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उज्ज्वला योजना? हमने तो नहीं सुनी, बंगाल के इस गांव में किसी ने नहीं किए प्रत्याशी के दर्शन, कल होगी वोटिंग

पश्चिम बंगाल के झारग्राम शहर से सिर्फ छह किलोमीटर दूर बसे सत्यादिही गांव की निवासी नमिता मिद्दया कहती हैं, "चुनाव आते हैं जाते हैं, लेकिन हमारे लिए कुछ भी नहीं बदलता है।"

bengalझारग्राम के पास बसे गाँव के निवासी विश्वनाथ मिद्दया ने बाँस की बनी टोकरी दिखाई। (एक्सप्रेस फोटो: शांतनु चौधरी)।

पश्चिम बंगाल के झारग्राम शहर से सिर्फ छह किलोमीटर दूर बसे सत्यादिही गांव की निवासी नमिता मिद्दया कहती हैं, “चुनाव आते हैं जाते हैं, लेकिन हमारे लिए कुछ भी नहीं बदलता है।” ये गांव झारग्राम से बहुत दूर नहीं है, लेकिन जब विकास की बात आती है, तो ऐसा लगता है जैसे ये गांव समय से कितना पिछड़ गया है। हैरानी की बात ये कि इस गांव के लोगों को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी ही नहीं है।

अपने सिर पर लकड़ी का एक गट्ठा ले जाते हुई, 60 वर्षीया बुलु मिद्दया ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए कहा कि वह खाना बनाने के लिए लकड़ी का इस्तेमाल करती हैं। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का विकल्प क्यों नहीं चुना, जो गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देती है, तो महिला ने कहा, ‘उज्ज्वला योजना क्या है? हमने ऐसी किसी योजना के बारे में कभी नहीं सुना है।’

जब केंद्र की उज्ज्वला योजना या राज्य सरकार की कृषक बंधु योजना के बारे में बताया गया, तो वे यह जानकर हैरान रह गए कि उनके लिए बहुत सारी सामाजिक कल्याण योजनाएँ हैं।

गांव के एक छोटे किसान, विश्वनाथ मिद्दया ने कहा, “स्थानीय पंचायत के सदस्य शायद ही हमारे गांव का दौरा करते हैं। वे कभी कोई जानकारी साझा नहीं करते हैं। हमें कैसे पता चलेगा कि ऐसी योजनाएं हैं जो हमारे लिए हैं? नेताओं या उम्मीदवारों के बारे में भूल जाओ, केवल राजनीतिक दलों के कुछ कार्यकर्ता यहां झंडे लगाने के लिए आते हैं। वे हमें बताते हैं कि किस पार्टी को वोट देना है। ”

उन्होंने भी ममता बनर्जी की ‘कृषक बंधु’ या पीएम किसान सम्मान निधि योजना के बारे में कभी नहीं सुना था। राज्य सरकार ने पीएम किसान सम्मान निधि योजनाओं को लागू नहीं किया है, लेकिन चुनावों से पहले उन्होंने इच्छुक किसानों के लिए इसे लागू करने का इरादा दिखाया।

दोनों छोर से मदद से वंचित, गाँव की महिलाएँ आसपास के जंगलों से घरेलू ईंधन के रूप में जलाऊ लकड़ी का इस्तेमाल करती हैं जबकि पुरुष बाँस से बनी टोकरियाँ बेचते हैं।

श्याम मिद्दया , ने बताया, “मैं एक बांस पर 120 रुपये खर्च करता हूं। जिससे मैं लगभग तीन बड़ी टोकरियां या पांच मध्यम टोकरियां बना सकता हूं। मैं 12 रुपये में एक छोटी टोकरी बेचता हूं, 30 रुपये में एक मध्यम और 80 रुपये में एक बड़ी टोकरी बेचता हूं। बांस पर 300-400 रुपये खर्च करने के बाद, मैं हर हफ्ते सिर्फ 700-800 रुपये कमाता हूं।’ श्याम मिद्दीया कभी-कभी त्यौहारों में ड्रम बजाते हैं, जिससे हर दिन 300 रुपये मिलते हैं।

बता दें कि शनिवार को इस गांव के लोग मतदान करेंगे। ग्रामीणों को अपने निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने वालों की एक झलक भी नहीं मिली है। नीलिमा मिद्दया ने कहा, “हमने केवल पोस्टर में उनकी तस्वीरों को देखा है। यह किसी अदृश्य के लिए मतदान करने जैसा है।”

महिलाओं के एक अन्य समूह को पत्ते इकट्ठा करते देखा गया जो पत्तल बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। सरस्वती पातर ने कहा, ‘हमें 1,000 पत्ते इकट्ठा करने के लिए 80 रुपये से 200 रुपये के बीच कुछ भी मिलता है। महाजन हम इसे बेचने के लिए मजबूर करते हैं। ” उन्होंने कहा कि 1,000 पत्तियों को इकट्ठा करने में उन्हें कम से कम तीन दिन लगते हैं।

बता दें कि गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पुरुलिया में एक रैली के दौरान 49 चीजों के लिए न्यूनतम वन उपज को लागू करने की घोषणा की थी जिससे लोगों को उनके उत्पादों का सही मूल्य मिल सके।

नमिता मिद्दया ने कहा, ‘अगर इसे लागू किया जाता है, तो एक उम्मीद है कि हमें वन उपज के बेहतर दाम मिलेंगे।हालांकि, मुझे लगता है कि कुछ नहीं होगा और हमने ऐसा ही जीना सीखा है।’

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