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कोविड-19 बीमारी का इलाज- प्लाज्मा और रेमडेसिविर पर फिर उठे सवाल

प्लाज्मा पद्धति प्रभावी नहीं, कोरोना पर चिकित्सकीय प्रबंधन दिशानिर्देशों से हटाए जाने की संभावना, घर पर इलाज करा रहे कोरोना के मरीजों को रेमडेसिविर टीका नहीं लेना चाहिए : एम्स

Edited By Sanjay Dubey नई दिल्ली | Updated: May 16, 2021 5:18 AM
कोरोना से ठीक होने के बाद अजय मुनोत ने 14 बार प्लाज्मा डोनेट किया। (एक्सप्रेस फोटो)।

कोरोना विषाणु से संक्रमित मरीजों के इलाज में विशेषज्ञों की ओर से प्लाज्मा पद्धति और रेमडेसिविर टीके के उपयोग पर लगातार सवालिया निशाना लगाया जाता रहा है। हालांकि कोरोना के चिकित्सीय प्रबंधन के राष्ट्रीय दिशानिर्देशों में इन दोनों पद्धतियों के विशेष परिस्थितियों में इस्तेमाल के बारे में कहा गया है। कई मामलों में इन दोनों पद्धतियों का अतार्किक और गैर-वैज्ञानिक उपयोग देखा गया है। इसलिए प्लाज्मा पद्धति को कोरोना के चिकित्सीय प्रबंधन के दिशानिर्देशों से हटाए जाने की संभावना है। वहीं, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली की ओर से कहा गया है कि रेमडेसिविर टीके का उपयोग घर पर बाकी पेज 8 पर इलाज के दौरान नहीं किया जाना चाहिए।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर)-राष्ट्रीय कार्यबल की बैठक में सभी सदस्य इस पक्ष में थे कि कोरोना के वयस्क मरीजों के उपचार प्रबंधन संबंधी चिकित्सीय दिशानिर्देशों से प्लाज्मा पद्धति के इस्तेमाल को हटाया जाना चाहिए क्योंकि यह प्रभावी नहीं है और कई मामलों में इसका अनुचित रूप से इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने कहा कि आइसीएमआर जल्द ही मामले में परामर्श जारी करेगा। वर्तमान दिशानिर्देशों के तहत लक्षणों की शुरुआत होने के सात दिन के भीतर बीमारी के मध्यम स्तर के शुरुआती चरण में और जरूरतें पूरा करनेवाला प्लाज्मा दाता मौजूद होने की स्थिति में प्लाज्मा पद्धति के इस्तेमाल की अनुमति है। प्लाज्मा पद्धति को दिशानिर्देशों से हटाने संबंधी विमर्श ऐसे समय हुआ है, जब कुछ डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के. विजयराघवन को पत्र लिखकर देश में कोरोना के उपचार के लिए प्लाज्मा पद्धति केअतार्किक और अवैज्ञानिक उपयोग को लेकर आगाह किया है। पत्र आइसीएमआर प्रमुख बलराम भार्गव और एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया को भी भेजा गया है।

एम्स दिल्ली के डॉक्टर नीरज निश्चल ने कहा कि घर पर रेमडेसिविर टीका नहीं लेना चाहिए। गृह एकांतवास में रह रहे मरीजों के लिए सकारात्मक रुख बनाए रखना और नियमित व्यायाम करना जरूरी है। एम्स के ही डॉक्टर मनीष ने कहा कि ऑक्सीजन का स्तर 94 से नीचे जाने पर मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना चाहिए। इसके साथ ही ऑक्सीजन का स्तर जांच करते समय मरीज की उम्र, पुरानी बीमारियों जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए। हालांकि, डॉ नीरज ने कहा कि 80 फीसद संक्रमित मरीजों में हल्के लक्षण दिखते हैं और सुझाव दिया कि पहली जांच में संक्रमण की पुष्टि नहीं होने पर ही आरटी-पीसीआर की दूसरी जांच करानी चाहिए।

‘कवक संक्रमण से बचने के लिए स्टेरॉयड का तार्किक उपयोग जरूरी’
एम्स के निदेशक रणदीप गुलेरिया ने शनिवार को कहा कि कोरोना विषाणु के मरीजों के इलाज के संबंध में सरकार का ध्यान ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षण, अस्पतालों में संक्रमण रोकने के लिए बेहतर तौर-तरीका लागू करने और कवक संक्रमण (म्यूकरमाइकोसिस) की रोकथाम पर है। उन्होंने कहा कि स्टेरॉयड के दुरुपयोग से भी इस तरह के संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं। गुलेरिया ने कहा कि मधुमेह से ग्रस्त, कोरोना के रोगियों और स्टेरॉयड लेने वालों में कवक संक्रमण की आशंका रहती है।

इसे रोकने के लिए हमें स्टेरॉयड का तार्किक उपयोग करना चाहिए। उन्होंने देश के विभिन्न भागों में कवक संक्रमण के बढ़ते मामलों पर आगाह करते हुए कहा कि यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि अस्पतालों को संक्रमण रोकने के लिए निर्देशों का पालन करना चाहिए। गुलेरिया ने कहा कि ऐसा देखा गया है कि द्वितीयक संक्रमण चाहे कवक से हो या जीवाणु जनित, इससे ज्यादा मौत हो रही हैं। ‘म्यूकरमाइकोसिस’ से चेहरा, आंखों के घेरे या मस्तिष्क प्रभावित हो सकता है जिससे दृष्टि भी जा सकती है। यह (संक्रमण) फेफड़े तक पहुंच सकता है।

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