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कॉन्‍ट्रैक्‍ट टाइप करने में हुई गलती, LIC के हाथ से निकले 35.52 लाख रुपये

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग ने महाराष्ट्र उपभोक्ता आयोग के फैसले को बरकरार रखते हुए एलआईसी को दीपक कोठारी को 26.92 लाख रुपए मार्च, 2015 में पॉलिसी के मैच्योर होने के बाद से अब तक 9% ब्याज दर के साथ लौटाने का आदेश दिया है।

उपभोक्ता आयोग ने एलआईसी को 35 लाख का भुगतान करने का दिया आदेश।

दस्तावेजों में टाइपिंग की गलती किसी कंपनी को कितनी भारी पड़ सकती है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक मामले में सरकारी बीमा कंपनी एलआईसी को एक व्यक्ति को 35.52 लाख रुपए का भुगतान करना पड़ेगा। दरअसल मुंबई के एक व्यक्ति दीपक कोठारी ने सूरत की एक ब्रांच से एलआईसी की पॉलिसी खरीदी थी। यह पॉलिसी मार्च, 2015 में मैच्योर हो गई थी, लेकिन एलआईसी ने व्यक्ति को 25 लाख रुपए देने से इंकार कर दिया और उसे सिर्फ 3.94 लाख देने की पेशकश की। एलआईसी ने दीपक कोठारी को इसके साथ ही लॉयल्टी एडीशन के साथ 1.67 लाख रुपए देने का भी ऑफर किया।

दरअसल एलआईसी ने अपने कॉन्ट्रैक्ट के टेबल-165 के अनुसार दावा किया कि जीवन सरल पॉलिसी के तहत पॉलिसीधारक को 25 लाख रुपए मृत्यु के बाद दिए जानी थी, जबकि पॉलिसी की मैच्योरिटी पर 3.94 लाख रुपए की रकम दी जानी थी। लेकिन टाइपिंग की गलती के कारण यह रकम 25 लाख रुपए लिख दी गई। हिंदुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, पॉलिसीधारक दीपक कोठारी ने इस पर बीते जून में महाराष्ट्र उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। जहां उपभोक्ता आयोग ने पॉलिसीधारक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए एलआईसी को 35.32 लाख रुपए का भुगतान करने के आदेश दिया था। लेकिन उपभोक्ता आयोग के इस फैसले के खिलाफ एलआईसी ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग की शरण ली। लेकिन यहां से भी अब एलआईसी को निराशा हाथ लगी है।

हाल ही में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग ने महाराष्ट्र उपभोक्ता आयोग के फैसले को बरकरार रखते हुए एलआईसी को दीपक कोठारी को 26.92 लाख रुपए मार्च, 2015 में पॉलिसी के मैच्योर होने के बाद से अब तक 9% ब्याज दर के साथ लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने अपने फैसले में कहा कि पॉलिसीधारक ने प्रीमियम के तौर पर 13.65 लाख रुपए जमा किए हैं, ऐसे में पॉलिसीधारक को मैच्योरिटी पर 25 लाख रुपए मिलना तर्कसंगत है। लेकिन 13 लाख रुपए जमा करने पर सिर्फ 3.94 लाख रुपए मिलना किसी भी तरीके से तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग कॉन्ट्रैक्ट में टाइपिंग की गलती को मानने से इंकार कर दिया।

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