अमेरिका ने भारत समेत 20 देशों को कुछ खास दवाओं और उनमें इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर जीरो टैरिफ की सुविधा देने का ऐलान किया है। इनमें भारत भी शामिल है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका कुछ लाइसेंस प्राप्त दवाओं पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है।
अमेरिकी वाणिज्य विभाग (US Commerce Department) की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक, जीरो टैरिफ की यह सुविधा पूरे फार्मास्युटिकल कारोबार पर लागू नहीं होगी। इसका फायदा कुछ विशेष कैटेगिरी की दवाओं को मिलेगा। इनमें दुर्लभ बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं, न्यूक्लियर मेडिसिन, प्लाज्मा से तैयार उपचार और इनफर्टिलिटी से जुड़ी दवाएं शामिल हैं।
इसके अलावा सेल और जीन थेरेपी, एंटीबॉडी-ड्रग कंजुगेट्स (ADCs) और रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और न्यूक्लियर खतरों से निपटने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं को भी इस छूट में रखा गया है। पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाएं भी इसके दायरे में आती हैं। इन दवाओं में इस्तेमाल होने वाले संबंधित इन्ग्रिडिएंट्स पर भी यही नियम लागू होगा।
100 फीसदी टैरिफ का क्या है मामला?
अमेरिका ने 29 सितंबर से कुछ लाइसेंस प्राप्त फार्मास्युटिकल उत्पादों और उनके इन्ग्रिडिएंट्स पर 100 फीसदी ad valorem tariff लगाने का ऐलान किया था। यह फैसला ट्रेड एक्सपेंशन एक्ट (Trade Expansion Act) के Section 232 के तहत लिया गया है। कुछ कंपनियों पर यह टैरिफ 31 जुलाई से ही लागू हो चुका है जबकि अन्य संबंधित कंपनियों पर इसे 29 सितंबर से लागू किया जाना है।
हालांकि अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने साफ किया है कि फिलहाल Section 232 के तहत लगाया गया यह फार्मा टैरिफ जेनेरिक दवाओं और उनमें इस्तेमाल होने वाले इन्ग्रिडिएंट्स पर लागू नहीं है।
भारत के लिए यह खास तौर पर अहम है क्योंकि अमेरिका को भारत से होने वाले दवा निर्यात में जेनेरिक दवाओं की बड़ी हिस्सेदारी है। Pharmaceuticals Export Promotion Council of India के मुताबिक, भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में 30.46 अरब डॉलर के ड्रग्स और फार्मास्युटिकल उत्पादों का निर्यात किया था। अमेरिका भारत के प्रमुख दवा बाजारों में शामिल है।
भारत समेत 20 देश लिस्ट में शामिल
अमेरिका वाणिज्य विभाग के ब्यूरो ऑफ इंडस्ट्री एंड सिक्यॉरिटी के मुताबिक, कुछ उत्पादों पर जीरो टैरिफ की सुविधा उन देशों से आने पर मिल सकती है जिनके अमेरिका के साथ व्यापार और सुरक्षा समझौते हैं या ऐसे समझौते होने की उम्मीद है। इसके अलावा, अगर विभाग किसी दवा को अमेरिका की तत्काल स्वास्थ्य जरूरत के लइए जरूरी मानता है तो उस पर भी टैरिफ में छूट दी जा सकती है।
भारत के अलावा इस सूची में अर्जेंटीना, बांग्लादेश, कंबोडिया, इक्वाडोर, अल सल्वाडोर, यूरोपीय संघ, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया, जापान, जॉर्डन, मलेशिया, नॉर्थ मैसेडोनिया, दक्षिण कोरिया, स्विट्जरलैंड और लिकटेंस्टीन, ताइवान, थाईलैंड, ब्रिटेन और वियतनाम शामिल हैं।
अमेरिकी कंपनियां उन खास दवाओं पर टैरिफ में छूट मांग सकती हैं जिनकी अमेरिका में तुरंत जरूरत है। इसके लिए दवा की कैटेगिरी, उसमें इस्तेमाल होने वाले इन्ग्रिडिएंट्स, निर्माता, किस देश में बनी है और उसकी मेडिकल जरूरत जैसी जानकारी देनी होगी। वाणिज्य विभाग, USTR और स्वास्थ्य विभाग से सलाह लेकर हर आवेदन पर अलग-अलग फैसला करेगा।
नए नोटिस में अमेरिकी टैरिफ नियमों को लेकर कुछ और बदलाव भी किए गए हैं। इनमें जेनेरिक दवा की परिभाषा को स्पष्ट करना और क्लिनिकल ट्रायल, रिसर्च, डेवलपमेंट या अन्य गैर-वाणिज्यिक इस्तेमाल के लिए आयात किए जाने वाले कुछ उत्पादों पर जीरो टैरिफ की सुविधा देना शामिल है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी ट्रंप की नई टैरिफ शक्ति की चिंता?
आम अमेरिकियों को यह चिंता सता रही है कि अमेरिका में आहूत मध्यावधि चुनाव एक डरावना सच न साबित हो जाए। जो बात परेशान करने वाली है, वह यह कि अमेरिकी महंगाई का असर इस बार कहीं भारत पर न पड़े। यह सच है कि 2008 की अमेरिकी मंदी का असर हमारे देश पर वित्तीय बाजारों, निर्यात और विदेशी निवेश के जरिए पड़ा था। अमेरिका में महंगाई बढ़ने या फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने का सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
