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व्यक्तित्व: स्नेहा: सैनिटरी नैपकिन बनाने से ऑस्कर तक का सफर

वृतचित्र में मुख्य भूमिका निभाने वाली स्नेहा इन महिलाओं में शामिल है। 23 साल की स्नेहा पुलिस में भर्ती होना चाहती हैं। वह बताती है, ‘जब मैंने यहां काम करना शुरू किया, तो मैंने पिता को बताया कि यह एक डाइपर फैक्ट्री है। मुझे शर्म महसूस होती थी।

Author February 12, 2019 6:19 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: Instagram/periodendofsentence)

उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के काथीखेड़ा गांव की महिलाओं के अनुभवों को लेकर बनी है वृतचित्र- ‘पीरियड, एंड द सेंटेंस।’ यह वृतचित्र हाल ही में ऑस्कर की शॉर्ट सब्जेक्ट कैटिगरी में नामांकित हुई है। काथीखेड़ा गांव में कुछ महिलाओं का यह समूह सामाजिक उद्यमी और पैडमैन के नाम से मशहूर अरुणाचलम मुरुगंथम द्वारा बनाई गई लो-कॉस्ट मशीन से सैनिटरी नैपकिन बनाती हैं। महिलाओं की एक सात सदस्यीय टीम रोजाना 600 पैड बनाने का लक्ष्य पूरा करने के लिए जी-जान से जुटी रहती है। भैंसों के बाड़े के बगल में स्थित दो कमरे की फैक्ट्री में लकड़ी की लुगदी से वे इको-फ्रेंडली सैनिटरी नैपकिन बनाती हैं। ये पैड फ्लाइ ब्रांड के तहत बेचे जाते हैं। इसमें छह नैपकिन का पैकेट है, जिसकी कीमत 30 रुपए है।

वृतचित्र में मुख्य भूमिका निभाने वाली स्नेहा इन महिलाओं में शामिल है। 23 साल की स्नेहा पुलिस में भर्ती होना चाहती हैं। वह बताती है, ‘जब मैंने यहां काम करना शुरू किया, तो मैंने पिता को बताया कि यह एक डाइपर फैक्ट्री है। मुझे शर्म महसूस होती थी। लोग क्या सोचेंगे कि लड़की माहवारी जैसे विषय पर बात क्यों कर रही है? लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि अगर मुझे झिझक महसूस होगी तो मैं अपना काम कैसे करूंगी।’ इसके बाद साहस जुटाते हुए स्नेहा ने अपनी महिला रिश्तेदारों और दोस्तों को इस बारे में बताना शुरू किया और उन्हें सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करने के लिए जागरूक किया। स्नेहा अपनी कमाई से प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग की फीस भरती हैं।

स्नेहा और उनकी साथियों के बारे में अमेरिका के लॉस एंजिलिस के एक स्कूल की 10 बच्चियों और उनकी अंग्रेजी की शिक्षक ने पहल की। जब इन लोगों को जब पता चला कि हापुड़ में कई लड़कियां मासिक धर्म की वजह से स्कूल छोड़ देती हैं तो उन्होंने पैड मेकिंग मशीन के लिए धन दिया। स्नेहा बताती हैं, ‘महिलाएं दुकानों से पैड खरीदने में झिझक महसूस करती हैं। इसलिए उनके दरवाजे पर ही पैड की सुविधा मिलने से उन्हें आसानी रहती है।’ उनके मुताबिक, आॅस्कर के लिए चुनी गई फिल्म के लिए 2017 में काथीखेड़ा गांव में शूटिंग हुई थी। अब स्नेहा लॉस एंजिलिस में ऑस्कर समारोह के लिए तैयारी कर रही हैं।

स्नेहा कहती हैं कि मैंने सिर्फ ऑस्कर के बारे में सुना था। पता चला कि इस फिल्म के लिए मुझे अमेरिका जाना होगा, तो मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। मेरे साथ सबला समिति की संचालिका सुमन को भी अमेरिका आॅस्कर के कार्यक्रम में बुलाया गया है। सेनेटरी पैड बनाने में साथ काम करने वाली स्नेह की सहेली राखी का सपना है कि वह आगे चलकर टीचर बने। उसका कहना है कि हम सभी समझ रहे थे कि यह फिल्म महिलाओं को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने के लिए बन रही है।

अब जब यह फिल्म ऑस्कर के लिए गई है तो इस फिल्म में दिखाई गईं सभी सातों लड़कियां और गांव के सभी लोग खुश हैं। स्नेह ने फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है, इसलिए उसे अमेरिका बुलाया गया है। यह हम सभी के लिए गर्व के बात है कि आज से पहले इस गांव से कोई अमेरिका नहीं गया था। साथ में काम करने वाली अर्शी बताती हैं कि दीदी को आॅस्कर के लिए बुलाया गया है। इसको लेकर पूरे गांव में चर्चा हो रही है।

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