केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साल 2024 में देश से वामपंथी उग्रवाद को खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय की थी। तब से लेकर अब तक के दो सालों में सुरक्षा बलों ने छत्तीसगढ़ में माओवाद के खिलाफ ऑपरेशन चलाए हैं। इससे बड़ी संख्या में माओवादी नेता और कार्यकर्ता मारे गए हैं और उन्होंने सरेंडर किया है।
इस दौरान राज्य में 531 माओवादी मारे गए हैं और प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष दो निकायों, पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी ने 24 सदस्यों को खो दिया है। यह या तो मारे गए हैं या फिर इन्होंने सरेंडर कर दिया है। छत्तीसगढ़ के एडीजी (नक्सल ऑपरेशन) विवेकानंद सिन्हा ने 31 मार्च की डेडलाइन से पहले इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “उनकी पूरी राजनीतिक संरचना ध्वस्त हो चुकी है और उनकी सैन्य संरचना नष्ट हो चुकी है। अब केवल कुछ ही कार्यकर्ता सादे कपड़ों में घूमते हैं और उनसे कोई खास खतरा नहीं है।”
इससे पहले राज्य के गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा था कि छत्तीसगढ़ में 40 से भी कम सक्रिय माओवादी हैं और उनका भी जल्द ही पुनर्वास किया जाएगा। छत्तीसगढ़ पुलिस के अनुसार, माओवादियों के कब्जे वाले कई इलाकों को सुरक्षा बलों ने वापस ले लिया है। 2024 से माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में 103 नए पुलिस कैंप स्थापित किए गए हैं। ये शिविर मुख्य तौर पर बस्तर क्षेत्र के नारायणपुर, बीजापुर और सुकमा जिलों में स्थापित किए हैं।
माओवादियों को कब-कब लगा बड़ा झटका
तेज किए गए अभियानों के बीच माओवादियों को पहला बड़ा झटका 21 मई, 2025 को लगा, जब प्रतिबंधित पार्टी के प्रमुख सीपीआई (माओवादी) के महासचिव, नंबाला केशवा राव उर्फ बसवराजू, अबुझमाद क्षेत्र में एक मुठभेड़ में 26 अन्य लोगों के साथ मारे गए। अगला बड़ा झटका मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति उर्फ सोनू का सरेंडर था। माओवादी पार्टी के वैचारिक प्रमुख के रूप में जाने जाने वाले पोलित ब्यूरो सदस्य सोनू ने अक्टूबर 2025 में महाराष्ट्र में आत्मसमर्पण कर दिया। एक अन्य वरिष्ठ नेता सेंट्रल कमेटी के सदस्य टक्कलापल्ली वासुदेव राव, उर्फ रूपेश ने भी उसी महीने सरेंडर कर दिया।
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माओवादियों को एक और बड़ा झटका नवंबर 2025 में सेंट्रल कमेटी के सदस्य मदवी हिडमा की हत्या से लगा। कुख्यात माओवादी कमांडर कथित तौर पर 260 सुरक्षाकर्मियों और 81 नागरिकों की हत्याओं में शामिल था और वह पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन 1 का प्रभारी था।
इस साल फरवरी में एक और बड़ा झटका लगा। पोलित ब्यूरो सदस्य थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवुजी का आत्मसमर्पण। पिछले साल बसवराजू की हत्या के बाद उन्हें माओवादी नेता का अगला प्रमुख माना जा रहा था और वे सीपीआई (माओवादी) के केंद्रीय सैन्य आयोग के प्रमुख थे। 2000 में उन्होंने पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की स्थापना की थी।
इस दौरान छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और आंध्र प्रदेश में मुठभेड़ों में सेंट्रल कमेटी के 11 सदस्य मारे गए, जबकि सेंट्रल कमेटी के आठ सदस्यों ने आत्मसमर्पण कर दिया। माओवादियों की संस्था, पोलित ब्यूरो में अब केवल एक ही सक्रिय सदस्य बचा है, 63 साल के मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर। 75 साल के मुपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति उर्फ रमन्ना पोलित ब्यूरो के एक अन्य सदस्य और पूर्व महासचिव हैं। यह कई सालों से निष्क्रिय हैं। उनके ठिकाने और यहां तक कि उनके जिंदा होने का भी कोई पता नहीं है।
बस्तर ऑपरेशन
2024 से सुरक्षा बलों के ऑपरेशन मुख्य तौर पर बस्तर क्षेत्र पर केंद्रित रहे। यह कई सालों से माओवादियों का गढ़ रहा है। 2024 और 2026 के बीच लगभग 500 माओवादी मारे गए। इसी अवधि में माओवादी हिंसा में मारे गए सुरक्षाकर्मियों की संख्या 42 थी। इस दौरान 119 नागरिक भी मारे गए। बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी ने कहा, “बस्तर को अब लगभग नक्सल-मुक्त अवस्था की ओर अग्रसर माना जा सकता है। हालांकि, लक्ष्य तब पूरी तरह से हासिल माना जाएगा जब माओवादी संगठन सशस्त्र चरमपंथी ताकत के रूप में काम करने की अपनी क्षमता पूरी तरह से खो देंगे। इसका मतलब है कि ग्रामीणों को डराने-धमकाने की कोई क्षमता नहीं होगी और हिंसा करने की कोई क्षमता नहीं होगी।”
बस्तर क्षेत्र के अलावा, गरियाबंद जिले में 30 माओवादी और धमतारी जिले में एक माओवादी मारा गया। रायपुर रेंज के आईजीपी अमरेश मिश्रा ने कहा, “फरवरी तक, रायपुर रेंज और उसके आसपास के इलाकों में सक्रिय सभी माओवादी संगठन या तो निष्क्रिय कर दिए गए थे या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था।”
अमित शाह का लोकसभा में संबोधन
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि देश नक्सल-मुक्त हो चुका है। उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य 31 मार्च तक नक्सल-मुक्त भारत का था। पूरी प्रक्रिया औपचारिक रूप से पूरी होने के बाद देश को सूचित किया जाएगा, मगर मैं ऐसा बोल सकता हूं कि हम नक्सल मुक्त हो गए हैं।” पढ़ें पूरी खबर…
