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संसदीय इतिहास में मिसाल बन गया उत्तराखंड विधानसभा का विशेष सत्र

उत्तराखंड की विधानसभा के 16 साल के इतिहास में विधानसभा अध्यक्ष को पहली बार अपना मोबाइल तक विधानसभा के मुख्यद्वार के बाहर रखना पड़ा।
Author देहरादून | May 11, 2016 04:41 am
उत्तराखंड विधानसभा। (PTI Photo)

मंगलवार (10 मई) को उत्तराखंड के लोगों ने सूबे की विधानसभा का जो विशेष सत्र देखा, वैसा उत्तराखंड राज्य के 16 सालों के इतिहास में आज तक किसी ने नहीं देखा। सुप्रीम कोर्ट के विशेष निर्देश पर विधानसभा का विशेष और ऐतिहासिक सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष से लेकर विधानसभा के सचिव तक ने इस विशेष सत्र के दौरान यह खास खयाल रखा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सौ फीसद पालन किया जाए। यह सत्र कई मायनों में अभूतपूर्व था।

राजनीतिक विश्लेषक डॉ अवनीत कुमार घिल्डियाल का कहना है कि आजाद भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा विशेष सत्र देखने को उत्तराखंड विधानसभा में देखने को मिला है। उत्तराखंड विधानसभा का यह विशेष सत्र देश के संसदीय इतिहास में एक नई मिसाल के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा कि ऐसा पहली बार देखने को मिला कि विधानसभा का विशेष सत्र विश्वास मत प्राप्त करने के लिए बुलाया गया और दो घंटे के लिए विश्वास मत हासिल करने के दौरान राष्ट्रपति शासन हटाया गया हो और फिर दो घंटे बाद फिर राष्ट्रपति शासन सूबे में लगा दिया गया हो। यह केवल उत्तराखंड में ही आज देखने को मिला।

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और संगीनों के साये में विधानसभा का यह विशेष सत्र संपन्न हुआ। जिला और पुलिस प्रशासन ने ऐसी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था कर रखी थी कि विधानसभा में परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। विधानसभा के इस विशेष सत्र की सुरक्षा व्यवस्था के लिए आज 15 सौ के करीब पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे। विधानसभा के आसपास के क्षेत्र को 23 सेक्टरों में बांटा गया था। इस पूरी व्यवस्था में जिला प्रशासन ने 23 सेक्टर मजिस्ट्रेट तैनात किए थे। मौके पर तैनात देहरादून जिलाधिकारी और एसएसपी विधानसभा के आसपास की सुरक्षा व्यवस्था पर नजर रखे हुए थे। देहरादून के एसएसपी सदानंद दाते ने बताया कि केंद्रीय सुरक्षा बल की रेपिड एक्शन फोर्स की एक कंपनी, पीएसी की सात कंपनी, 4 एडिशनल एसपी, 11 डीएसपी और 12 सौ से ज्यादा सिविल पुलिस के जवान विधानसभा सत्र के दौरान तैनात किए गए थे। बीती रात से ही जिला और पुलिस प्रशासन ने विधानसभा की सुरक्षा की व्यवस्था अपने हाथों में ले ली थी।

उत्तराखंड की विधानसभा के 16 साल के इतिहास में विधानसभा अध्यक्ष को पहली बार अपना मोबाइल तक विधानसभा के मुख्यद्वार के बाहर रखना पड़ा। और पहली बार विधानसभा के अध्यक्ष विधानसभा के परिसर में अपनी सरकारी कार तक नहीं ले जा सके। पहली बार विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा के मुख्यद्वार से विधानसभा परिसर के भीतर पैदल गए। उत्तराखंड के विधानसभा के इतिहास में पहली बार विधायकों को अपना मोबाइल तक विधानसभा के मुख्यद्वार पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को सौंपना पड़ा। विधानसभा के भीतर विधायकों को मेटल डिटेक्टर से गुजरकर विधानसभा परिसर में प्रवेश करने दिया गया। जहां विधानसभा के बाहर सुरक्षा व्यवस्था के लिए भारी सुरक्षाबल तैनात थे, वहीं विधानसभा के भीतर सुरक्षा व्यवस्था के लिए 23 मार्शल लगाए गए थे। इनके साथ-साथ विधानसभा सत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए विधानसभा के उपसचिव, अनुसचिव, वरिष्ठ शोध अधिकारी और दो रिपोर्टर तैनात किए गए थे।

विधानसभा सत्र की कार्रवाई विधायी और संसदीय कार्य विभाग के प्रमुख सचिव जयदेव सिंह की देखरेख में हुई। सूत्रों के मुताबिक, हरीश रावत के विश्वास मत के प्रस्ताव रखने के बाद विधानसभा के सचिव जगदीश चंद्र ने पहले विश्वास मत के पक्ष वाले एक-एक विधायक का नाम पुकारा और हर एक विधायक ने खड़े होकर हाथ खड़ा करके अपना मत दिया। विश्वास मत के पक्ष के विधायकों के मतदान के बाद विधानसभा सचिव ने विरोध में मत देने वाले विधायकों के नाम पुकारे। इन विधायकों ने भी खड़े होकर और हाथ ऊपर कर अपना मत दिया। विधानसभा सचिव पक्ष और विपक्ष में मत देने वाले विधायकों के नाम के आगे निशान लगाते रहे। विधायकों की इस गिनती पर विधायी और संसदीय कार्य विभाग के प्रमुख सचिव ने अपनी कड़ी नजर बनाए रखी।

सूत्रों के मुताबिक, हरीश रावत के विश्वास मत के पक्ष में पहला वोट बसपा के विधायक सरबत करीम अंसारी ने दिया। रावत के पक्ष के 33वां और आखिरी वोट कांग्रेस के विधायक नवप्रभात ने दिया। इसी तरह विश्वास मत के विपक्ष में पहला वोट भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और आखिरी वोट भाजपा के विधायक पूरण सिंह फर्त्याल ने दिया

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