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अमेरिका ने कमजोर की लड़ाई: सुनीता

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों के अगुआ अमेरिका ने पेरिस समझौते से हाथ खींच लिए हैं।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की निदेशक सुनीता नारायण से बातचीत

मृणाल वल्लरी
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों के अगुआ अमेरिका ने पेरिस समझौते से हाथ खींच लिए हैं। डोनाल्ड ट्रंप के इस कदम का जलवायु संकट पर काबू पाने की मुहिम पर क्या असर पड़ेगा? विकास और पर्यावरण की कदमताल एक साथ कैसे हो इन्हीं मुद्दों पर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की निदेशक सुनीता नारायण से बातचीत।

सवाल : भारत जैसे देश की अब क्या भूमिका होनी चाहिए?
’अमेरिका के इस कदम के बाद अगर विकासशील सहित अन्य देश अपने लक्ष्यों में इजाफा भी कर लें तो भी वे अमेरिका की छोड़ी गई खाली जगह की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए चुनौतियों से निपटने के लिए भारत और चीन जैसे देशों का बोझ बढ़ा देना भर काफी नहीं होगा।’

सवाल : पेरिस समझौते से अमेरिका के हटने के असर को कैसे देखती हैं?
’जलवायु संकट के खिलाफ छेड़ी गई जंग पर अमेरिका के राष्ट्रपति के ताजा हमले ने हालात बदल दिए हैं। इसके बाद पेरिस समझौते के लक्ष्य तक पहुंचना एक दुसाध्य काम होगा। ट्रंप ने समझौते के खात्मे का एलान कर दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका न सिर्फ इतिहास के पन्नों पर हरितगृह प्रभाव वाली गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जक रहा है बल्कि वर्तमान में भी इन गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन इसके खाते में ही जाता है। अमेरिका की सक्रिय और महत्त्वाकांक्षी सहभागिता के बिना पेरिस समझौते के तहत जलवायु के लिए जंग मुश्किल होगी। यह लक्ष्य तक पहुंचने में बड़ा फासला पैदा करेगा। पेरिस समझौते से हाथ खींचने का मतलब यह है कि विश्व की पांच फीसद जनसंख्या के साथ अमेरिका दुनिया की 95 फीसद जनसंख्या को जोखिम में डालने का काम जारी रखेगा।
सवाल : अमेरिका ने जिस तरह पर्यावरण के बरक्स कारोबार को चुना क्या वह पर्यावरण के लिए लड़ाई को कमजोर करेगा? अंतत: अमेरिका जो करता है, वह नजीर बन जाता है।
’बिलकुल। आपके पहले सवाल में भी मैंने यही कहा है। यह जलवायु संकट के खिलाफ वैश्विक लड़ाई पर गंभीर परिणाम छोड़ेगा। अपने वर्तमान रूप में पहले ही पेरिस समझौता एक कमजोर समझौता है। अब अमेरिका की निकासी इसके प्रभाव को और भी कम कर देगी।
सवाल : आज जबकि वैश्विक स्तर पर रोजगार के अवसर घट रहे हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है उसमें पर्यावरण को लेकर जागरूकता की लड़ाई कितनी मुश्किल है?
’हर किसी को यह समझना होगा कि पर्यावरण कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आर्थिक संपन्नता से अलग करके देखा जाए। हम जिस संपन्नता और विकास की ओर कदम बढ़ा रहे हैं वह किसी भी तरह से हमारे पर्यावरण से अलगाव नहीं रखता है। खासकर भारत जैसे देश के लिए तो यह बहुत बड़ी सच्चाई है। यहां जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने जीवनयापन के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। अगर हम इन संसाधनों की परवाह नहीं करेंगे, इनका संरक्षण नहीं करेंगे तो हम अपने लाखों लोगों को जीविका मुहैया करवाने की उम्मीद कैसे करेंगे?
सवाल : अगर गैरसरकारी प्रयासों को छोड़ दें तो पर्यावरण जैसे मुद्दे पर सरकारें औपचारिकता ही निबाहती हैं। सरकारों को इस मसले पर चुस्त कैसे किया जा सकता है?
’यह सही है कि पर्यावरण के मुद्दे पर सरकार के कामकाज और इच्छाशक्ति को बढ़ाने की जरूरत है। आमतौर पर जो सरकार सत्ता में होती है उसकी प्राथमिकताएं दूसरी होती हैं। इसके साथ ही पर्यावरण और विकास को एक साथ जोड़ने की समझदारी का भी अभाव दिखता है। इन दोनों को अलग-अलग नजरिये से देखने का उद्ेश्य भी नहीं होना चाहिए। लेकिन अब सरकार उन कानूनों को लागू कर रही है जिसका पर्यावरण पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन का उदाहरण लीजिए। भारत में यह ऐसी पहली योजना है जिसके तहत तय किया गया है कि खनन से हुए लाभ उन लोगों को भी मिलें जो खनन से प्रभावित हुए हैं। मेरा मानना है कि हम पर्यावरण को लेकर जागरूकता लाएं, जनमत का निर्माण करें ताकि सरकारों पर ऐसी योजनाएं लागू करने का दबाव बनता रहे।
सवाल : पर्यावरण अभी तक किताबों और सेमिनारों तक सिमटा हुआ है? यह चुनावी मुद्दा कैसे बनेगा?
’दुनिया के बहुत से ऐसे देश हैं जहां पर्यावरण गंभीर मसला बन चुका है। बहुत से ऐसे देश हैं जहां हरित दल हैं, और कुछ जगहों पर ऐसे दलों की सत्ता में भागीदारी भी हो चुकी है। हालांकि, भारत में अभी ऐसी कोई हरित पार्टी नहीं है, लेकिन पर्यावरण हर चुनावों का हिस्सा होता है। पानी और इससे जुड़े अन्य मुद्दे जो हम उठाते हैं वे पर्यावरण से ही तो जुड़े हैं। भूमि अधिकार और वनसंपदा अधिकार से जुड़े मुद्दे क्या हैं? ये सभी पर्यावरण के मुद्दे हैं।

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