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पीढ़ियों के काम में अब वो दाम नहीं, पूजा समितियां कर रहीं सस्ती व छोटी मूर्तियों की मांग, महंगाई ने भी दिखाया असर

कलाकारों के सामने अब चुनौतियां बढ़ने लगी हैं। वे त्योहारों के इन खास मौकों पर इतना धन कमा लेना चाहते हैं कि पूरे साल इस पैसे से गुजारा चल सके।
Author नई दिल्ली | September 26, 2016 01:50 am
मां दुर्गा।

सुमन केशव सिंह

‘अब मूर्ति बनाने में पहला जैसा लाभ नहीं… दो हजार टका का रंग आता है, बांस, पुआल, सुतली का दाम बहुत बढ़ गया…दिल्ली में मिट्टी भी पंजाब से आता है…हम क्या मूर्ति बनाएगा और क्या बचाएगा…।’ ये शब्द हैं कोलकाता के 76 साल के गोपाल दास के, जो पिछली दस पीढ़ियों से मूर्तियां बनाते आ रहे हैं। अभी उनके पास बात करने तक का वक्त नहीं। अगले महीने की शुरुआत नवरात्रि से होगी। इस वजह से दुर्गा की प्रतिमाओं को गढ़ने वाले ये हाथ काफी व्यस्त हैं। उन पर पूजा समितियों से लिए गए आॅर्डर समय से पहले पूरा करने का दबाव है। प्रतिमाओं को आकार दिया जा चुका है। पहले स्तर के रंग चढ़ाने का काम भी शुरू हो गया है।

गोपाल दास के बेटे मणिक पाल जो अब उनके उत्तराधिकारी हैं और 44 लोगों के दल के प्रमुख भी, बताते हैं कि उनका दल दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा बनाने के लिए जाना जाता है। यह दल हर साल कोलकाता के नादिया जिले के कृष्णानगर से दिल्ली आता है। उनके गांव और आस-पास ऐसे हजारों कलाकार हैं जो इसी तरह देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर रोजी का जुगाड़ करते हैं।

चितरंजन पार्क के बंद पड़े सिनेमाघर परिसर में मणिक का दल अपने मूर्ति निर्माण में व्यस्त है। इस दल के सबसे बुजुर्ग सदस्य गोपाल दास बताते हैं कि कलाकारों के सामने अब चुनौतियां बढ़ने लगी हैं। वे त्योहारों के इन खास मौकों पर इतना धन कमा लेना चाहते हैं कि पूरे साल इस पैसे से गुजारा चल सके, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। क्योंकि दिल्ली में अब मूर्तियों की मांग पहले जैसी नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। लोग अब सस्ती और कम लागत की मूर्तियां बनवाना चाहते हैं। इसके पीछे कारण यह है कि नई पीढ़ी में पूजा को लेकर उतना उत्साह नहीं। पूजा समितियों के पास चंदे से आने वाले पैसों में भी कमी आई है और लाइटिंग व सजावट का खर्च भी बढ़ गया है।

मणिक पाल की मानें तो लोगों की भीड़ जो पूजा पंडालों में पहले उमड़ती थी उसमें भी कमी हुई है। गोपाल दास भी यह मानते हैं कि यह समय के बदलाव का असर है। लोग दान-दक्षिणा में उतना विश्वास नहीं रखते। भीड़भाड़ की वजह से लोग कुछ खास प्रतिमाओं के ही दर्शन करते हैं। मणिक पाल बताते हैं कि मूर्तियों में लगने वाले सामान की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। मूर्तियों की लागत बढ़ने का असर उनके मुनाफे पर होता है। गोपाल का कहना है कि पहले ज्यादातर लोगों की कोशिश होती थी कि पंडालों में दुर्गा प्रतिमा के अलावा गणेश, कार्तिकेय महिषासुर की पूरी कड़ी स्थापित करें, लेकिन अब ज्यादातर पूजा समितियां एक ही मूर्ति बनवा कर पूजा की रस्म अदा कर लेती हैं।

बड़े आॅर्डर देने वालों ने भी मूर्तियों की संख्या घटा दी है। मधुसुदन पाल जो इसी परिवार के सदस्य हैं, बताते हैं कि हर साल उनके परिवार के 40 सदस्य मिल कर 44 मूर्तियां बनाते हैं। इससे हुई आमदनी सभी में बंट जाती है। एक मूर्ति की कीमत आम तौर पर 20 से 25 हजार होती है। उन्होंने बताया कि इन पैसों से बहुत कुछ नहीं होता बस एकमुश्त कुछ रकम आ जाती है। जो कुछ ही महीनों में खर्च हो जाता है। गुजारे के लिए उनका परिवार मिट्टी के बरतन, दिए और छोटी मूर्तियां बनाता है। मणिक के अनुसार सरकार के पर्यावरण संबंधी निर्देशों ने भी उनकी आमदनी पर असर डाला है। प्लास्टिक आॅफ पेरिस का प्रयोग प्रतिबंधित है। रसायन वाले सस्ते रंग भी प्रतिबंधित हैं। अब वे जिन रंगों का प्रयोग करते हैं वे हजार रुपए किलो से दो हजार रुपए तक आते हैं।

मधुसूदन को इस बात का भरोसा है कि मूर्ति निर्माण का पेशा अभी खत्म होने वाला नहीं। लेकिन मुनाफे और जीवनस्तर के सुधार के लिहाज से फायदेमंद भी नहीं। मधुसूदन बताते हैं कि कुछ परिवारों ने इस पेशे को छोड़ कर दूसरे धंधों की ओर रुख किया है, लेकिन उनके परिवार के सदस्यों के आगे समस्या यह है कि उन्हें इसके अलावा कोई और काम आता ही नहीं और मूर्तियां गढ़ने के सिवा कोई और विकल्प भी नहीं।

 

 

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