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लंगर परंपरा: यह 20 रुपए कभी भी खत्म नहीं होंगे

लंगर में किसी भी दिशा से आने वाले किसी भी व्यक्ति का धर्म, जात पात, नस्ल, कौम, रंग, गरीबी-अमीरी या उसकी सामाजिक हैसियत को नहीं देखा जाता और ना ही पूछा जाता है। सभी को बेहद श्रद्धा से बिल्कुल मुफ्त शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। सभी लोग संगत और पंगत के सिद्धांत पर चलते हुए एक ही कतार में बैठ कर बिना किसी ऊंच नीच के भोजन छकते हैं।

लंगर परंपरा में भोजन करते श्रद्धालु।

गुर कृपाल सिंह अश्क
यह सिर्फ 20 रुपए का कमाल है जिन से ‘सच्चा सौदा’ करने वाले उस गुरु के अनुयाई दुनिया में जहां भी हों वहां के जरूरतमंद लोग इस बात से निश्ंिचत हो सकते हैं कि उन्हें रात को भूखा नहीं सोना पड़ेगा। यह 20 रुपए 1481 के आस पास गुरु नानक देव जी को उन के पिताजी मेहता कालू ने व्यापार करने के लिए दिए थे। पिताजी ने जो धनराशि व्यापार के लिए दी थी, उस से गुरुजी भूखे साधुओं के लिए भोजन की व्यवस्था कर आए। उन के लिए यही सच्चा सौदा था। जहां भूखे साधुओं को भोजन करवाया था, आज उस जगह पर पाकिस्तान में गुरुद्वारा सच्चा सौदा सुशोभित है।

गुरुजी द्वारा दिखाए गए इस मार्ग पर चलते हुए इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सब से बड़ा सहयोग माता खीवी जी का रहा जो दूसरे गुरुजी, गुरु अंगद देव जी की पत्नी थीं। उन्होंने खडूर साहिब में, उन के यहां आने वाले हर व्यक्ति को भोजन तैयार करके उपलब्ध करवाना शुरू किया। ऐसा करते हुए यह नहीं पूछा जाता था कि वह कौन है। उन की रसोई को माता खीवी जी लंगर कहा जाता था, जो उन्हीं के नाम से आज भी चल रहा है।

उन के बाद तीसरे गुरु, गुरु अमर दास जी ने लंगर को संस्थागत रूप दिया। लंगर में किसी भी दिशा से आने वाले किसी भी व्यक्ति का धर्म, जात पात, नस्ल, कौम, रंग, गरीबी-अमीरी या उसकी सामाजिक हैसियत को नहीं देखा जाता और ना ही पूछा जाता है। सभी को बेहद श्रद्धा से बिल्कुल मुफ्त शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा जाता है। सभी लोग संगत और पंगत के सिद्धांत पर चलते हुए एक ही कतार में बैठ कर बिना किसी ऊंच नीच के भोजन छकते हैं।

एक बार जब बादशाह अकबर गुरु जी से मिलने आए तो उन्हें कहा गया कि वे पहले लंगर में बैठ कर खाना खाएं। वे इस परंपरा से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने बहुत जमीन भेंट में देनी चाही। कहा जाता है कि उसी जमीन पर आज का अमृतसर बसा हुआ है। यह लंगर की परंपरा ही है जिस में बर्तन साफ करने वाला भी अपने आप को सौभाग्यशाली समझता है। यह वही गुरु नानक देव जी के 20 रुपए हैं जो कभी भी सिखों से खतम नहीं होंगे।

इस करोना संकट के दौर में एक और जब लोग घरों में दुबक रहे थे तो ऐसे भी जीवट लोग दुनिया में देखने को मिले जो अपने घरों से निकल कर खाने के साथ उन लोगों तक पहुंच रहे थे जिनके पास खाने को कुछ भी नहीं था। यह गुरु के सिख अपना खाना भूलकर उन लोगों की चिंता में लगे हुए थे, जिनसे उन का कोई रिश्ता भी नहीं था। हां, मानवता का रिश्ता जरूर था।

