तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर द्वारा तमिलगा वेट्री कड़गम (TVK) नेता विजय को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने में देरी किए जाने के फैसले ने फिर से इस बहस को तेज कर दिया है कि राज्यपाल का अधिकार बड़ा है या जनता का जनादेश।

आमतौर पर सबसे बड़ी पार्टी अपना दावा पेश करती है और उसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाता है, तथा सदन में उसे अपना बहुमत साबित करना होता है। हालांकि, राज्यपाल अर्लेकर ने विजय से कम से कम 118 विधायकों के समर्थन का प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा है, जो 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा है।

वर्तमान में टीवीके के पास 108 विधायक हैं। कांग्रेस के पांच विधायकों के समर्थन से यह संख्या बढ़कर 113 हो जाती है। जो बहुमत से अभी पांच कम है।

संविधान में राज्यपाल की शक्तियां

संविधान के अनुच्छेद 164 में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाएगी और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाएगी और मंत्री राज्यपाल की इच्छा के अनुसार पद पर बने रहेंगे।

इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए राज्यपाल जनता का जनादेश प्राप्त दल को आमंत्रित करते हैं और सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत करते हैं। इसके बाद राज्यपाल नामित मुख्यमंत्री को पद की शपथ दिलाने का समय निर्धारित करते हैं। विधायकों को शपथ दिलाने और सदन परीक्षण कराने के लिए एक कार्यवाहक अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है, जो आमतौर पर निर्वाचित विधायकों में सबसे वरिष्ठ होता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले

सुप्रीम कोर्ट कई बार अपने फैसलों में यह साफ कर चुका है कि विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी को पहले सरकार बनाने का मौका दिया जाना चाहिए। लेकिन राजभवनों की राजनीतिक भूमिका को लेकर विवाद होते रहे हैं, इसलिए विपक्षी दल अक्सर सरकार बनाने के दावे को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।

2018 में राज्यपाल वजुभाई वाला द्वारा कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में बीएस येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण समारोह की तारीख तय किए जाने के बाद, कांग्रेस और जेडी(एस) ने आधी रात को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कांग्रेस और जेडी(एस) ने चुनाव के बाद गठबंधन की घोषणा की थी, हालांकि राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था। राज्यपाल ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दिया था।

हालांकि, तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा ने रात में ही मामले की सुनवाई की, लेकिन शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। एक दिन बाद विधायकों की खरीद-फरोख्त और उन्हें रिसॉर्ट में बंद रखने के आरोपों के संज्ञान में आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट की अवधि बढ़ाकर 36 घंटे कर दी। आखिर में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार फ्लोर टेस्ट में असफल रही और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन(कांग्रेस-जेडी(एस) ने सरकार बनाई।

पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि राज्यपाल द्वारा शपथ ग्रहण टालना “अनुचित राजनीतिक चाल” है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल जनता के जनादेश और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ नहीं होना चाहिए।

कुमार ने आगे कहा कि केवल तकनीकी कारणों के आधार पर फैसले नहीं लिए जाने चाहिए। विजय के शपथ ग्रहण में देरी करना लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ और संविधान की भावना के विपरीत है।

‘सरकार कब बनेगी?’ दफ्तर में लगातार बज रहे TVK चीफ विजय के नए विधायकों के फोन

तमिलनाडु में नए सरकार के गठन को लेकर असमंजस की स्थिति अभी भी जारी है। इधर टीवीके चीफ जोसेफ विजय के पार्टी कार्यालय में लगातार फोन बज रहे हैं और सभी का बस एक ही सवाल है कि सरकार कब बना रहे हैं। टीवीके के नवनिर्वाचित विधायकों में से एक विधायक ने कहा कि पार्टी कार्यालय में लगातार सभी के फोन बज रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर।