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तीन तलाक: AIMPLB ने सुप्रीम कोर्ट में दिया एफिडेविट, कहा-निकाह पर जारी करेंगे ये अडवाइजरी

इस एफिडेविट में सदियों पुरानी इस प्रथा को खत्म करने की बात नहीं कही गई है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश समेत पांच जजों की संविधान पीठ ने तीन तलाक पर सुनवाई की। (ग्राफिक्स- सी शशिकुमार)

ट्रिपल तलाक मामले में आज (22 मई) अॉल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल किया। इसमें बोर्ड ने कहा कि वह कुछ नियमों की अडवाइजरी जारी करेगा, जो निकाह करने वालों को मानना होगा। निकाह कराने वाला शख्स दूल्हे को सलाह देगा कि अगर नौबत तलाक तक पहुंच भी जाए तो वह तीन बार तलाक न बोलें। एफिडेविट में कहा गया कि शरियत और निकाहनामे में तीन तलाक एक गलत प्रथा है, ऐसे किसी प्रोविजन की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम बोर्ड ने यह भी कहा कि वह तीन तलाक देने वालों के सामाजिक बहिष्कार का आह्वान भी करेगा। अपने एफिडेविट में AIMPLB ने कहा कि वह काजी दूल्हा और दुल्हन को सलाह देंगे कि वे निकाहनामा में एक नियम जोड़ें कि वह तीन तलाक का सहारा नहीं लेंगे। हालांकि इस एफिडेविट में सदियों पुरानी इस प्रथा को खत्म करने की बात नहीं कही गई है।

18 मई को तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 6 दिनों तक चली इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी थीं। 17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआइएमपीएलबी) से पूछा था कि क्या महिलाओं को ‘निकाहनामा’ के समय ‘तीन तलाक’ को ‘ना’ कहने का विकल्प दिया जा सकता है। प्रधान न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाले पांच जजों के संविधान पीठ ने यह भी पूछा था कि क्या सभी काजियों से निकाह के समय इस शर्त को शामिल करने के लिए कहा जा सकता है।

मंगलवार को एआइएमपीएलबी ने कहा था कि तीन तलाक ऐसा ही मामला है जैसे यह माना जाता है कि भगवान राम अयोध्या में पैदा हुए थे। इसने कहा था कि ये धर्म से जुड़े मामले हैं और इन्हें संवैधानिक नैतिकता के आधार पर नहीं परखा जा सकता। AIMPLB की ओर से पेश पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा, अगर मेरी आस्था इस बात में है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था तो यह आस्था का विषय है और इसमें संवैधानिक नैतिकता का कोई प्रश्न नहीं है और कानून की अदालत इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया था कि मुस्लिम समुदाय में शादियां कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर होती हैं और महिलाएं अपने हितों और गरिमा की रक्षा के लिए निकाहनामा में विशेष खंड जुड़वा सकती हैं। टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड ने कहा था कि वैवाहिक रिश्ते में बंधने से पहले 4 विकल्प होते हैं, जिसमें शादी को 1954 के स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत रजिस्टर भी कराया जा सकता है। मुस्लिम बोर्ड ने कहा कि महिलाएं निकाहनामा पर इस्लामी कानून के तहत बातचीत कर सकती हैं। सिर्फ उसके पति को ही नहीं, महिला को भी तीन बार तलाक कहने का हक है और वह डिवोर्स के मामले में काफी ज्यादा राशि की मेहर मांग सकती है।

केंद्र ने सोमवार को न्यायालय से कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को अवैध एवं असंवैधानिक करार देता है तो सरकार मुसलमानों में विवाह और तलाक के नियमन के लिए विधेयक लेकर आएगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को यह साफ कर दिया था कि वह समय की कमी की वजह से सिर्फ ‘तीन तलाक’ पर सुनवाई करेगा। हालांकि कोर्ट केन्द्र के जोर के मद्देनजर बहुविवाह और ‘निकाह हलाला’ के मुद्दों को भविष्य में सुनवाई के लिए खुला रख रहा है।

इससे पहले 12 मई को हुई सुनवाई में पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता आरिफ मोहम्मद खान ने कहा था कि एक बार में तीन तलाक देने न केवल इस्लामी शरीयत के खिलाफ है और ये मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफनाने जैसा है। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मुसलमानों में शादी को खत्म करने का यह तरीका ‘बेहद खराब’ और ‘बर्दाश्त ना करने वाला’ है। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री और सीनियर वकील सलमान खुर्शीद ने कहा था कि तीन तलाक कानूनी दखल का मामला नहीं है। उन्होंने कहा था कि महिलाओं को इसको नकारने का अधिकार मिला हुआ है। उन्होंने कहा थआ कि महिलाएं निकाहनामा (शादी का कॉन्ट्रेक्ट) दिखाकर तीन तलाक को नकार सकती हैं।

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