जो अलीगढ़ लॉक के लिए विश्व में मशहूर, वहां के मुस्लिम ताले वाले से था नरेंद्र मोदी के पिता का याराना, PM ने सुनाया 60 साल पुराना किस्सा

बकौल पीएम, “मुझे आज बचपन की बात करने का मन कर रहा है। करीब 55-60 साल पुरानी बात है। हम बच्चे थे। अलीगढ़ से ताले के सेल्समैन होते थे…एक मुस्लिम मेहरबान थे, वह हर तीन महीने हमारे गांव आते थे। मुझे अभी भी याद है कि वह काली जैकेट पहनते थे।”

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AMU का नाम बदलकर राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर रखने की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पुरानी मांग के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर एएमयू के बगल में बनने वाले एक नए विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी। (फोटोः @BJP4UP-टि्वटर/unsplash)

उत्तर प्रदेश का अलीगढ़ दो चीजों के मशहूर है। पहला- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एमएमयू), जबकि दूसरा- ताला। विश्व भर में वहां के ताला उद्योग का नाम है। मंगलवार (14 सितंबर, 2021) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब शहर में थे, तो वह भी यहां के लॉक और ताले बेचने वाले सेल्समैनों के बारे में बात करने से खुद को रोक न पाए। उन्होंने बताया कि अलीगढ़ के एक ताले बेचने वाले व्यक्ति से उनके पिता की कभी अच्छी दोस्ती हुआ करती थी। याराना इतना गहरा था कि वह मोदी के पिता के पास अपने पैसे तक सुरक्षित रखवा जाया करते थे।

दरअसल, पीएम अलीगढ़ में मंगलवार को राजा महेन्द्र प्रताप सिंह विश्वविद्यालय की आधारशिला रखने आए थे। उन्होंने इस दौरान कहा, “लोग अभी तक अपने घर और दुकान की सुरक्षा के लिए अलीगढ़ के भरोसे रहते थे। पता है न, क्योंकि यहां का ताला अगर लगा होता था, तब लोग निश्चिंत हो जाते थे।”

बकौल पीएम, “मुझे आज बचपन की बात करने का मन कर रहा है। करीब 55-60 साल पुरानी बात है। हम बच्चे थे। अलीगढ़ से ताले के सेल्समैन होते थे…एक मुस्लिम मेहरबान थे, वह हर तीन महीने हमारे गांव आते थे। मुझे अभी भी याद है कि वह काली जैकेट पहनते थे। सेल्समैन के नाते वह अपने ताले दुकानों में रख जाते थे और तीन महीने बाद आकर पैसे ले जाते थे। गांव के अगल-बगल के व्यापारियों के पास भी जाते थे और ताले देते थे।”

मोदी के मुताबिक, “मेरे पिता जी से उनकी बड़ी अच्छी दोस्ती थी। वह आते थे, तो चार-छह दिन हमारे गांव में रुकते थे। दिन भर में जो पैसे वह लेकर आते थे, तो मेरे पिता जी के पास पैसे छोड़ देते थे। पिता उनके पैसे संभालते थे और जाते वक्त वह पिता जी से पैसे लेकर ट्रेन से निकल जाया करते थे।”

उन्होंने आगे बताया, “हम बचपन में यूपी के दो शहरों से बड़ा परिचित रहे। एक सीतापुर, दूसरा अलगीढ़। हमारे गांव में अगर किसी को आंख की बीमारी का इलाज कराना होता था, तब कहा जाता था कि सीतापुर जाओ। हम ज्यादा समझते तो नहीं थे, पर यही नाम सुनते थे। दूसरा इस महाशय (पिता के ताले वाले दोस्त) के कारण अलीगढ़ बार-बार सुनते थे।”

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