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खुद गोरखपुर से विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं योगी आदित्य नाथ, पर चार मंत्री “पिछले दरवाजे” से सदन में चाह रहे एंट्री!

रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी नेतृत्व चाहता है कि योगी आदित्य नाथ विधानसभा में एंट्री ले ताकि जनता में यह संदेश जाए कि यूपी के नए सीएम योगी एक "जन नेता" हैं।

Author Updated: May 8, 2017 12:22 PM
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। (Photo: PTI)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को सत्ता संभाले 50 दिन पूरे चुके हैं। योगी को सीएम बने रहने के लिए किसी एक सदन (विधानसभा या विधानपरिषद) का सदस्य होना अनिवार्य है। कहा जा रहा है कि आदित्य नाथ गोरखपुर की किसी विधानसभा सीट से उप-चुनाव लड़े सकते हैं। एशियन एज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि योगी आदित्य नाथ गोरखपुर ग्रामीण या गोरखपुर शहर की किसी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। वहीं, उनकी सरकार में डिप्टी मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य उप-चुनाव लड़ने की मूड में नहीं हैं। यूपी सरकार में सीएम और दोनों डिप्टी सीएम को पद पर बने रहने के लिए राज्य विधायिका के सदस्य के तौर पर शपथ लेनी होगी। वर्तमान में योगी आदित्य नाथ गोरखपुर से बीजेपी के सांसद है।

रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी नेतृत्व चाहता है कि योगी आदित्य नाथ विधानसभा में एंट्री ले ताकि जनता में यह संदेश जाए कि यूपी के नए सीएम योगी एक “जन नेता” हैं। मुख्यमंत्री के अलावा दो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य तथा दिनेश शर्मा और दो अन्य मंत्रियों स्वतंत्र देव सिंह और मोहसिन रजा के लिए भी पद पर बने रहने के लिए किसी सदन के सदस्य के रूप में शपथ लेना जरुरी है। स्वतंत्र देव सिंह योगी सरकार में परिवहन मंत्री और मोहसिन रजा अल्पसंख्यक मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक दोनों मंत्रियों और एक उप-मुख्यमंत्री को विधान परिषद में प्रवेश के लिए कहा जा सकता है। वर्तमान में केशव प्रसाद मौर्य इलाहाबाद की फूलपुर सीट से बीजेपी के सांसद हैं तो दिनेश शर्मा लखनऊ के मेयर है। वहीं, स्वतंत्र देव सिंह उत्तर प्रदेश बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं।

मार्च 2017 में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी की रिकॉर्ड जीत के बाद योगी आदित्य नाथ को राज्य का नया मुख्यमंत्री बनाया गया था। बीजेपी ने कुल 312 सीटें चुनाव में जीती थी। वहीं, सपा-कांग्रेस गठबंधन और बहुजन समाज पार्टी को चुनाव में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था। इससे पहले 2002 में मुख्यमंत्री बनी बीएसपी सुप्रीमो मायावती और 2007 में सीएम की कुर्सी संभालने वाले अखिलेश यादव ने सीएम बने रहने के लिए विधान परिषद सदस्य के रूप में शपथ ली थी।

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