दिल्ली की एक अदालत ने घरेलू हिंसा के एक मामले में एक व्यक्ति को अपने बेटे को 6,000 रुपए मासिक भरण-पोषण देने का निर्देश देते हुए कहा है कि कोई पति बेरोजगार होने का दावा करके अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के प्रति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थीं, जिसने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण (पीडब्ल्यूडीवी) अधिनियम के तहत उसे आर्थिक राहत देने से इनकार कर दिया गया था।

हर महीने मेंटेनेस देने का निर्देश

अदालत ने दो जून के अपने आदेश में कहा कि अपने खर्चों का प्रबंधन करना प्रतिवादी/पति का दायित्व है और केवल बेरोजगार होने या अन्य जिम्मेदारियों का बहाना बना कर वह अपनी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी और नाबालिग बेटे के भरण-पोषण से मुक्त नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि पति भरण-पोषण का भुगतान करने में सक्षम है और उसे बच्चे के बालिग होने तक उसके भरण-पोषण के लिए प्रति माह 6,000 रुपए का भुगतान करने का निर्देश दिया।

महिला ने आरोप लगाया था कि फरवरी 2013 में उसकी शादी हुई थी और उसके बाद उसके पति और उसके परिवार के सदस्यों ने दहेज के लिए उसका उत्पीड़न किया। महिला ने दावा किया कि गर्भावस्था के दौरान उसे ससुराल से निकाल दिया गया था और वह 2015 से अपने बेटे के साथ अलग रह रही है।

अदालती अभिलेखों के अनुसार, वर्ष 2015 में परिवार अदालत के समक्ष हुए एक समझौते के बाद दंपति कुछ समय के लिए फिर से साथ रहने लगा था। वे कुछ महीनों तक किराए के मकान में रहे, लेकिन बाद में दोबारा अलग हो गए। सितंबर 2025 में निचली अदालत ने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत महिला की शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि वह घरेलू हिंसा और आर्थिक शोषण के आरोपों को साबित करने में असफल रही।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कुछ दिन पहले मेंटेनेस से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महिला को दिए जाने वाले मासिक भरण-पोषण (मेंटेनेंस) की रकम 1000 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये करने के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में किसी महिला के लिए मात्र 1000 रुपये प्रति माह में अपना गुजारा करना असंभव है। पूरी खबर पढ़ें…