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सिलिकॉन वैली का स्टार बना तमिलनाडु में टीचर, गांव में स्कूल का स्टार्ट-अप डाल बनाया ये प्लान, जानें प्रेरक कहानी

वेंबु का कहना है कि तमिलनाडु में उनके पास एक नया स्टार्टअप शुरू करने की योजना है। यह स्टार्टअप है- ग्रामीण स्कूल, जहां बच्चों को मार्क्स और डिग्री के तरीकों से अलग ही रखा जाएगा।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र चेन्नई | Updated: October 10, 2020 9:26 AM
Sridhar Vembu, Silicon Valleyतमिलना़डु के गांव में स्टार्टअप खोलने की योजना बना रहे श्रीधर वेंबु सिलिकॉन वैली में जोहो कॉरपोरेशन के संस्थापक हैं। (एक्सप्रेस फोटो)

जहां भारत के लाखों लोग पढ़ाई पूरी करने के बाद गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और टेस्ला जैसी कंपनियों में काम करने के सपने के साथ अमेरिका जाना चाहते हैं, वहीं एक कहानी ऐसी भी है, जिसमें सिलिकॉन वैली में अपने दम पर कंपनी खड़ी कर नाम कमा चुके देश के एक बेटे ने भारत लौटकर ही अपना सपना पूरा करने की ठानी है। अमेरिकी कंपनी जोहो कॉरपोरेशन के संस्थापक श्रीधर वेंबु पूरी दुनिया में टेक एक्सपर्ट के तौर पर जाने जाते हैं। हालांकि, इतनी सफलता हासिल करने के बाद वेंबु अब तमिलनाडु के एक छोटे से गांव तेनकासी में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। वेंबु की योजना अब गांव के स्कूलों में पढ़ाई के लिए स्टार्टअप खोलने की है।

बिजनेस मैगजीन फोर्ब्स के मुताबिक, अमेरिका के टेक हब सिलिकॉन वैली के स्टार श्रीधर वेंबु की कंपनी की नेटवर्थ 2.5 अरब डॉलर (करीब 18 हजार करोड़ रुपए) है। पर मौजूदा समय में वेंबु तमिलनाडु में ही छह महीने से बच्चों को होम ट्यूशन दे रहे हैं। इतना ही नहीं वे तमिलनाडु की पारंपरिक वेष्ठी पहनकर साइकिल से ही घूमते हैं। 53 साल के वेंबु ने जब कोचिंग देने का काम शुरू किया था, तब वे अकेले ही तीन बच्चों को पढ़ाते थे, लेकिन अब उनके ग्रुप में चार टीचर हैं और कुल 52 बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। उनके यहां पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे किसान परिवार के हैं।

गैर-पारंपरिक शिक्षा का माध्यम देना लक्ष्य: वेंबु का कहना है कि तमिलनाडु में उनके पास एक नया स्टार्टअप शुरू करने की योजना है। यह स्टार्टअप है- ग्रामीण स्कूल, जहां बच्चों को मुफ्त शिक्षा और खाने की सुविधा मुहैया होगी और इस मॉडल में बच्चों को मार्क्स और डिग्री जैसी पारंपरिक शिक्षा के तरीकों से अलग रखा जाएगा। वेंबु कहते हैं कि उनका स्टार्टअप सीबीएसई या किसी अन्य एजुकेशन बोर्ड से पूरी तरह अलग होगा।

वेंबु के लिए यह प्रोजेक्ट बिल्कुल भी नया नहीं है। दरअसल, एक दशक से जोहो कॉरपोरेशन का हिस्सा रही जोहो यूनिवर्सिटी में उन छात्रों की भी आईटी प्रोफेशनल बनने में मदद की जा रही है, जिन्होंने 10वीं, 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी नहीं की। इन लोगों को ट्रेनिंग के बाद जोहो कॉरपोरेशन में ही टीमों में भी लिया जाता है।

गांव में गरीबी, पारंपरिक एजुकेशन सिस्टम तेज बच्चों के लिए समस्या:  हालांकि, अमेरिका में एक बड़ी कंपनी खड़ी कर चुके वेंबु के लिए भारत में चुनौतियां बड़ी हैं। खुद उनका कहना है कि गांव में टीचर नहीं रहते। वे 30-40 किमी दूर के एक कस्बे से आते-जाते हैं। वेंबु के मुताबिक, गांव में भी कुछ परिवार अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में भेजते हैं। ऐसे में ज्यादातर गरीब परिवारों के बच्चे ही सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए मजबूर होते हैं। गांव में शराब पीने की समस्या भी काफी ज्यादा है, क्योंकि अगर किसी परिवार में पिता ज्यादा शराब पीते हैं, तो वो कोई पैसा घर नहीं लाते और बच्चे भूखे ही रह जाते हैं।

वेंबु के मुताबिक, भारत के एजुकेशन सिस्टम में ज्यादातर समस्याएं ‘क्रेडेंशियलिज्म’ यानी मार्क्स और डिग्री जैसी पारंपरिक प्रतियोगिताओं की वजह से है, क्योंकि इसकी वजह से तेज बच्चे भी सिर्फ ग्रेड्स पर ही केंद्रित रह जाते हैं, वे खुद को मिले ज्ञान पर ध्यान नहीं देते। लेकिन हमारे बीच कुछ गैर-पारंपरिक तरीके से सीखने वाले बच्चे भी होते हैं, जो तेज होते हैं, लेकिन उनका एग्जाम रिजल्ट इसे नहीं दिखाता। इसलिए सिस्टम को गैर-पारंपरिक तरह से सीखने वालों को भी शामिल करना चाहिए, जो एग्जाम में तो फेल हो जाते हैं, पर दूसरे काम बेहतर ढंग से करते हैं।

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