भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के उस समानता नियम पर पुनर्विचार कर रही है जिसे चुनौती दी गई है। नरेंद्र मोदी सरकार फिलहाल इस पूरे विवाद से निकलने की कोशिश कर रही है। एक तरफ वह सामान्य वर्ग को भी नाराज नहीं करना चाहती तो दूसरी तरफ उसे एससी, एसटी और ओबीसी का भी ख्याल रखना है, क्योंकि 1989 से पार्टी के प्रमुख मतदाता वर्ग रहे उच्च जातियों में संभावित “दुरुपयोग” को लेकर आक्रोश के संकेत मिल रहे हैं।

ऐसे में केंद्र सरकार ने फिलहाल कदम पीछे खींचने के बजाय मामले पर पुनर्विचार का रास्ता चुना है। इससे सरकार को विवाद को शांत करने और आगे की रणनीति तय करने के लिए वक्त मिल सकता है, लेकिन बीजेपी के लिए यह फैसला आसान नहीं है। वजह है देश का सामाजिक और चुनावी गणित। ओबीसी, एससी और एसटी आबादी मिलाकर सवर्ण आबादी से कहीं ज्यादा है। लिहाजा सरकार को दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधकर चलना होगा।

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि इस पर पुनर्विचार किया जा रहा है। पीठ उन याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रही थी जिनमें दिशानिर्देशों को चुनौती दी गई थी। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से यह तर्क दिया गया था कि ये दिशानिर्देश जाति-आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ ही संदर्भित करते हैं, जबकि सामान्य वर्ग के लोगों को इससे बाहर रखा गया है।

जनवरी 2026 में लागू हुए नियमों के खिलाफ मुख्य आपत्ति यह थी कि उनमें “भेदभाव की झूठी शिकायतों” के खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं था। साथ ही, नियमों का पालन नहीं करने वाले शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया था

आक्रोश का कारण यह था कि पिछले साल फरवरी में सुझाव और आपत्तियां मांगने के लिए जारी किए गए नियमों के मसौदे में झूठी शिकायतों के मामले में दंड का प्रावधान किया गया था, लेकिन जनवरी 2026 में सामने आए अंतिम नियमों में यह प्रावधान हटा दिया गया।

इसके अलावा, वर्तमान में स्थगित नियमों में जातिगत भेदभाव को परिभाषित करते समय ओबीसी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया था और उच्च शिक्षण संस्थानों में गठित की जाने वाली “समानता समितियों” में ओबीसी प्रतिनिधियों को शामिल करने का आह्वान किया गया था। नियमों में कहा गया था, “जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ है अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव।”

अधिवक्ता विनीत जिंदल की याचिका में पूछा गया कि जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में “सामान्य या उच्च जातियों से संबंधित व्यक्तियों को उनके द्वारा झेले गए भेदभाव की प्रकृति, गंभीरता या संदर्भ की परवाह किए बिना, इसके सुरक्षात्मक दायरे से बाहर क्यों रखा गया है”।

भाजपा के नेता इस बात से सहमत हैं कि इन नियमों के कारण सामान्य वर्ग के लोगों में बेचैनी पैदा हुई है, और बिहार में भाजपा की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली सीट बांकीपुर में भाजपा की अभूतपूर्व हार “उच्च जाति के गुस्से” की अभिव्यक्ति थी, क्योंकि इस शहरी सीट पर इन जातियों के मतदाताओं की संख्या ज्यादा है।

चिंता की बात यह भी थी कि राजपूत करणी सेना ने भी जयपुर में इस नियम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। जिसके चलते पुलिस को प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करना पड़ा।

पार्टी को कुछ ही महीनों में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का सामना करना है और राज्य में सामान्य वर्ग की बहुलता है। 1931 में, जब पिछली जाति जनगणना हुई थी, तब उत्तर प्रदेश में 9.1% ब्राह्मण और 7.9% राजपूत थे, और कुल उच्च जाति की आबादी लगभग 20% थी। साथ ही, पिछले तीन दशकों में राज्य में ओबीसी और दलित आंदोलन भी काफी सक्रिय रहा है।

बाहर निकलने के रास्ता तलाश रही बीजेपी

भाजपा के एक नेता ने कहा कि हालांकि पार्टी चाहेगी कि यह मुद्दा देरी के कारण धीरे-धीरे अपने आप खत्म हो जाए, लेकिन केंद्र सरकार उच्च जातियों की चिंताओं को दूर करने के लिए कुछ प्रावधानों को बदलने के लिए तैयार होगी- जैसे झूठी शिकायतों के लिए कोई दंड नहीं।

सूत्रों के अनुसार, केंद्र के पास एक विकल्प यह है कि वह अगली सुनवाई में यह घोषणा करे कि वह इस मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन कर रहा है, जिससे इस जटिल मुद्दे पर कोई स्पष्ट निर्णय लेने से पहले उसे समय मिल जाएगा।

एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि इस नियम को वापस लेना आसान नहीं होगा, क्योंकि इससे विपक्ष को भाजपा को “ओबीसी, एसटी और एससी विरोधी” के रूप में चित्रित करने का मौका मिल जाएगा।