कहानी केवल भारत की नहीं बल्कि अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और अन्य ऐसे देशों की भी है, जहां आप ऐसे लोगों के मौजूद होने के बारे में भी नहीं सोच सकते। अगर वहां इन का एक भी घर होगा, तो वहां आस पास जरूरतमंद के समय किसी को भोजन का संकट नहीं होगा। यह वे लोग हैं जिनकी जड़ें इस अपने ही देश भारत में हैं।

पहले जहां भी केसरी निशान साहिब झूलता दिखाई देता था तो हर जरूरतमंद निश्चिंत हो जाता था कि यहां गुरुद्वारा में खाना तो अब जरूर मिल ही जाएगा। मगर जब कभी कुदरती या गैर कुदरती संकट आया तो यह खाना जिसे सम्मान से ‘गुरु का लंगर’ कहा जाता है, गुरुद्वारों की दीवारों से निकल कर जरूरतमंदों तक पहुंचा। इसे पहुंचने वालों ने अपनी जान तक की भी परवाह नहीं की। इस बात का जिंदा सबूत ईरान-सीरिया सीमा पर पेश हार्बर इलाके में देखा जा सकता है जहां आइएस का आतंक है और वहां के लोगों की जरूरत के मुताबिक खालसा ऐड नामी संस्था के एक प्रोजेक्ट लंगर ऐड के तहत हजारों लोगों के लिए स्थायी तौर पर बेकरी लगाई गई है। अब दूसरे देशों से लोग भी मदद के लिए उन से हाथ मिलाने आगे आए हैं।

वहां सेवादारों में 70 फीसद पंजाबी मूल के हैं। बाकी लोग दूसरे देशों से भी आने लगे हैं। अभी पिछले महीने ही कैलीफोर्निया के गुरुद्वारा डाउन टाउन, रिवरसाइड की सेवा देख कर वहां की पुलिस ने अपनी गाड़ियों की लंबी लाइन लगा कर हूटर बजाते हुए गुरुद्वारा की परिक्रमा की और अपनी ओर से सम्मान दिया। उससे अगले दिन नई दिल्ली में भी दिल्ली पुलिस ने उसी प्रकार गुरुद्वारा बंगला साहिब की परिक्रमा करते हुए गुरु के लंगर की सेवा के लिए अपना सम्मान भेंट किया।

इसी दौर में लंदन के अस्पतालों में वहां के स्टाफ को गुरु का लंगर उपलब्ध करवाया जाता है हालांकि उनको उनकी इच्छा के मुताबिक ही भोजन दिया जाता है पर यह गुरु के लंगर की परंपरा के मुताबिक शाकाहारी होता है। पाकिस्तान में फैसलाबाद में सिख गुरमीत सिंह का परिवार हर रोज 200 लोगों के लिए भोजन उपलब्ध करवा रहा है।

अगर भारत में ही देखें तो पंजाब से लेकर असम तक गुरु के लंगर चलते दिखाई देते हैं। दिल्ली के अंदर मुख्य मार्गों पर पैदल जा रहे प्रवासी मजदूरों के लिए लंगर की व्यवस्था गाड़ियों के जरिए की जाती है। उद्देश्य सिर्फ एक ही है कि कोई भूखा ना रहे, कोई भूखा न सोए। जब से पूर्णबंदी हुई है तो महाराष्ट्र के 81 साल के करनैल सिंह खैरा बाबा जी राष्ट्रीय राजमार्ग 47 पर कनरजी के पास गुरुद्वारा भागोडा साहिब में 20 लाख लोगों को भोजन करवा चुके हैं।

यहां साढ़े चार सौ किलोमीटर क्षेत्र में राहगीरों को कोई पानी पिलाने वाला भी नहीं है। बहुत कहानियां हैं बताने को। ये कहानियां भी खत्म नहीं होंगी पर इन कहानियोंं को बयां करने के लिए ‘गुरु के लंगर’ नहीं चलते। गुरु के लंगर तो श्रद्धा भाव से जरूरतमंद लोगों की सेवा के लिए चलते हैं।

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