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महाराष्ट्र: ‘कमल’ निशान पर चुनाव नहीं लड़ेंगे केंद्रीय मंत्री के लोग, बीजेपी-शिवसेना ने सहयोगियों को दिए 18 सीट

केंद्रीय मंत्री ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा, 'महाराष्ट्र चुनाव में हम अपनी पार्टी के निशान पर चुनाव लड़ेंगे। हम भाजपा के कमल चुनाव चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ना चाहते।'

Ramdas Athawaleकेंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) चीफ रामदास अठावले। (एएनआई फोटो)

केंद्रीय मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) चीफ रामदास अठावले ने गुरुवार (5 सितंबर, 2019) को कहा कि महाराष्ट्र चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने सहयोगी पार्टियों को 18 सीटें देने का फैसला लिया है। उन्होंने कहा कि आरपीआई ने 18 में से 10 सीटें उन्हें देने के लिए कहा है। केंद्रीय मंत्री ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा, ‘महाराष्ट्र चुनाव में हम अपनी पार्टी के निशान पर चुनाव लड़ेंगे। हम भाजपा के कमल चुनाव चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ना चाहते।’

अठावले ने मंगलवार को भी एक बयान में कहा कि इस साल महाराष्ट्र के चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन से उन्हें 8-10 सीटें मिल सकती हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘महाराष्ट्र में 288 विधानसभा सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में शिवसेना और भाजपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इस दौरान आरपीआई ने भाजपा का साथ दिया। हालांकि अब लोकसभा चुनाव में दोनों के साथ आने के बाद यह तय किया गया है कि भाजपा 135 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। शिवसेना भी 135 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। बची हुई 18 सीटें आरपीआई और ऐसी ही दूसरी पार्टियों के लिए छोड़ी जाएंगी।’

उन्होंने आगे कहा कि आरपीआई चुनाव में दस सीटें जीत सकती है चूंकि वह छोटी पार्टियों में सबसे मजबूत पार्टियों में से एक हैं। पूरे गठबंधन पर उन्होंने कहा कि चुनाव में 235-240 सीटों पर भाजपा-शिवसेना नीत गठबंधन जीतेगा।

बता दें कि लोकसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने महाराष्ट्र की कुल 48 सीटों में से 41 सीटों पर जीत हासिल की थी। अठावले के मुताबिक एनसीपी और कांग्रेस के कई नेता अपने नेतृत्व से नाराज थे। उन्होंने कहा कि लोकसबा चुनाव के बाद कई नेता भाजपा और शिवसेना या अन्य पार्टियों में शामिल होने के इच्छुक थे। उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद महाराष्ट्र में गठबंधन और मजबूत होगा।

अठावले ने कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा के एक बार सत्ता में लौटने पर बधाई देते हुए कहा कि प्रदेश में कांग्रेस से हाथ मिलाने का जेडीएस प्रमुख कुमारस्वामी का निर्णय गलत था। इससे राज्य के लोगों का नुकसान हुआ। प्रदेश में 14 महीने तक अस्थिर सरकार चली। उन्होंने कहा कि कुमारस्वामी को भाजपा से हाथ मिलाना चाहिए था मगर उन्होंने सीएम पद के लिए कांग्रेस से हाथ मिला लिया। इसका परिणाम कर्नाटक के लोगों के नुकसान के रूप में उभर कर सामने आया।

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