2024 के लोकसभा चुनावों से पहले, विपक्ष ने भाजपा पर संविधान में बदलाव करके आरक्षण समाप्त करने के लिए 400 से ज्यादा सीटें मांगने का आरोप लगाया था। पार्टी ने इस आरोप से बचने के लिए विपक्ष पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए उपलब्ध आरक्षण को अपने “वोट बैंक” यानी मुसलमानों की ओर मोड़ने का आरोप लगाया, लेकिन चुनाव परिणामों के बाद कई वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने कहा कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह आरोप गलत साबित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप पार्टी को 63 सीटों का नुकसान हुआ।

इससे भाजपा को, जिसने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ओबीसी, और कुछ हद तक एससी और एसटी समुदायों तक पहुंचने के लिए बहुत ही केंद्रित प्रयास किए हैं, इन समुदायों की चिंताओं को दूर करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़े, जो देश भर में मतदाताओं का बहुमत बनाते हैं।

केंद्र सरकार जनगणना में जाति का समावेश करने पर सहमत हुई और जातिगत भेदभाव के खिलाफ यूजीसी के नियम भी लागू किए। नागपुर में आरएसएस के 100 साल पूरे होने के समारोह में पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने यहां तक ​​कह दिया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा को “अंबेडकरवादी” पार्टी मानते थे।

इन सब बातों, और विशेष रूप से यूजीसी के नियमन के कारण, उच्च जातियों के कुछ वर्गों में यह धारणा बन गई कि पार्टी उन्हें हल्के में ले रही है, और यह सोशल मीडिया पर नकारात्मक पोस्टों में वृद्धि में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

बांकीपुर के नतीजे एक चेतावनी बनकर आए हैं, और अब केंद्र सरकार उच्च जातियों को संतुलित संदेश देने की कोशिश कर रही है। हालांकि, एबीवीपी के एक नेता ने कहा कि इसकी भी एक सीमा है, क्योंकि उच्च जातियों के हितों को प्राथमिकता देते हुए स्पष्ट रुख अपनाने से पार्टी पर सवर्ण पार्टी होने का आरोप लग सकता है।

एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “गलती ओबीसी को इस नियम में शामिल करना था, क्योंकि भेदभाव अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित मुद्दा है, ओबीसी से नहीं। ओबीसी की ओर से भी ऐसा कोई कदम उठाने की मांग नहीं थी। यहां तक ​​कि जातिगत अत्याचारों से निपटने के लिए बनाए गए कानून भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सुरक्षा के लिए हैं।”

अदालत में क्या हुआ?

29 जनवरी को सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम 2026 पर रोक लगा दी थी, यह कहते हुए कि यह मुद्दा महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है, जिनकी यदि जांच नहीं की गई तो इसके “बहुत व्यापक परिणाम” हो सकते हैं और “समाज को विभाजित” कर सकते हैं। केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी करने वाली पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि “2012 के नियम अगले आदेश तक लागू रहेंगे”।

पीठ ने आगे कहा कि “प्रथम दृष्टया विचार करने पर हमें प्रतीत होता है कि विवादित विनियमों के कुछ प्रावधानों में अस्पष्टताएँ हैं और उनके दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है।” पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि सरकार को इस मुद्दे की जांच के लिए प्रतिष्ठित न्यायविदों की एक समिति गठित करनी चाहिए।

दिशा-निर्देशों पर रोक लगाने वाली पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा, “हमें उस स्थिति में नहीं पहुंचना चाहिए जहां अमेरिका की तरह अलग-अलग स्कूल हों, जहां अश्वेत बच्चे एक स्कूल में और श्वेत लड़के-लड़कियां दूसरे स्कूल में पढ़ते हों। भारत की एकता शिक्षा संस्थानों में झलकनी चाहिए।”

अदालत ने कहा कि एक ही जाति के आर्थिक रूप से संपन्न छात्रों द्वारा उसी जाति के अन्य छात्रों को परेशान करने के मामले हो सकते हैं, और यह जानना चाहा कि ऐसे परिदृश्य से निपटने के लिए नियम क्या व्यवस्था करते हैं।

सीजेआई ने कहा था, “इस तरह की स्थिति का फायदा समाज के शरारती तत्व उठा सकते हैं।”

याचिकाकर्ताओं एडवोकेट जिंदल, मृत्युंजय तिवारी और राहुल दीवान ने मुख्य रूप से विनियमों की धारा 3(1)(सी) को चुनौती दी है, जो जातिगत भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित करती है।

ये नियम 2019 में पायल ताडवी और रोहित वेमुला की माताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के परिणामस्वरूप बने हैं। जिन्होंने क्रमशः 2019 और 2016 में कथित जाति-आधारित भेदभाव के कारण आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों में मजबूत भेदभाव-विरोधी तंत्र लागू करने की मांग की थी।

कैंपस में जातीय भेदभाव रोकने वाले UGC नियमों की होगी समीक्षा, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को दी जानकारी

विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बड़ा बयान दिया है। पढ़ें पूरी खबर।