कर भारत सरकार के वैक्सीन नीति पर सवाल खड़ा किया है। याचिका में कहा गया है कि भारत में वैक्सीन अमेरिका से भी अधिक महंगी है। साथ ही निजी अस्पतालों को 25 प्रतिशत वैक्सीन देने की योजना पर भी सवाल खड़े किए गए हैं।

याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने 6 जून को जारी आदेश में कोवैक्सिन के लिए 1200 + 60 (जीएसटी) + 150 (सेवा कर) की अधिकतम सीमा तय की गई थी; कोविशील्ड के लिए 600 + 30 (जीएसटी) + 150 (सेवा कर); और स्पुतनिक वी के लिए 948 + 47 (जीएसटी) + 150 (सेवा कर) लिए जाएंगे। इसके तहत दो खुराक लेने वाले व्यक्ति को कोवैक्सिन के लिए 2,820 रुपये, कोविशील्ड का लाभ के लिए 1,560 रुपये और स्पुतनिक के लिए 2,290 रुपये का भुगतान करना पड़ता है।

यह भारत के लोगों के लिए स्पष्ट रूप से नुकसान है और वैक्सीन निर्माताओं के लिए अत्यधिक लाभ। याचिका में दावा किया गया है कि भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा भारत में विकसित और सरकार द्वारा प्रायोजित होने के बाद भी ये वैक्सीन अधिकांश अमेरिकी टीकों की तुलना में अधिक महंगा है।

याचिका में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 38 में राज्य को लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए एक न्यायसंगत सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित करने पर बल देने का प्रयास करना चाहिए। याचिकाकर्ता की तरफ से कहा गया है कि जब तक सरकार टीकों की 100 प्रतिशत खरीद नहीं करती है और इसे उचित नियमों के तहत आवंटित नहीं करती है। तब तक नई नीति अपूर्ण, असमान, अक्षम और अपारदर्शी रहेगी। यह लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा।

इधर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सांसद विनय विश्वास ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया कि घर-घर पहुंचकर (डोर टू डोर) कोविड रोधी टीका लगाने का अभियान आरंभ करने पर विचार किया जाए, ताकि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर तबकों का भी टीकाकरण हो सके।

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