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फिर आमने-सामने आए आदिवासी समुदाय, पंचायत का फरमान ‘नक्सलियों को नहीं घुसने देंगे’

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में एक बार फिर आदिवासी और नक्सलियों के बीच आमने सामने की लड़ाई हो रही है। राज्य के सुकमा जिले की एक पंचायत ने नक्सलियों को गांव में नहीं घुसने का फरमान सुना दिया है।

Author बस्तर/ रायपुर | May 7, 2016 8:14 AM
कई जवानों के अभी भी जंगल में फंसे होने की खबर है। (representative image)

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में एक बार फिर आदिवासी और नक्सलियों के बीच आमने सामने की लड़ाई हो रही है। राज्य के सुकमा जिले की एक पंचायत ने नक्सलियों को गांव में नहीं घुसने का फरमान सुना दिया है। नक्सल समस्या से जूझ रहे बस्तर क्षेत्र में स्थित सुकमा जिला राज्य के सबसे अधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में से एक है लेकिन अब यहां बदलाव की बयार बह रही है। जिले के कुछ गांव ऐसे हैं जहां गांववालों ने नक्सलियों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। ऐसा ही एक गांव कुमाकोलेंग भी है। बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर से सुकमा जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 30 पर बसे इस गांव में नक्सलियों का बोलबाला था लेकिन अब उन्हें दूर रहने की चेतवानी मिल गई है।

कुमाकोलेंग ग्राम पंचायत में दो गांव कुमाकोलेंग और नामा शामिल है। दोनों गांव के लोग पिछले दो महीनों से पहरा देकर नक्सलियों को गांव में प्रवेश करने से रोक रहे हैं। नामा गांव के आयता कर्मा ने बताया कि गांव के लोग नक्सलियों के विकास विरोधी कार्यों से तंग आ चुके हैं। उनकी वजह से यहां न तो बिजली पहुंची और न ही गांव में सड़क बन सकी है। गांव के लोग अभाव की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। वहीं पुलिस का साथ देने के आरोप में गांववालों की हत्या भी नक्सली द्वारा कर दी जाती है।

नक्सलियों द्वारा लगातार धमकी और इस तरह की हरकतों से तंग आकर गांव के युवाओं ने फैसला किया कि अब वह गांव में नक्सली गतिविधि और किसी भी तरह की हिंसा को अनुमति नहीं देंगे। फैसला लेने के बाद अब युवाओं ने गांव की सुरक्षा का भी जिम्मा उठाया है। युवाओं ने एक टोली तैयार की है जो परंपरागत हथियार लेकर पहरा देती है। गांववाले बताते हैं कि दोनों गांव में लगभग छह सौ की आबादी है और करीब 65 युवाओं की टीम ने गांव की सुरक्षा का जिम्मा उठाया है। यह टीम किसी भी हालत में नक्सलियों को गांव में घुसने नहीं देती है। ऐसा भी हुआ है कि नक्सलियों ने गांव में घुसने की कोशिश की लेकिन जब उनका जोरदार विरोध किया जाता है तब वह वापस भागने पर मजबूर हो जाते हैं।

उधर इस विरोध की घटनाओं से इलाके की पुलिस खासी उत्साहित है। अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में कई गांव अब नक्सलियों के खिलाफ हो रहे हैं और यह तभी क्षेत्र में हुए विकास की वजह से ही संभव हो पाया है। सुकमा जिले के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह के मुताबिक ‘जिले में कुछ गांव है जहां नक्सलियों पर पाबंदी लगाई जा रही है। पुलिस ने गांववालों से वादा किया है कि जंगल के अंदरूनी हिस्से में बसे इस गांव में जल्द ही पुलिस शिविर की स्थापना पर विचार किया जाएगा। सिंह ने बताया कि गांव में नक्सलियों के विरोध के बाद सुरक्षा के लिए पुलिस गश्त बढ़ा दी गई है।’

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र पिछले तीस सालों से नक्सल हिंसा से जूझ रहा है। इस दौरान नक्सलियों को ग्रामीणों के विरोध का भी सामना करना पड़ा है। 2005 में ऐसे ही विरोध के रूप में सलवा जुडूम की शुरूआत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद सलवा जुडूम को समाप्त कर दिया गया, वहीं इस आंदोलन के मुखिया महेंद्र कर्मा की नक्सलियों ने 25 मई 2013 को हत्या कर दी थी।

 

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