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अधिवेशन के बहाने उत्तर प्रदेश के मंत्रियों में अपने प्रचार की होड़

अंशुमान शुक्ल लखनऊ। समाजवादी पार्टी की सरकार के मंत्रियों के बीच होर्डिंग लगाने को लेकर गजब की होड़ मची है। जिसको जैसा पद, उसकी उतनी होर्डिंग की कहानी पूरे शहर में चरितार्थ हो रही है। आठ अक्तूबर से लखनऊ में शुरू हो रहे पार्टी के तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए नफासत और नजाकत के […]

Author Published on: October 7, 2014 9:09 AM

अंशुमान शुक्ल

लखनऊ। समाजवादी पार्टी की सरकार के मंत्रियों के बीच होर्डिंग लगाने को लेकर गजब की होड़ मची है। जिसको जैसा पद, उसकी उतनी होर्डिंग की कहानी पूरे शहर में चरितार्थ हो रही है। आठ अक्तूबर से लखनऊ में शुरू हो रहे पार्टी के तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए नफासत और नजाकत के शहर को होर्डिंगों से पाट दिया गया है। अखिलेश मंत्रिमंडल के अधिकांश सदस्यों का पूरा ध्यान काम से ज्यादा अपना चेहरा दिखाकर पार्टी आलाकमान को खुश करने पर केंद्रित है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस वक्त समाजवाद आठ किलोमीटर में फैल चुका है। राष्ट्रीय अधिवेशन स्थल जनेश्वर मिश्र पार्क से लेकर अमौसी हवाईअड्डे तक दोनों तरफ की सड़क होर्डिंग से पटी पड़ी है। इसमें सर्वाधिक होर्डिंग प्रदेश के खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के सौजन्य से लगाई गई हैं। गायत्री प्रसाद का ऐसा करना लाजिमी भी है। सरकार का सबसे मलाईदार विभाग खनन उन्हीं के सुपुर्द है। ऐसे में गायत्री प्रसाद प्रजापति की तरफ से विशालकाय होर्डिंग पर पानी की तरह धन खर्च करना अचरज की बात नहीं। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में सपा को मिलने वाली सीटों को लेकर गायत्री प्रसाद प्रजापति ने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के समक्ष बड़े-बड़े दावे किए थे। लेकिन पार्टी के पांच सीट पर सिमट जाने के बाद उन्हें आलाकमान की फटकार झेलनी पड़ी थी। उत्तर प्रदेश में अवैध खनन तो पुराना दस्तूर है। जाहिर है कि कामकाज में नाकामी को छिपाने के लिए अधिवेशन की शक्ल में हाथ आया मौका किसी भी हाल में मंत्रीजी गंवाना नहीं चाहते।

यही हाल लोकसभा के चुनाव के पूर्व कृषि मंत्री रहे और चुनाव बाद पद से हटाकर विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री बनाए गए मनोज पांडेय का है। वे भी इस मौके को हर हाल में अपने पक्ष में करने की पूरी कसरत में जुटे हैं। जगह-जगह उनकी भी होर्डिंग लगी हैं। खादी और ग्रामोद्योग मंत्री नारद राय भी अधिवेशन में होर्डिंग युद्ध में शामिल हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उनसे भी खेल मंत्री का पद वापस ले लिया गया था। हाल ही में हुए उपचुनाव में उन्हें नोएडा का प्रभारी बनाया गया था लेकिन वहां वे सपा के प्रत्याशी को जिता पाने में नापाक रहे। कैबिनेट मंत्री अरिदमन सिंह, अखिलेश यादव के मित्र अभिषेक मिश्र, राज्यमंत्री राजपाल कश्यप, सुनील यादव समेत दर्जनों ऐसे हैं जो हाथ आए इस मौके को किसी भी हाल में गंवाना नहीं चाहते। इन सभी मंत्रियों को इस बात का भरोसा हो चुका है कि होर्डिंग दिखाकर वे अपने विभागों में उम्मीद के मुताबिक काम न होने की भरपाई बड़े आराम से कर ले जाएंगे। लखनऊ वासियों के लिए ऐसे आयोजन नई बात नहीं हैं। बहुजन समाज पार्टी की सरकार में भी ऐसे आयोजनों के दौरान पूरे शहर को नीले रंग से रंग दिया जाता था। सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में फर्क सिर्फ इतना है कि बैनरों और होर्डिंग के रंग भर बदल गए हैं। बाकी सभी चीजें यथावत हैं।समाजवादी पार्टी अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में किन विषयों पर चिंतन करेगी? इससे अधिक ध्यान कार्यक्रम में शिरकत करने वालों की भोजन सामग्री पर टिका है। तीन दिवसीय अधिवेशन के दौरान देश भर के व्यंजन परोसे जाने की बात कही जा रही है। पहली बार 21वीं शताब्दी के समाजवाद को परिभाषित करने की कवायद है।

बहुजन समाज पार्टी की सरकार के दौरान हुए आयोजनों में स्थल को विदेशी फूलों से सजाने की परंपरा को भूल कर पाटी के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य सपा के इस विशाल शक्ति प्रदर्शन पर चुटकी लेते हैं। वे कहते हैं, राजनीतिक दल के किसी कार्यक्रम में मंत्रियों के पदनाम सहित होर्डिंग लगाकर सपा राजनीति में नई परंपरा का आगाज कर रही है। इससे साफ है कि यह कार्यक्रम किसी राजनीतिक दल का न होकर सरकारी हो चुका है।

यही कहना है कांग्रेस के प्रवक्ता अमरनाथ अग्रवाल का। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पैसा मंत्रियों की जेब से नहीं लग रहा है। उन्होंने होर्डिंग लगाने की जांच कराने की मांग की और कहा कि पूरे कार्यक्रम में सरकारी पैसे का खुलकर इस्तेमाल हो रहा है। इस बात की ताकीद होर्डिंग खुद कर रही हैं।
सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में मोहन सिंह, जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी सरीखे नेताओं की कमी शिद्दत से खलेगी। ये वे नेता थे जो मुलायम सिंह

यादव से तर्क और वितर्क करने की हिम्मत रखते थे। इनकी बात को आदर के साथ सुना और उनपर अमल किया जाता था। देखना दिलचस्प होगा कि इस बार पार्टी किसी मुखर वक्ता को ढूंढकर अधिवेशन में जनता के समक्ष पेश करती है। क्या कोई वक्ता मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, प्रो. रामगोपाल यादव, शिवपाल यादव और आजम खां सरीखे नेताओं के समक्ष अपनी आवाज बुलंद करने का साहस बटोर पाता है या यह बस मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने जाने की औपचारिकता पूरी करने तक ही सीमित रह जाएगा।

 

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