4 कारण: पूर्वांचल पर क्यों फोकस कर रही है BJP, एक दिन में ही वाराणसी से लेकर सिद्धार्थनगर तक के दौरे के सियासी मायने

बता दें कि किसान आंदोलन और लखीमपुर खीरी कांड भारतीय जनता पार्टी के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में संभव है कि आगामी विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी और तराई बेल्ट में पार्टी को नुकसान झेलना पड़ सकता है।

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2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा को पूर्वांचल की कुल 164 विधानसभा सीटों में से 115 सीटें मिली थी(फोटो सोर्स: फाइल/PTI)।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति के हिसाब से सक्रियता बढ़ा दी है। आलम यह है कि एक हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार उत्तर प्रदेश के दौरे पर पहुंच चुके हैं। 20 अक्टूबर को जहां पीएम मोदी ने कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का उद्घाटन किया था तो वहीं 25 अक्टूबर को सिद्धार्थनगर में 9 मेडिकल कॉलेजों का उद्घाटन किया।

ये कॉलेज पूर्वांचल के जिले सिद्धार्थनगर, एटा, हरदोई, देवरिया, गाजीपुर, प्रतापगढ़, फतेहपुर, मिर्जापुर और जौनपुर जिलों में निर्मित हैं। इन 9 मेडिकल कॉलेजों की लागत 2,329 करोड़ रुपये है। वहीं सोमवार को ही सिद्धार्थनगर के बाद पीएम मोदी वाराणसी पहुंचे और वहां प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना की शुरुआत की।

बता दें कि इस योजना के अंतर्गत अगले 5 सालों में 64000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। जिसके तहत जिला स्तर पर ICU, वेंटिलेटर आदि की सुविधा होगी। इसके अलावा 37 हजार बेड्स विकसित किए जाएंगे। अब ऐसे में चर्चा का विषय यह भी है कि आखिर भाजपा ने पूर्वांचल में विकास कार्यों पर इतना जोर क्यों दिया है? आखिर इसके सियासी मायने क्या है? आइए जानते हैं…

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बढ़ रही है नाराजगी: दरअसल आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर यूपी का पूर्वांचल भाजपा के लिए काफी अहम है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन का असर अधिक देखा जा रहा है। वहीं लखीमपुर खीरी कांड भी भाजपा के लिए सिरदर्द बना हुआ है। ऐसे में इसका नुकसान पश्चिमी यूपी और तराई बेल्ट में देखने को मिल सकता है।

हालांकि पूर्वांचल जिलों में अब भी भाजपा काफी मजबूत नजर आ रही है। इसलिए भाजपा का पूरा फोकस पूर्वांचल के जिलों पर है। मिशन-2022 के लिए माना जा रहा है कि भाजपा पश्चिमी यूपी में होने वाले नुकसान की भरपाई पूर्वांचल में मजबूत होकर करना चाहती है।

पीएम मोदी के लिए पूर्वांचल गुड लक: ऐसा माना जाता है कि वाराणसी से दूसरी बार लोकसभा पहुंचे नरेंद्र मोदी के लिए पूर्वांचल गुडलक जैसा है। यहां से उन्होंने 2014, 2019 लोकसभा चुनाव और 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव का आगाज किया था। नतीजों में भाजपा को बंपर सीटें भी मिली थी। ऐसे में भाजपा की सोच है कि पूर्वांचल में पार्टी की पकड़ ढीली ना हो और पूर्वांचल के गुडलक को फिर से यूपी चुनाव में भुनाया जाये।

वहीं पूर्वांचल में भाजपा द्वारा किए गए विकास कार्यों में गोरखपुर में एम्‍स और फर्टिलाइजर, गन्‍ना किसानों का भुगतान, किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणा, सड़कों-फ्लाईओवरों का निर्माण जैसी कई उपलब्धियां शामिल हैं।

भाजपा को पूर्वांचल से मिलीं 33 प्रतिशत सीटें: पूर्वांचल में भाजपा की मजबूत पकड़ का अंदाजा आप इसी बात से लगा लीजिए कि 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल की कुल 164 विधानसभा सीटों में से बीजेपी को 115 सीटें मिली थीं। वहीं सपा को 17, बसपा 14, कांग्रेस को 2 और अन्य को 16 सीटें हासिल हुई थीं।

हालांकि, एक आंकड़ा यह भी है कि पिछले तीन दशक में पूर्वांचल का मतदाता किसी एक पार्टी के साथ हमेशा नहीं रहा। इसी को देखते हुए भाजपा की तरफ से इन क्षेत्रों में विकास योजनाओं की झड़ी लगा दी गई है। साथ ही पार्टी 2022 के चुनाव में पूर्वांचल को अपने पक्ष में मजबूत करने में जुट गई है।

बीजेपी का जातीय आधारित पार्टियों से गठबंधन: पूर्वांचल में विकास कार्यों से जुड़ी परियोजनाओं के अलावा भाजपा जातीय समीकरण पर भी ध्यान दे रही है। इसको लेकर पार्टी ने कई जातीय आधरित पार्टियों के साथ भी गठजोड़ कर रखा है। इनमें अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ बीजेपी मैदान में उतरेगी।

बता दें कि अपना दल के सहारे बीजेपी कुर्मी समुदाय तो वहीं संजय निषाद के सहारे मल्लाह समुदाय के वोटरों को अपने पक्ष में करने की मंशा है। इन दोनों नेताओं का वोट आधार पूर्वांचल के कई जिलों में माना जाता है। वहीं 2017 में बीजेपी के साथ रहे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर पर भी पार्टी अपनी नजर बनाए हुए हैं।

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